शब्द बिरादरी

कहानी की दुनिया और निर्मल वर्मा

निर्मल वर्मा की कहानियों में, कहानी के कहानी होने का जो ‘अपना’ या मौलिक अर्थ खुलता है—वह ‘स्वप्न के यथार्थ’ को खोजने जैसा है। परंतु इसके लिये ज़रूरी है कि पहले किसी तरह, यथार्थ को स्वप्न में ढाला या रचा जा सका हो। ऐसा करने के लिये, उनकी कहानियाँ कई चीज़ों का—एक तरह का अनिवार्य इस्तेमाल करती हैं। ये चीजे़ं हैं—एकान्त, अवसाद, मृत्युबोध, आत्मालाप, हर स्थिति को एक सवाल में बदलने की बेचैनी, सामान्य व्यवहारों को दौहराते जाने की आदत के प्रति संदेह, बालसुलभ जिज्ञासु विस्मय को पकड़े रहने का आग्रह और ख़ुद अपने साथ रहते हुए जीने के लिये बचायी गयी कोई ‘स्पेस’ या समय, ये तमाम चीजे़ं निर्मल वर्मा की कहानियों में बार-बार, अवसर और शायद करीब करीब हमेशा मौजूद रहती हैं।”

निर्मल वर्मा की कहानियाँ पढ़ते वक़्त लगता है, जैसे हम उस अनुभव से होकर ही नहीं गुज़र रहे, जो एक कहानी हमें देती है; अपितु हम एक अन्य तल पर कहानी के कहानी होने के मतलब को भी नये तरीके से खोज रहे होते हैं। इसका मतलब यह है कि निर्मल वर्मा की कहानी के पास जाते हुए हमें, कहानी की बाबत अपने पहलॅ के बने-बनाये चौखटों को, कुछ देर के लिये पीछे छोड़ कर जाना पड़ता है। वैसे तो ठीक से देखें, तो हमें हर रचनाकार के पास इसी तरह जाना चाहिये; बशर्ते वह ‘रचनाकार’ होने की सामान्य शर्तों पर खरा उतरता हो। दरअसल हर रचना, जीवन की तरह होती है और हर दफा वह देह धारण कर, विधा के विकास में कुछ न कुछ योगदान ज़रूर देती है। इससे विधा न टूटती है, न बिखरती है, न एकदम नयी ही हो जाती है; फिर भी वह विधा की बाबत हमारी अब तक की समझ को एक नया क्षितिज ज़रूर देती है। रचनाकार ठीक वहीं उसी बिंदु पर, ठीक से रचनाकार होता है। उस बिंदु को पकड़ना ज़रूरी है।

तो, निर्मल वर्मा की कहानियों में, कहानी के कहानी होने का जो ‘अपना’ या मौलिक अर्थ खुलता है—वह ‘स्वप्न के यथार्थ’ को खोजने जैसा है। परंतु इसके लिये ज़रूरी है कि पहले किसी तरह, यथार्थ को स्वप्न में ढाला या रचा जा सका हो। ऐसा करने के लिये, उनकी कहानियाँ कई चीज़ों का—एक तरह का अनिवार्य इस्तेमाल करती हैं। ये चीजे़ं हैं—एकान्त, अवसाद, मृत्युबोध, आत्मालाप, हर स्थिति को एक सवाल में बदलने की बेचैनी, सामान्य व्यवहारों को दौहराते जाने की आदत के प्रति संदेह, बालसुलभ जिज्ञासु विस्मय को पकड़े रहने का आग्रह और ख़ुद अपने साथ रहते हुए जीने के लिये बचायी गयी कोई ‘स्पेस’ या समय, ये तमाम चीजे़ं निर्मल वर्मा की कहानियों में बार-बार, अवसर और शायद करीब करीब हमेशा मौजूद रहती हैं। इनकी मदद से वे यथार्थ की सतह और उसके ठोस आयतन व रूपाकारों से, कुछ अलहदा हो सकने की वजह पा जाते हैं। वे इसे ठीक से जीने की कोशिश कहते हैं। ‘भोगे हुए यथार्थ’ के साथ जीने की कोशिश में उन्हें किसी बदहवासी और हड़बड़ी की अनिवार्य मौजूदगी नज़र आती है। तो इत्मीनान से जीने के लिये ज़रूरी है, इन से अलहदा होना। और उस तरह जीना, जैसे आप किसी अनुभव से होकर, ‘पहली दफा’ गुज़र रहे हों।

अब हम स्वप्न की संरचना पर गौर कर सकते हैं। इसके लिए हमें कुछ बुनियादी सवालों में जाना होगा।। स्वप्न बनते कैसे हैं? और क्यों बनते हैं? इन सवालों का जवाब जितना रचनाकार और उनकी रचनाएँ दे सकती हैं, उतना कोई मनोविश्लेषण नहीं दे सकता। फ्रायड इस मामले में ‘सभ्यताकरण के अंतर्विरोधों से पैदा होने वाले दमन’ को देख रहे थे। अनुभव के जिन रूपों का, यथार्थ के स्वीकृत रूपों के द्वारा, दमन हो जाता है—वे स्वप्न हो जाते हैं; ऐसा मानते हुए हम स्वप्नों के साथ—उनकी रचनाशीलता की सामर्थ्य के साथ—खासी नाइंसाफी कर रहे होते हैं। असामान्यतः की अभिव्यक्ति की ज़रूरतों का, ‘सामान्य’ के वर्चस्वी रूपों के द्वारा, दमन होता ही है और मानव जाति इस दमन को रूपांतरित कर, ज़्यादा मानवीय और स्वस्थ जीवन-व्यवस्था तक पहुंचनने की जद्दोजहद करती रहती है। परंतु जिसे हम रचनाशीलता कहते हैं—वह दमित यथार्थ तक सिमट जाने वाली वस्तु नहीं है। इसके उलट वह जीवन की समग्रता से, उसकी कुदरती ज़मीन से और दमन-रूपांतर के दुष्चक्रों के पार हो सकने से बावस्ता ऐसी मुक्ति है—जिसके बिना सब व्यर्थ हो जाता है।

स्वप्न की जीवन में मौजूदगी का यही अर्थ है। वह भौतिक-सामाजिक यथार्थ के समांतर मौजूद हो गये, जीवन के यथार्थ की आंतरिक दुनिया है। वह सभी प्राणियों के भीतर इसलिये मौजूद हो जाती है, क्योंकि वह भौतिक-सामाजिक विकास के मुकाबले, जीवन के विकास को हारते हुए देखना नहीं चाहती। स्वप्न, भौतिक-सामाजिक यथार्थ को, जीवन को समर्पित करने के मकसद से पैदा हुई रचनाशीलता की अभिव्यक्ति हैं। कुदरत, स्वप्न को, मनुष्य के जन्म के साथ, उसके भीतर उपजाती है। मनुष्य के जीवित होने का अर्थ और मकसद, उसके सपनों की दुनिया के भीतर छिपा रहता है। भौतिक-सामाजिक यथार्थ, इस विकास को अपनी परिभाषाओं से बांधता है। तब स्वप्न प्रकट होकर, मनुष्य को बचाते हैं। वे भौतिक-सामाजिक विकास की मंज़िल की तरह, जीवन को वहाँ सबसे ऊपर स्थापित करना चाहते हैं। इसलिये सपनों में सब कुछ, जीवन के रंग में रंग जाता है। जीवन-रूपों का अब तक का पूरा क्रमिक विकास वहाँ पड़ा रहता है। भौतिक-सामाजिक यथार्थ के द्वारा उपजायी विकासयात्राओं की विचारधारात्मक परिभाषाएँ, सपनों में जीवन-रूपों से जुड़े प्रतीकों में ढल जाती हैं और अलग ही तरह की परिणतियां पाती हैं। जितना ही हम भौतिक सामाजिक यथार्थ के सतहीपन से बंधते जाते हैं, स्वप्नों की अभिव्यक्तियाँ, उतनी ही जटिल और गूढ़ प्रतीकात्मक अर्थों वाली होती जाती हैं।

चूँकि कथा—या कहानी—सपनों की संरचनाओं के सबसे ज़्यादा करीब है—उसे ही रचनाशीलता की सर्वाधिक कुदरती विधा की तरह देखा जाना चाहिये। मानवजाति की आद्य-प्राक् रचनाशीलता, इसीलिये जिन मिथकों में दर्ज मिलती है, वह सामूहिक अवचेतन से पैदा हुई कथा मूलक अभिव्यक्ति जैसी है। वहाँ भौतिक-सामाजिक यथार्थ के विकास के सभी तरह के इतिहास तरल हो जाते हैं और पूरा यथार्थ एक शाश्वत से मालूम पड़ने वाले समय में ढल जाता है। समय के यों शाश्वत होने की कोशिश करने की वजह से, वहाँ मौजूद तमाम चीजे़ं या मनुष्य—प्रतीक मात्र मालूम पड़ते हैं।

प्रतीक क्या होता है? वह सामान्य समयक्रम को तोड़ने वाले अर्थों से चीज़ों का युक्त होना और देश का काल में एक हद तक विलय होना है। इससे रूप, एक नाम की शक्ल लेकर, भाषा के साथ सफर करने के लिये आज़ाद हो जाता है। तब वह हम सबके भाषा-संसारों के लिये, कुछ न कुछ अर्थ रखने वाला हो जाता है। परंतु कथा, मिथक तभी बनती है जब अभी भौतिक-सामाजिक यथार्थ की व्यवस्थाएँ और उनके इतिहास, मनुष्यों की चेतना पर पूरी तरह काबिज़ होने लायक नहीं हुए होते।

सामाजिक विकास के यथार्थमूलक इतिहासों के ताक़त पकड़ने से, समय की निर्बाध आज़ादी पर अंकुश लग जाता है। तब चीजे़ं अपनी प्रतीकात्मकता को एक हद तक खोने लगती हैं। अब स्वप्न, अपनी कथा जैसी रचनाशीलता को, प्रतीक-निर्भर न बनाकर, परिणतियों पर निर्भर करने लगते हैं। वे पूरा घटकर ही कोई अर्थ देने लायक हो पाते हैं। मिथकों के साथ ऐसा नहीं होता। इसीलिये लोगों को सपने में अगर कोई काली, कोई शिव, कोई ड्रैगन या कोई शैतान या संत नज़र आता है, तो अर्थों से संवेदित होने के लिये उतना पर्याप्त होता है। पर इनके प्रतीकार्थों से अब हमारी मुक्ति इतनी असंभव हो गयी है कि बीच में हमारी मुक्ति के बेशुमार दलाल आ गये हैं—बेशमार धर्मों के पहरुए और पुरोहित। शाश्वत प्रतीकों पर उनका क़ब्ज़ा पूर्णतया स्थापित हो गया लगता है। यह सामाजिक संस्थाओं-व्यवस्थाओं के मज़बूत होने से होता है। तब स्वप्न प्रतीक-भाषा और घटनामूलक-परिणतिओं की भाषा में विभाजित हो जाते हैं। समांतर रूप में मनुष्यों की रचनाशीलता भी कथा के अलावा काव्य को विधा की तरह विकसित करने लगती है। विशुद्ध घटनामूलक कथाएँ भी मुश्किल में पड़ जाती हैं। कथाओं पर काव्य का क़ब्ज़ा होता है, तो महाकाव्य पैदा होते हैं और मंच या मीडिया का क़ब्ज़ा होता है, तो नाटक और फ़िल्में सामने आती हैं। ये सब सामाजिक व्यवस्थाओं के मज़बूत हो कर, मनुष्यों की स्वप्न-मूलक रचनाशीलताओं में घुसपैठ के उदाहरण हैं। संस्थाएँ-व्यवस्थाएँ मज़बूत होकर, कथा में घटनाओं को परिणति-मूलक बनाना चाहती है। तर्क-संगत निष्कर्ष, व्यवस्था की बड़ी से बड़ी ज़रूरत है। व्यवस्थाएँ, मनुष्यों को, उनकी कुदरती स्वरूपमूलक रचनाशीलताओं के साथ, स्वतंत्र नहीं छोड़ सकती। इससे उन्हें अराजकता के फैलने का ख़तरा होने लगता है।

इसीलिये आधुनिक काल में, जब से कथा-कहानी ने अपनी केंद्रीय हो जाने की स्थिति को पाया है—उस पर स्पष्ट परिणतियों में ढ़लने का दबाव लगातार बना रहा है। इस इतिहास में बहुत विस्तार से जाना यहाँ मुमकिन नहीं लगता। उसे थोड़ा कल्पना के सहारे यहीं छोड़ सीधे निर्मल वर्मा में लौटते हैं।

निर्मल वर्मा ऐसे विरल कथाकार हैं, जो मनुष्य के सपने देखने की कुदरती रचना-सामर्थ्य की ज़मीन की खोज ईमानदारी व निष्ठा के साथ करते हैं। वे व्यवस्थाओं-विचारधाराओं के द्वारा आरोपित की जाने वाली परिणतियों के बंधनों को थोड़ी ढ़ीला कर, थोड़ा ख़ुद घूम-फिर सकने लायक होने की आज़ादी पा लेते हैं। इस लिहाज़ से वे भविष्य में प्रकट हो सकने वाली कहानी का एक पूर्वाभास हमें देते हैं।

यों ठीक से देखने की कोशिश की जाये तो हिंदी की कहानी की दुनिया में वे इस खोज के लिहाज़ से अकेले नहीं हैं। सभी बड़े रचनाकार अपनी कुछ बेहतरीन कहानियों में इसी तरह की खोज करते मालूम पड़ते हैं। प्रेमचंद की ‘पूस की रात’ में ठंड, अंधेरा, नील गायें, जबरा कुत्ता, अलाव और इस परिदृश्य की, शेष गाँव से—सामाजिक परिदृश्य से—एक तरह की अलहदगी, इसे स्वप्न जैसी संरचना प्रदान करते हैं। सामाजिक यथार्थ के ठोस इतिहास को इनके प्रतीकार्थों की तरह देखने की कोशिश बेकार लगती है। नील गायों का खेत चर जाना, वर्चस्वी ताकतों की क्रूरता या अमानवीयता के अर्थों का वहन करता मालूम नहीं पड़ता। यानी स्वप्न में कथा सर्वोपरि है, काव्य या प्रतीकार्थ नहीं। इस तरह देखेंगे तो समझना आसान होगा कि किस तरह स्वप्न, यथार्थ का प्रतीक-विकल्प नहीं होते। अपितु उसकी जीवनमूलक पुनर्रचना होते हैं। कथा और काव्य में अभेद केवल मिथकों में होता है। सामाजिक व्यवस्थाओं के मनुष्यों के जीवन पर हावी हो जाने के बाद, कथा और काव्य के काम अलहदा हो जाते हैं। कथा, ठोस इतिहास के तर्कसंगत समयक्रम को जीवनेतिहास के समयक्रम में ढ़ालती है और काव्य उसे इस समयक्रम से ही निजात दिलाकर एक तरल या शाश्वत समय में ले जाने की कोशिश करता है। फिर भी कभी कभी दोनों कुछ रचनाओं में एक साथ मौजूद नज़र आ सकते हैं। जैसे अज्ञेय की कृतियों में। मसलन, ‘असाध्य वीणा’ या ‘हीलीबोम की बत्तखें में’ या जैसे मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ या ‘ब्रह्म राक्षस’ में। निर्मल वर्मा में ऐसा बहुत कम होता है।

जयशंकर प्रसाद भी कथा और काव्य को अलहदा रखने की कोशिश करते हैं। उनकी ‘आँधी’ या ‘इन्द्रजाल’ जैसी कहानियाँ, स्वप्न-संरचना के कथा-रूपों की कहानियाँ हैं और इसीलिये वे बेहतरीन भी हैं। पर ‘स्वर्ग के खण्डहर में’ वे कथा को काव्य—जैसी संरचना से उलझा लेते हैं; जिससे वह कहानी न यथार्थ की इतिहास-व्यवस्था के अंतर्विरोध की ठीक से ‘परिणति’ बन पाती है और न स्वर्ग या नरक के काव्य जैसे प्रतीकार्थ के उजागर होने से मानव की नियति का कोई सार ही हो पाती है। इस से उसकी मूलवस्तु न इतिहास में ज़मीन पाती है, न मिथक या पुराण में।

परंतु जैनेन्द्र की ‘एक रात’ का स्वप्न में बदलता, स्वतंत्रता-संघर्ष वाला इतिहास, एक जीवन-नुमा संरचना पाने में ज़रूर कामयाब हो जाता है। सामाजिक इतिहास-व्यवस्था में स्त्री-पुरुष का संभोग जितनी बड़ी वर्जना बन कर सामने आता है और जिस क़दर अंधेरों में छिपने लायक वस्तु ही बना रहता है—उसी अनुपात में वह सपनों में मुखर अभिव्यक्ति पाता है। जैनेन्द्र साहसी कथाकार लगते हैं। वे स्वतंत्रता के संघर्ष को स्त्री पुरुष संबंधों की स्वतंत्रता के मुहावरे में ढ़ालते हैं। ‘रेल का प्लेटफार्म’ औपनिवेशिक सत्ता के विकास-कार्यक्रम का नुमायां इश्तहार है। वहीं इस कहानी के स्वतंत्रता-संग्राम लड़ने वाले स्त्री-पुरुष के बीच संबंध स्थापित होता है। इतिहास यहाँ पूरी तरह स्वप्न-भाषा में बदल गया सा मालूम पड़ता है। कहानी का अंत कायदे से वहीं हो जाना चाहिये था। पर जैनेन्द्र का दार्शनिक उसकी व्याख्या में रुचि लेकर कथा की इस स्वप्न-मूलक सौंदर्य संघटना को नुकसान पहुँचाने लगता है। निर्मल वर्मा, अस्तित्व के सवालों से जूझते-टकराते हुए भी, अपनी कहानियों में, कुदरती या सहज तौर पर प्रकट हुई स्वप्न-संरचनाओं में, कभी सजग हस्तक्षेप नहीं करते। निर्मल वर्मा पर गेटी थियेटर शिमला में पंद्रह सितंबर 2012 को हुई संगोष्ठी में तुलसी रमण ने निर्मल वर्मा की कहानी ‘सूखा’ की चर्चा चलायी और बताया कि उस कहानी के लिखने के बाद वे इस बात को लेकर परेशान थे कि कहीं उसका अर्थ सायास या ‘डेलिब्रेट’ कोटि का तो नहीं हो गया है। इससे उनकी कथा में स्वप्न-संरचनाओं का सम्मान करने की प्रवृत्ति का परिचय मिलता है।

निर्मल वर्मा की कहानी ‘लंदन की एक रात’ लंदन के वैश्विक दुःस्वप्न में बदल जाने का पता देती है। अपने बीयर-बार्ज़ और डांस-क्लब्ज के रूप में, लंदन गोया जागते हुए स्वप्न देखता है। इस कहानी में मृत्यु को आतंक में बदलती सामाजिक असुरक्षा, खुली आँखों से देखे गये सपने के इतने करीब है कि विस्मय होता है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद के हालात में, दुनिया भर से आये बेकार नौजवानों को आसन्न मृत्यु के रूबरू लाकर खड़ा करता यह विश्वनगर, एक अर्थ में उस दौर के ठोस समाजैतिहासिक यथार्थ का भी दुःस्वप्न है। इसीलिये यह कहानी ख़ुद निर्मल वर्मा के साहित्य में भी बेजोड़ लगती है।

कहानी की दुनिया का असल रूप, ऐसी स्वप्न-संरचनाओं की मार्फत प्रकट होता है। ‘स्वप्न’ कहानी की वास्तविक और कुदरती दुनिया है। निर्मल वर्मा अक्सर और ज्यदातर वहीं रहना पसंद करते हैं। परंतु कई दफा प्रयोगशील होने के लालच का संवरण नहीं कर पाते। जैसे ‘डेढ़ इंच ऊपर’ या ‘पैरेम्बुलेटर’ जैसी कहानियाँ हैं। ऊपर जिस संगोष्ठी का ज़िक्र किया गया है, उसमें भी नाट्य-प्रस्तुतियों के लिये इन्हीं को चुना गया—जो सांयोगिक नहीं है। ये कहानियाँ वाकई कहानी के भीतर नाटक जैसी संरचना को खोजने की ओर मुड़ गयी हैं। चेतना प्रवाह वाले शिल्प का मोह, प्रयोगशीलता के लिये अच्छा है, पर कहानी के कहानीपन के लिये उतना दुरुस्त नहीं है। नाटक, व्यवस्था के ‘इलीट’ की जन-स्वप्न में दखल की तरह है। मंच, दर्शकों के परे, वहाँ कहीं ऊपर स्थापित रहता है। चेतना-प्रवाह भी स्वप्न को पहले दिवा-स्वप्न में ढ़ालता है, फिर यथार्थ जैसे हालात से उसे जोड़ता है। इसलिये वह स्वप्न की तरह घट गयी घटनाओं की उत्तर-कथा भर होकर रह जाता है। यहाँ स्वप्न यों नहीं घटित होता, जैसे उसे दरअसल घटना चाहिये—अनायास, नींद में डूबते हुए किसी बेबूझ क्षण में, चेतना को पूरी तरह लीलते हुए, जैसे ‘लंदन की एक रात’ में घटता है। …. और ये कहानियाँ, निर्मल वर्मा की दूसरी कहानियों के मुकाबले कहीं ज़्यादा चर्चित होने के बावजूद थोड़ी कमज़ोर हैं। इनकी कमज़ोरी है—भाषा में संवाद का ऐसा और इतना ज़्यादा इस्तेमाल, जो कथा के घटनात्मक पक्ष पर भारी पड़ता है। जबकि स्वप्न को देखें तो समझ में आयेगा कि वहाँ भाषा कम से कम होती है। फ़िल्म की तकनीक ने दुनिया भर में चेतना-प्रवाह को इतना अहम बना दिया कि हम यह तय करने से चूक गये कि इससे कहानी के कहानीपन का कहीं कुछ नुकसान तो नहीं होता? बोलने पर इतना निर्भर होने से हमें घटित के साथ-साथ उसकी व्याख्या करने के लिये भी विवश होना पड़ता है। फ़िल्म में दृश्य इतना जटिल होता है कि उससे स्वप्न-संरचना को, कथा की रचनाशीलता को महफूज बनाये रखने में मदद मिलती है। तो फिर आप कमेंटरी भी कर सकते हैं और प्रलाप में भी जा सकते हैं। इसीलिये निर्मल वर्मा की वे कहानियाँ ज़्यादा अच्छी हैं जहाँ वे दृश्य पर केंद्रित होते हैं। मसलन ‘परिंदे’ या ‘जलती झाड़ी’। कुछ कहना नहीं पड़ता। दृश्य ही मुखर होकर, स्थिति में बदल जाता है और फिर उसके भीतर से प्रकट होती है इनकी नियति; उनकी कहानियों को अर्थ देती हुई; उनका निचोड़ बनती हुई। इसीलिये अर्थ के तल पर निर्मल वर्मा की कहानियाँ बेजोड़ मालूम पड़ती हैं क्योंकि ये अर्थ वहाँ ख़ुद उन स्थितियों ने उपजाये होते हैं।

-: 0 :-

स्थितियों के भीतर से नियति कैसे उपजती है, इसे थोड़ा व्यापक परिदृश्य में रखकर समझना ज़रूरी लगता है। पहले तो यही समझना होगा कि नियति कई तरह की होती है। आम तौर पर हम उसे साहित्य में कथा की परिणति के अर्थ की तरह समझने की कोशिश किया करते हैं। हालाँकि दरअसल वह ऐतिहासिक परिणाम-शृंखला होती है। चूँकि मानव समाजों में इतिहास, सत्ता के आख्यान की तरह खुलता है, इसलिये उसकी व्याख्या राजनीतिक या वर्चस्वी वर्गों की भूमिका से पैदा होने वाली नियति की तरह की जाती है। सत्ता पर काबिज वर्गों को इतिहास का नियतिमूलक निष्कर्ष बताया जाता है। या फिर सामाजिक नियति की बात होती है—जिसे विचारधाराओं के द्वारा स्थापित किया जाता है। आर्थिक, वर्गगत या सांस्कृतिक विचारधाराएँ, मानव की नियति को तय करने वाली वस्तुएँ बन जाती हैं।

परंतु कथा की स्थितियाँ—इन तमाम सामूहिक नियतियों से प्रभावित होती हुई भी—अपनी नियति को ख़ुद तय करने और रचने की कोशिश करती हैं। वे इस लिहाज़ से, मनुष्य के ख़ुद अपने जैसा हो सकने के लिये, थोड़ी ‘स्पेस’ खोजती हैं। ये ‘स्पेस’ मिलती है—कथास्थितियों को—थोड़ा स्वप्न जैसा हो सकने की मोहलत और आज़ादी देने से। इसके लिये, यथार्थ से उपजी कथास्थितियाँ, इस यथार्थ के ठोस चौखटों को, थोड़ा ढ़ीला करती हैं। वे हालात की परवश बनाने वाली जकड़-बंदियों को भले ही तोड़ पाने में कामयाब न हो पाती हों पर वे उन्हें तरल ज़रूर बनाती हैं। ठोस यथार्थ का मतलब है—संस्थागत व्यवस्थाओं वाला यथार्थ। उसमें मनुष्य के पास व्यवहारगत आज़ादी हो न हो, सपने देखने की आज़ादी तो रहती ही है। तो, सपनों के तल पर मनुष्य उस तरह का हो सकता है, जैसा उसे दरअसल होना चाहिये था। इससे उसे कोई वैकल्पिक नियति हासिल नहीं होती, परंतु वह ठोस यथार्थ से थोड़ी अलहदगी का लुत्फ या संकट या अवसाद तो अपने लिये बटोर ही पाता है। वह इस तरह ऐसा करता हुआ ठोस यथार्थ के इतिहासमूलक और विचारधारात्मक आरोपणों को अपने से अलग वस्तु ज़रूर साबित कर पाता है। इस तरह वह गैर ज़रूरी परायेपन के अवसाद के बरअक्स वह होने की कोशिश भी कर पाता है—जो वह दरअसल है। जीने की क्षमता वाला चीज़ों को यों छूने और भोगने वाला, जैसे कि वह उन्हें पहली दफा देख रहा हो।

निर्मल वर्मा को लगता है कि हम बड़े होते हुए यथार्थ को जीने के उन तरीकों को खो देते हैं, जिन्हें हमने बचपन के अपने अनुभवों में शिद्दत भरे क्षणों में भोगा होता है। एक अर्थ में वे मनुष्य के व्यस्त होने की आलोचना करते हैं। सभ्यताकरण की प्रक्रिया में उपजे अंतर्विरोधों के द्वारा मनुष्यता के कुदरती रूप के क्षरित हो जाने के सवाल की गहराई में उतरने हैं। जीवन को कुदरती रूप में या शिशु—जैसे भोलेपन के साथ जी सकने की हमारी जो असल ज़मीन है—वह उनकी कहानियों की स्थितियों की नियति बनकर प्रकट होने की कोशिश करती है। परंतु इस नियति को इतिहासगत और विचारधारागत नियतियों ने इस क़दर बेबस और बेदम किया होता है कि उनकी कहानियाँ हमें एक गहरे अवसाद में या हमेशा मौजूद रहने वाले मृत्युबोध में ले जाती हैं। ऐसा क्यों होता है?

क्योंकि हम एक आधुनिक समय की उपज हैं। आधुनिकसमय में भी उसके पतनशील उत्तर-काल की उपज और वह भी ऐसा, जो औपनिवेशिक परवशताओं से जकड़ा हुआ है। और जिससे बाहर निकलने का एक तरीका है—अपनी ज़मीन और परंपरा से उखड़ या उजड़ कर प्रवासी हो जाना। हालाँकि ऐसा करने पर हम वर्चस्वी यूरो-अमरीकी परिदृश्य या इतिहास में कभी बराबर के हिस्सेदार नहीं हो पाते। तब हम हर तरफ़, अजनबी बनाने वाली कुण्ठा से लड़ते हुए, जो कर पाते हैं, वह बस इतना ही होता है कि हम ख़ुद को खोने से बचा लें। हम जीवन जी सकने की अपनी जमीनी और कुदरती सामर्थ्य या अधिकार को बा-बुलंद तरीके से, अपने जीने की शैली बना लें और इसी अर्थ में अपनी परंपरा को, नये रूप में खोजे और उतना ही उससे राजी हों, जितने को हम अपनी खोज की तरह—अपनी वस्तु की तरह—पा सकें। निर्मल वर्मा इन्हीं अर्थों में खालिस भारतीय चेतना वाले कहानीकार मालूम पड़ते हैं। औपनिवेशिक कुण्ठा से बचने की कोशिश में आत्मघाती संघर्ष को शहादत बनाने का रोमानीपन उनमें नहीं है। न ही अपनी परंपरा के अतीतपन के पुनरुत्थान में उनकी कोई दिलचस्पी है। आयातित विचारधारा के संघर्षशील चौखटे के अंतर्विरोध भी उन्हें रास नहीं आते हैं। इस लिहाज़ से देखें तो उनकी जीवन-मूलक जद्दोजहद, बड़ी मौलिक रचनाशीलता का पता देती है। वह मौलिक है, इसीलिये कीमती और बचा लेने लायक भी हैं।

परंतु इस तरह की समांतर जीवन-मूलक नियति की खोज के लिये, हमारे पास इतनी सुविधा तो होनी ही चाहिये कि हम अपने एकान्त के साथ कुछ वक़्त फुर्सत से अकेले रह सकें। यह अकेलापन वाकई एक प्रवासी चीज़ है और या फिर यह कुलीन (इलीट) के हिस्से आता है। औपनिवेशिक लूट खसूट से किसी तरह उबर पाने की कोशिश करते एक ग़रीब हो गये मुल्क के मनुष्य, अभी रोजी-रोटी के संघर्ष में ही मरणांतत तरीके से उलझे नज़र आते हैं। बेशुमार लोगों वाले ऐसे देश में अकेले हो जाना और वह भी अपने मौलिक तरीके के एकान्त के साथ—एक तोहफे को पा लेने जैसा है। भारतीय मध्यवर्ग ने इस संभावना को अक्सर ‘आइडियलाइज़’ किया है, परंतु यह एकान्त उसके पास भी तभी आता है, जब वह इसे अपनी परंपरा के भीतर से खोज लेता है। निर्मल वर्मा अपनी रचनाशीलता के आखि़री पड़ाव में इसी समस्या का हल खोजते दिखायी देते हैं।  ख़ास तौर पर निबंधों में और आखि़री उपन्यास ‘अंतिम अरण्य’ में। तथापि उनकी इस अनिवार्य भारतीयता के बीज, हमें उनकी तकरीबन सभी कहानियों में मौजूद मिलते हैं। फिर चाहे वह ‘जलती झाड़ी’ के नैरेटर की भोगवाद में अरुचि हो या ‘परिंदे’ की लतिका का प्रेम के मामले में आत्मानुशासन हो और या फिर ‘लंदन की एक रात’ के भारतीय का प्रवासी होकर भी घर से जुड़े रहने का आग्रह हो। क्या यह नियति का भारतीय चेहरा मोहरा ही नहीं है?

भारतीयता, उनकी कहानियों में चले आये प्रवासीपन के बावजूद, वहाँ भीतर मौजूद अर्थ की आखि़री पर्त की तरह अन्यार्थों से चिपकी रहती है। प्रवासीपन, यहाँ अस्तित्व की तलाश की तरह है—जिसकी आखि़री पर्त आत्म की तलाश में बदलती हुई, चेतना की ज़मीन पर भारतीयता की शक्ल में ढ़ल जाती है। अस्तित्व, यूरो-अमरीकी परिदृश्य से उपजा दर्शन है जो चुनाव के संकट को झेलने से प्रकट होता है। हम जो चुनते हैं, वह हमारे लिये जो भी लाता है—अंधेरे या रोशनी के हालात—उनके लिये हम ख़ुद जिम्मेवार होते हैं। इस तरह हम अपने करीब आते हैं और अंततः अस्तित्व तक पहुँचते हैं। भारतीय परिदृश्य में—औपनिवेशिक अतीत की वर्तमान में पड़ती परछाइयों की वजह यह है कि अभी तक हमारे पास चुनाव के बहुत से विकल्प मौजूद नहीं हो पाये हैं। जो कुछ करने लायक मिलता है या खुलता है—वह अमूनन हमारा चुनाव न होकर, परिवेश के दबाव से उपजी विकल्पहीनता से जुड़ा रहता है। इसलिये भारत में सब सत्ता को, सियासत को कोसते हैं—अपने दुःखों के लिये, दूसरों को जिम्मेवार मानते हैं। नतीजतन, यहाँ ‘अस्तित्व’ की बात बेगानी या प्रवासी लगती है।

पर यह प्रवासियों का यथार्थ है। उसे एकदम अभारतीय वस्तु घोषित नहीं किया जा सकता। जो लोग भारत के हैं, पर प्रवासी होने की मोहलत या मौके पा गये हैं—वे अस्तित्व और आत्म के बीच डोलते रह जाते हैं। निर्मल वर्मा की कहानियाँ इसी अक्षांश पर गतिशील हैं। नितांत विकल्पहीन हालात में, मुक्ति का विकल्प क्या है? वह परंपंरागत भारतीय दर्शन की विरासत से ताल्लुक रखता है। तब हम यथार्थ को क्षणिक-नश्वर वस्तु की तरह देखते हुए, वरास्ते वैराग्य-सीधे आत्म में छलांग लगाते हैं। निर्मल वर्मा की कहानियों में यह पूरा सफर-यहाँ से वहाँ तक का एक ‘रोप-वे’ जैसा सफर है। एक रस्सी है, जो इस पहाड़ी से उस पहाड़ी तक बंधी हुई है और हम एक शिखर से, सीधे दूसरे शिखर तक चले जाते हैं, बिना यथार्थ की अंधेरी जांगल घाटियों में उतरे।

मसलन ‘जलती झाड़ी’ को लें। अस्तित्व तक पहुँचने के लिये आप चुन सकते हैं कि आपको मछुआरे की तरह सारा सारा दिन वहाँ अकेले बैठे मछलियों की इंतज़ार करनी है या मौका पा कर किसी स्त्री के साथ झाड़ी के पीछे वाली आग में जा झुलसना है। तीसरा विकल्प है—इन दोनों स्थितियों के साक्षी होने का और प्रवासी होने के बावजूद एक विकल्पहीन व्यवहार-शैली अपनाये रखने की चेतना का। यह चेतना, एक ख़ास तरह के भारतीय आत्म-बोध के करीब पड़ती है। एक दफा हम ऐसी चेतना से ख़ुद को युक्त पाते हैं, तो विकल्प खुले होने के बावजूद हम साक्षी बने हुए ही लौट आते हैं। क्योंकि वह सब किये बिना हम जानते होते हैं कि उन रास्तों पर जाने से हम ख़ुद को खो देंगे। निर्मल की कहानियों के पात्रों में यह चेतना है इसीलिये वे दूसरों से संबद्ध होकर भी, ख़ुद से यह सवाल पूछते रहते हैं कि वे वहाँ क्यों हैं? यह एक तरह का भारतीय आत्मबोध है, जो अपने कहीं भी होने को अपनी खोज के संकट की तरह ग्रहण करता है। इसीलिये ‘परिंदे’ की लतिका अब किसी और से संबद्ध नहीं हो पाती। अब वह किसी ‘अन्य’ की मार्फत, ख़ुद को खोजने की स्थिति से आगे निकल चुकी है।

परंतु शायद यह चेतना, नियति जैसी वस्तु भी नहीं है। क्योंकि यह जीवन के उस स्रोत की तरह भी है, जहाँ से सफर शुरू होता है। इस के साथ निर्मल की कहानियाँ एक अलग शख्यीयत हासिल करती हैं, एक नितांत अपने जैसे प्रामाणिक मनुष्य की शख्यीयत।

डॉ विनोद शाही


परिचय

डॉ विनोद शाही

आलोचना व विमर्श : साहित्य के नए प्रतिमान, भारतीय सभ्यता का आत्म-संघर्ष, भारतीय भाषा दर्शन, मार्क्सवाद और भारतीय यथार्थवाद, प्राच्यवाद और प्राच्य भारत, हिंदी साहित्य का इतिहास, हिंदी आलोचना की सैद्धांतिकी, कथा की सैद्धांतिकी, संस्कृति और राजनीति, रामकथा, आलोचना की जमीन, जयशंकर प्रसाद, बुल्लेशाह, समय के बीज आख्यान, वारिसशाह पतंजलि योग दर्शन, कालजयी उपन्यास, नव इतिहास दर्शन, नव काल विभाजन, नव लोक संस्कृति विमर्श, भाषा दर्शन और हिंदी, डी डी कोसंबी।

संपादन: जगदीश चंद्र रचनावली ( चार खंड ), तमस, गांधी और हिंद स्वराज, भगत सिंह : इन्कलाबी चिंतन, प्रतिनिधि कहानियां: एस आर हरनोट, भालचंद्र जोशी और राजकुमार राकेश।

उपन्यास: ईश्वर के बीज और निर्बीज

कहानी संग्रह: इतिहास चोर, अचानक अजनबी, ब्लैक आउट, श्रवणकुमार की खोपड़ी
नाटक: पंचम वेद, झूठ पुराण, जुआघर

काव्य: नये आदमी का जन्म , कवि के मन से (संपादन प्रताप सहगल)

सम्मान व पुरस्कार: रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान, शिरोमणि साहित्यकार सम्मान,वनमाली कथा आलोचना सम्मान , राजस्थान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का समय माजरा आलोचना सम्मान, ‘पंचम वेद’ के लिये अवितोको नाटक लेखन प्रेरणा पुरस्कार, आकाशवाणी पुरस्कार तथा आकाशवाणी पुरस्कार , जुआघर (एक हत्या की हत्या) और ‘झूठ पुराण’ के लिये साहित्य कला परिषद पुरस्कार

drvinodshahi@gmail.com

Exit mobile version