बेशक मैं किसी दूसरे स्कूल में अध्यापक था लेकिन फिर भी मुझे प्राचार्य के साथ उस प्रतियोगिता का मुख्य अतिथि बनने का अवसर मिल गया | इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि इस प्रतियोगिता के अम्पायर जिला खेलकूद प्राधिकरण से थे जो मेरे मित्र थे | मैच शुरू हुआ तो वह कहीं दिखाई नहीं दिया | फिरोजपुर स्कूल लीड कर रहा था | होस्ट स्कूल हारते देख प्राचार्य ने फिजिकल अध्यापक को बुलवाया |
उसे करीब बुला कर कहा , “सदानंद को खिलाओ , नहीं तो यहीं हार जाओगे, देखते रहना फिर नेशनल के सपने |”
पी ई टी बहुत धीमे स्वर में बोला : “सर उसे बुखार है वह नहीं खेल पायेगा |”
“फिर भी खिलाओ | बोलो प्रिंसिपल सर ने बोला है |”
पी ई टी वापिस चला गया | मैं प्राचार्य की बगल में था सो वार्तालाप आसानी से सुन लिया |
अभी खेल समाप्ति में अंतिम दस मिनट बचे थे और स्थानीय टीम बुरी तरह हार रही थी | बच्चों में खामोशी थी |
अचानक खेल रोक दिया गया | पता चला, सदानंद को एंट्री दी जा रही है | सदानंद ने जैसे ही खेल के मैदान में छलांग लगाई वैसे ही चारों तरफ दर्शक दीर्घा में खड़े बच्चों ने तालियों से सदानंद का स्वागत किया |
बीच में से आवाजें आने लगी |
कोई कहता बंगाली आ गया, अब तो समझो बुक हो गया फिरोजपुर |
एक छोटा सा बच्चा जोर से चीख कर बोला : बंगाली भैया काला जादू मारो | जय कलकत्ते वाली, तेरा वार न जाये खाली |
पीछे पीछे और भी बच्चों ने यह दुहराना शुरू कर दिया |
एक बच्चे ने नारा दिया : काला जादू
बाकी सब बोले : कर ले काबू |
बंगाली भैया |
जिंदाबाद
बुखार का सेक सदानंद की आँखों और देह से निकल रहा था | लम्बा छरहरा शरीर किसी नौका की पतवार सा पंतालिस डिग्री कोण बना कर, हमले से पूर्व किसी चीते सी पोजीशन लेता हुआ, अपने लम्बे से हाथ की उँगलियों में जकड़ी हैण्ड बॉल को घुमा कर दो पोल के बीच फेंकता तो लगता जैसे कोई आदिमानव पृथ्वी को समन्दर में फेंक रहा है |
मुझे उसका काला बदन, मोटे नैन नक्श, घुंघराले बाल किसी अफ्रीकन खिलाड़ी का आभास देते | मैदान में उतरते ही ही वह दैहिक पीड़ा भूल चूका था | वह चीते की फुर्ती से बॉल मैदान के किसी भी कोने से निशाना मरता जो एकदम सटीक रहता |
हारती हुई टीम दो तीन मिनट में ही बराबरी पर आ गई | बच्चों में कमाल का जोश आ गया |
अंतिम गोल करते ही सदानंद मैदान पर ही गिर गया | उनके स्कूल की टीम जीत चुकी थी | फिजिकल अध्यापक ने उसे तुरंत पानी पिलाया और सहारा देकर अपने रूम में ले गया |
खैर वह लड़का हीरो बन चुका था |
वह अब ठीक था |
मैं उसे उस दिन पहली बार मिला था, और उसके बाद हम अक्सर ही मिलते रहे | उसका बड़ा कारण मैं नहीं वही था |
मैंने उसको उसकी पीठ पर हाथ रखा और शाबाशी दी | उसके चेहरे पर ख़ुशी की लहरें दौड़ने लगीं |
“थैंक यू सर |”
उसने कहा और मेरे पाँव छुए |
मैं हैरान इस बात पर था कि इतने शानदार खिलाडी को कप्तान क्यों नहीं बनाया गया | उस दिन मैं वापिस आ गया लेकिन एक सवाल जिद्दी बच्चे की तरह मस्तिष्क के किसी कोने में बैठ कर मैदान से मेरे साथ ही आ गया |
इसको कप्तान क्यों नहीं बनाया ?
मेरे कुछ अध्यापक दोस्त उस स्कूल में थे | मेरी एक दोस्त एल चेरियन उस स्कूल में गणित की अध्यापिका थी | एकदम कड़क अध्यापिका | बच्चे दूर से आते देख गणित करने बैठ जाते | अनुशासन उसकी जीवन शैली था | झूठ और झूठे लोग उसके आस पास भी नहीं फटकते | शिलांग में एक बार हम एक साथ काम कर चुके थे | वह अक्सर ही हमारे घर आ जाती | वैसे भी न कोई उसके यहाँ आता जाता था न ही वह किसी के यहाँ आती जाती थी | जब भी मन उचाट होता या बहुत खुश होता तो वह हमारे यहाँ आ जाती | बस यह कह लीजिये कि हमारे परिवार का हिस्सा हो गयी थी | एक दिन जब घर आई तो मैंने पूछा ?
“ चेरियन वो तुम्हारा स्टूडेंट सदानंद कैसा है ? अब तो परीक्षाएं आने वाली हैं , पढाई में कैसा है वह ?”
“अब क्या बताऊँ ? मेरे ही सब्जेक्ट में सबसे कमज़ोर है |”
“पास होने के कितने आसार हैं ?”
वह हल्का सा मुस्काई | फिर बोली : “कोई चांस नहीं |”
“अरे यार ! कुछ करो न ? वह फेल हो गया तो उसके साथ ही उसकी सारी प्रतिभा भी मर जाएगी |”
“हाँ तुम सही कहते हो | जो उसकी कला है, वही तो उसका काला जादू है | हर बच्चा अलग है यह आप भी जानते हैं मैं भी | बेचारे की शक्ल सूरत अलग सी है तो हर जगह वह मार ही खाता रहता है | बच्चों ने इसका नाम बंगाली बाबा रखा है | वह बुरा नहीं मानता | बाप ऑटो चलाता है और माँ घरों में काम करती है | अंग्रेजी, साइंस और गणित उसके लिए साइबेरिया का जंगल है | मगर हिंदी और कला इसकी ज़मीन है | कोई चित्र हो या पोस्टर कोई मूर्ती हो या आकृति वह तुरंत उसमें खो जाता है | यही इसकी दुनिया है | बच्चे अक्सर ही इसे छेड़ते रहते हैं | वह किसी की परवाह नहीं करता | अपनी ही धुन में रहता है | अभी नेशनल खेलने गया है | प्रिंसिपल जानता है उसके बिना स्कूल ट्राफी नहीं जीत सकता | मैंने मना किया था लेकिन उसे जबरदस्ती हैदराबाद भेज दिया | बोले रिजनल टीम में उसका सिलेक्शन हुआ है | यह हमारे स्कूल ही नहीं पूरे रीजन की इज्जत का सवाल है |
वह कुछ देर रुकी तो मेरे भीतर और कुछ जानने की जिज्ञासा जाग उठी | मैंने कहा……. फिर ?
फिर क्या , स्कूल और रीजन जीत जायेगा और सदानंद हार जायेगा | वह गणित में , मेरे विषय में पास नहीं हो सकता |”
“एक सवाल और |”
“पूछिए ?”
“उसे स्कूल टीम का कप्तान क्यों नहीं बनाया गया |”
“हूँ सही सवाल |”
“द्रोणाचार्य …..नाम तो सुना ही होगा | अब जो बच्चा कप्तान है, वह प्रिंसिपल के ख़ास अध्यापक का बेटा है | समझ लीजिये सदानंद एकलव्य है | जो सीखा है खुद से सीखा |
देखिये बच्चों में कोई भेदभाव नहीं है, लेकिन बड़ों में है |
मैंने स्वीकार किया |
“चेरियन, मालूम है सारे विकार ही हमारी बुद्धि की पैदावार हैं |”
वह हँसी |
उस बच्चे की इस कहानी ने मुझे उसके और करीब ला दिया | मेरे पास वह अक्सर ही शाम को आ जाता | आर्ट में कमाल का हाथ था उसका | मैंने उसके कुछ पेन्सिल स्केच देखे तब ही अंदाज़ा लग गया था कि यह बच्चा विलक्षण है |
परीक्षाओं के बाद वह मिला | खुश था | उसने बताया वह पास हो जायेगा | मुझे उसके इस वक्तव्य पर शंका थी |
फिर मेरा स्थानान्तरण कहीं बाहर हो गया | दो तीन महीने बाद अपने शहर लौटना होता तब इतना समय ही नहीं मिलता कि उस लड़के की कोई खोज खबर मिलती | एक दिन उसका आमंत्रण मिला | मैं हैरान इस बात पर नहीं था कि वह आर्टिस्ट बन गया है और उसकी तस्वीरों की प्रदर्शनी चल रही है | हैरत तो उसका मुझे याद रखना है | लगभग पांच साल बाद हम मिले | हमेशा की तरह उसने मेरे पाँव छुए | मैंने गले से लगा लिया | एक एक चित्र के पास वह मुझे ले कर गया | मैं उसकी कला की बारीकियां देखता रहा |
फिर उसके दो साल बाद मेरी सदानंद से मुलाकात तब हुई जब मैं प्राचार्य बन कर अपने शहर में वापिस आ गया | मैं एक इंटरव्यू बॉडी का सदस्य था | उसी सिलसिले में एक स्कूल में गया था | जैसे ही मैंने स्कूल में प्रवेश किया गलियारे में लगे चित्रों को देख कर लगा जैसे यह चित्र मैंने कहीं देखे हैं | सोच ही रहा था कि सामने से सदानंद आता दिखाई दिया | शरीर भर गया था | लम्बा कद और वही घुंघराले बाल , चाल में अलग तरह का आत्मविश्वास | मुझे देखते ही वह हमेशा की तरह मुस्काया | आते ही चरण स्पर्श किये |
“तुम सदानंद यहाँ ?”
“हाँ सर , आज कल मैं यहाँ कला अध्यापक हूँ |”
वाह ! यह तो बहुत अच्छी बात है | तुम अध्यापन में आ गए चलिए कुछ बच्चों की तो ज़िन्दगी संवर ही जाएगी |
जी सर आपका आशीर्वाद मेरे साथ है | जरुर कुछ अच्छा ही करूँगा |
यह चित्र देखते हुए एकदम से तुम्हारा ही ख्याल आया |
जी सर ! यह तो मेरा सौभाग्य है कि आप मेरी टेढ़ी मेढ़ी रेखाओं को भूले नहीं हो |आपने तो बड़े बड़े महान कलाकारों का भी काम देखा है यह तो आपका बडप्पन ही है कि इस अदना से बच्चे का काम याद रखे हुए हैं |
इस से पहले कि मैं स्कूल के प्राचार्य दफ्तर में घुसता वह मुझे अपने कला कक्ष में ले आया | अन्दर घुसते ही मैं अलग अलग कला प्रोजेक्ट्स में जुटे बच्चों को देखता हूँ | कोई पोस्टर बना रहा है | बच्चो आज मैं आपको जिन से मिलवा रहा हूँ उनके चरणों में मेरा सिर झुक जाता है | आप हैं मेरे गुरु श्री सत्य प्रकाश !
सभी बच्चे मेरे चरण स्पर्श कर अपने अपने कामों में जुट जाते हैं |
बच्चों की एक टीम मेरे पास आती है |
“सर हमको आपका इंटरव्यू करना है |”
मैं हाँ कर देता हूँ |
एक लड़का अपना कैमरा ट्राईपोड पर लगाता है | दूसरा सेटिंग कर रहा है | तीसरा मेरी शर्ट पर कॉलर माइक फिट कर देता है | दो बच्चे साथ कुर्सी लगा कर बैठ जाते हैं | एक लड़का लाइट्स मेरे चेहरे पर फोकस कर देता है | एक लड़का खड़े खड़े ही मेरा इंट्रो देता है |
आनन फानन में एक छोटी सी इंटरव्यू बच्चे कर लेते हैं |
कुछ सवाल जो मुझे झंझोड़ गए |
होम वर्क कितना जरुरी ? हमारे देश में पढाई लिखाई का ज्ञान से कितना सम्बन्ध है ? क्या हमारी पढाई हमको कायर बनाती है ? जब विज्ञान के लिए हाई मेरिट चाहिए तो फिर आर्ट्स के लिए चालीस और तेतीस परसेंट क्यों मान्य हैं ? नक़ल करने वाले छात्रों को आप किस श्रेणी में रखेंगे ?
मैं उनके सवालों से चमत्कृत हुआ जा रहा था |
आम तौर पर जिस विषय को फालतू का समझ कर स्कूल कोई महत्व नहीं देते उसी विषय को डिजिटल कौशल से जोड़ कर अध्यापक ने कला के पूरे फ़लक का प्रयोग करने की कोशिश की थी | बच्चों की सोच को पंख दे दिये थे | मन ही मन सदानंद पर मुझे गर्व हो रहा था | इसके बाद चाय आ गई | मैंने चाय पी और प्राचार्य दफ्तर में चला गया |
सदानंद का घर मेरे घर से करीब करीब एक किलो मीटर ही होगा |
उन दिनों कभी कभी मैं टहलता हुआ सदानंद के पास चला जाता था | उस दिन भी मन हुआ | आज अभी सुबह के नौ बज चुके थे लेकिन जनवरी की सुबह थी लगता था सुबह के सात बजे हों | सदानंद के यहाँ जाने को जैसे ही निकला बाहर कोहरा ही कोहरा | एक बार मन हुआ लौट आता हूँ लेकिन फिर हमेशा की तरह मन को जीत कर आगे बढ़ता हूँ | मैं प्रकृति के इस खेल को जानता था | जितना कोहरा होगा उतनी अच्छी धूप भी खिलेगी | मैं जेकिट की चेन थोडा ऊपर को खिसकाता हूँ | कैप से कानों को पूरी तरह ढक लेता हूँ | ठंड रोकने के इतना कुछ प्रयास करने बाद भी मैं स्वयं को असमर्थ पाता हूँ | अभी मैं सदानंद के घर तक पहुंचा भी न था कि प्रकाश धुंध की नमी को सोखता हुआ धरती पर फैलने लगा था | मुझे कुछ राहत मिलती है | सदानंद कभी कभार मेरे पास आता तो हम भारत की स्कूल शिक्षा पर लम्बी लम्बी चर्चाएँ करता |
आज जब उसे मिला तो लगा उसकी तबियत ठीक नहीं है | गेट खोलते हुए वह खांस रहा था |
क्या हुआ सदानंद ? तबियत तो ठीक है ?
नहीं सर | ठंड लग गयी है |
सदानंद तेतीस का हो चला था | शादी के बारे में पूछा तो बोला : आज तक शादी ने किसी का कुछ संवारा हो तो इस सवाल पर सोचा जाये | सभी वही करते हैं | मैं भी करूँगा | पहले बच्चे पैदा होते ही उनसे आशाएं पैदा हो जाएँगी और फिर बुढ़ापे में दिल टूटेगा |
मैंने कहा : नहीं सबके साथ ऐसा तो नहीं होता | तुमने अपने माता पिता का दिल तोडा हो तो तुम्हारे बच्चे तोड़ेंगे |
वह बोला : “यह जरुरी तो नहीं मेरे बच्चे मुझ पर ही जाएँ | मेरी पत्नी के माता पिता पर भी तो जा सकते हैं या पत्नी पर भी | इनमे से कोई खडूस निकला तो बस वही कहानी बन जायेगी |” फिर वह हंसने लगा |
सदानंद अकेला रहता है | माता पिता कलकत्ता चले गए | बड़ा भाई शादी शुदा है उसका अलग मकान है |
“छोडिये सर | मैं चाय बनाकर लाता हूँ आपके लिए | वह किचन में चाय बनाने जुट जाता | मेरे प्रश्नों की कसी रस्सी पर उसके जवाब कुशलता से चल रहे थे |
जब भी वह मिलता तो बच्चों के अतिरिक्त उसके पास कोई टॉपिक नहीं होता | उनकी व्यक्तिगत समस्याएं भी वह उठाए फिरता |
एक दिन बोला सर आप क्या समझते हैं ?
परीक्षा हाल में आप ड्यूटी पर हों और आपका प्रिय छात्र भी उसी हाल में है | आप यह जानते हैं कि वह पास नहीं होगा | तो ऐसे समय में वह नक़ल करना चाहे तो क्या आप उसे पकड़ कर बाहर निकल देंगे या केस बना कर उसका भविष्य ख़राब कर देंगे या वार्निंग दे कर छोड़ देंगे या उसकी तरफ से मुंह फेर लेंगे ?
आज उसके सवाल कसी रस्सी थे जिस पर मेरे जवाब संतुलन खो देने के भय से चलना ही नहीं चाहते थे |
मैं सदानंद की ओर देखता हूँ फिर असहाय सा महसूस करने लगता हूँ | सामने वाली खिड़की बंद है ,सूरज की रोशनी उसकी झिरियों में से निकल कर फर्श पर फ़ैल रही है |
मैं खिड़की खोल देता हूँ | खिड़की से प्रकाश कूद कर भीतर आ जाता है | बाहर ठंड बहुत अधिक है इसके बावजूद प्रकाश का भीतर आना हम दोनों को अच्छा लगा | मैं प्रकाश की तरफ पीठ करके खड़े हो जाता हूँ | मेरी पीठ जितना प्रकाश का हिस्सा कट जाता है |
देखो सदानंद यह प्रकाश हमारे लिए सबसे प्रिय है इसके बिना हम जी नहीं सकते | तुम यह खिड़की बंद करते हो तो अपने प्रिय से कट जाते हो | लेकिन अगर खोलते हो ठंड से तुम और बीमार पड़ जाओगे | हो सकता है तुम्हे निमोनिया हो जाये |
तब करना क्या है ? उसने सवाल किया |
हाँ इस प्रश्न का उत्तर ही तुम्हारे प्रश्न का जवाब है |
तुम खिड़की खोल दो | खिड़की खुलने से ही प्रकाश बंधन मुक्त हो जायेगा | वैसे भी प्रकाश झिरियों में से झांकता रहेगा |
तब अगर ठंड से निमोनिया हो गया तो ? उसने एक और प्रश्न किया |
हाँ यही निमोनिया तो आपका इखलाक है | इसको दुरुस्त रखने के लिए आप खिड़की की तरफ पीठ करके खड़े हो जाओ | आपको निमोनिया कभी नहीं होगा |
वह बोला : अजीब बात है सर | आप मुझे आंखे मूँद लेने को कह रहे हैं |
हाँ सदानंद …घर में प्रकाश आना बहुत जरुरी है | नहीं आयेगा तो हमारे भीतर का प्रकाश मर जायेगा |
जी सर ! लेकिन जो आदमी हमेशा प्रकाश का सामना करता आया हो उसके लिए पीठ करना आसान काम तो नहीं है |
हाँ ! मैं कब कहता हूँ आसान है | सब कुछ तुम पर निर्भर करता है | तुम नायक और निर्णायक दोनों ही तो हो | फिर इस कृत्य से पैदा होने वाली पीड़ा और सुख भी तुम्हारा ही होगा |
तो फिर तो अपनों के लिए पीड़ा उठानी ही पड़ेगी | वह मुझसे विपरीत दिशा में देखते हुए बोला : फिर तो अपनों के लिए इकलाख की पीड़ा झेलनी ही होगी |
दो माह बाद अप्रैल के पहला सप्ताह होगा सदानंद का अचानक फ़ोन आया |
सर कहाँ हैं आप ?
मैंने कहा ,ड्राइव कर रहा हूँ | क्या हुआ सदानंद ?
कुछ नहीं , बस मिलने का मन था इसलिए फ़ोन किया |
हाँ तो मैं आता हूँ न |
बस आधे घंटे में शहर पहुँच जाऊंगा |
घर आ जाओ |
मैं पहुंचा तो देखा वह अपने लॉन में बैठा , मेरा इंतज़ार कर रहा था | सुबह के नौ बजे थे | धूप अच्छी खासी होने के बावजूद बदन को चुभ नहीं रही थी |
वह पानी ले आया | फिर जहाँ मैं बैठा था, वहीँ मेरे सामने रखी कुर्सी पर वह भी बैठ गया |
बोलो सदानंद क्या बात है ? आज तुम्हारा चेहरा कुछ व्यक्त करना चाहता है | बताओ क्या बात है ?
कुछ ख़ास नहीं सर पर ….”
पर क्या ?
यही कि मैं अपने जीवन में पहली बार खिड़की की तरफ पीठ कर के खड़ा हुआ |
तो फिर कैसा लगा ?
आत्मग्लानि हुई | अब भी हो रही है | इसीलिए आपको बुलाया था | आप ही हो जो मुझे रास्ता दिखा सकते हो |
अब जो हो गया उसके बारे में भूल जाओ | एक बात सुनाता हूँ |
एक साइकिल राइडिंग डेढ़ सौ किलोमीटर हो गयी तो मेरे साथी ने कहा जा कर गरम पानी से नहा लो और भूल जाओ अपने डेढ़ सौ किलोमीटर साइकिल चलाई है | अगर सोचते रहोगे तो कल मांसपेशियां उठने नहीं देंगी |
जो बीत गया उसे साथ लेकर चलोगे तो जीवन का पहाड़ चढ़ना मुश्किल होगा | जब प्रकाश की तरफ पीठ की थी तब भी तो आप मरते प्रकाश को बचा ही रहे थे |
वह मुझसे नज़रें नहीं मिला रहा था |
मेरी तरफ देखो सदानंद ! आँखे मिला कर बात करो | तुमने कोई गुनाह नहीं किया है |
वह कुछ नहीं बोला |
फिर उठा और बोला : “चाय बनाता हूँ |”
मैंने सामने पड़ा अखबार उठा लिया | पहला पूरा पेज ही विज्ञापन से भरा था |
थोड़ी देर में ही सदानंद आ गया | हाथ में चाय की ट्रे थी और कुछ बिस्कुट | मैं चाय उठा लेता हूँ |
सर इस बार जून में इन्द्र्हारा पास चलें |
मैं जानता हूँ उसके भीतर कुछ अटका हुआ है जो वह इधर उधर की बातें कर रहा है |
इधर उधर की बातें मत करो | बोलो जो भीतर अटका हुआ है उसे निकालो पहले फिर इन्द्र्हारा की बात करेंगे |
उसने एक बार मुझे देखा और चाय की घूँट कंठ से नीचे उतारते हुए बोला : सर आपको याद है जब मैं दसवीं कक्षा में था |
हाँ बिलकुल याद है |
सर मैं गणित में बहुत कमजोर था | हर रोज चेरियन मैडम की डांट खाता रहता | लेकिन क्या करता मैथ मुझे समझ ही नहीं आता था | उस साल हमारा संभाग नेशनल जीता था | लेकिन मुझे साफ़ दिखाई दे रहा था कि मैं गणित में किसी भी हालत में नहीं निकल सकता | किसी को को मेरा ख्याल नहीं था | प्री बोर्ड की कंडीशन गणित में पास होना ही थी | प्राचार्य ने स्टूडेंट्स की विशेष माटिंग की थी | बोले जो भी प्री बोर्ड में फेल हुआ उसको रोल न० नहीं दिया जायेगा | सबसे बुरी हालत मेरी ही थी | चेरियन मैडम हमारी क्लास टीचर थी | उनसे सख्त कोई टीचर स्कूल में न था | वही गणित भी पढ़ाती थी | प्रिंसिपल सर भूल चुके थे कि अभी कुछ दिन पहले तक मैं उनके लिए तपते बुखार में भी मैदान में उतरा था | मैं अन्दर ही अन्दर बुरी तरह टूट चूका था | मुझे इस बात का भी पूरा यकीं था कि अगर फेल हो गया तो बापू ने काम पर लगा देना है | सब छूट टूट जायेगा | मीटिंग के बाद मैं छुट्टी के बाद कितनी ही देर क्लास रूम में अकेला बैठा रहा | तभी चेरियन मैडम अपना सामान समेट कर घर जाने लगी तो उनकी नज़र मुझ पर पड़ गयी |
पहले कितनी ही देर मुझे देखती रहीं | जाने क्या सोचती रही ? फिर मुझे पास बुलाया और घर जाने के लिए बोला |
मैं चुप चाप उठा और घर चला गया | मैंने सोचा, बात समाप्त हो गयी | अब कुछ नहीं होने वाला | कल को पिताजी का ऑटो रिक्शा ही चलाता नजर आऊंगा |
दो दिन बाद प्री बोर्ड परीक्षा शुरू थी | जिस दिन गणित की परीक्षा थी | मेरे कमरे में चेरियन मैडम ही ड्यूटी पर आ गए | उन्हें देखते ही मेरे होश उड़ गए | अब तो नक़ल का भी कोई चांस नहीं | इनके सामने तो पत्ता भी नहीं हिल सकता | मैं अपनी अंतिम उम्मीद भी खो चुका था |
वह पल मैं कैसे भूल सकता हूँ जब प्रश्न पत्र बांटते हुए चेरियन मैडम मेरे पास एक पल को रुके और मेरे कंधे पर हाथ रख कर बोले | डोंट वरी डू योर बेस्ट | उनका मुझे इस तरह से कहना कहीं न कहीं बहुत सारी हिम्मत दे गया | मैं जितना हो सकता था भरसक प्रयास कर चुकने के बाद भी बस इतना ही कर पाया कि पच्चीस अंक आ पाएंगे | आखरी पन्द्रह मिनट बचे थे | मेरे आगे स्कूल का मेधावी छात्र पांडे था | मैं एक दो बार उससे संकेत में सवाल का हल पूछ चुका था लेकिन वह मैडम से डर रहा था | मैंने देखा मैडम मुझे ही देख रही रही थी | मैं खिड़की वाली दिशा में बैठा था | लगा मैडम शीट छीन कर रख लेंगी लेकिन मैं यह देख कर हैरान था कि मैडम ने खिड़की की तरफ पीठ कर ली | फिर कुछ देर बाद वह अपने ही काम में व्यस्त हो गयी | मैं कुछ नहीं समझ पाया बस मौका मिलते ही पण्डे जी से पांच पांच अंकों के दो सवाल टीप लिए | घंटी होते होते मैं बहुत ही राहत महसूस कर रहा था | आखिरकार मैं सभी विषयों की कंडीशन पूरी कर पाया |
उस रोज़ जब क्लास रूम में अकेले बैठा था तब चेरियन मैडम का मुझ पर नज़र पड़ना आगे की कहानी रचेगा सोचा न था | फाइनल परीक्षा में बीस दिन बचे थे | चेरियन मैडम ने मुझे हर रोज शाम को दो घंटे बुलाना शुरू कर दिया | मैडम यह किस लिए कर रही थी उस वक्त ज़रा पता न था | परीक्षा आने तक मुझे इतना माँज दिया कि मेरे भीतर गणित को लेकर डर समाप्त हो गया |
आज सोचता हूँ चेरियन मैडम अपने सिद्धांत पर रहती तो शायद आज मैं एक कामयाब कला अध्यापक नहीं बल्कि ऑटो चला रहा होता | अध्यापक बनने के बाद मुझे यह भी पता चला कि जिस विषय का पेपर होता है उसी विषय का अध्यापक कभी ड्यूटी पर नहीं लगाया जाता | आज मुझे खिड़की की तरफ पीठ करने का अर्थ भी समझ आया |
सदानंद यह कहानी तो मैं जानता हूँ | चेरियन मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी | हम बहुत सी बातें शेयर करते थे | लेकिन कुछ और ही था जो तुम बताना चाहते थे |
सर चाय और लोगे ?
अरे नहीं ! अभी तो ली है | ज्यादा चाय से मुझे एसिडिटी हो जाती है | तुम कहो जो कहना चाहते हो |
सर उस दिन आपने मेरे प्रश्न का उत्तर दिया वह मेरी जिंदगी के टर्निंग पॉइंट की कहानी थी |
सदानंद तुम्हारी ही नहीं देश के लाखों छात्रों के जीवन के टर्निंग पॉइंट की कहानी है | हमारा शिक्षा तंत्र बहुत सी प्रतिभाओं को आगे आने देता है तो बहुत सी प्रतिभाओं के लिए इसमें कोई स्थान नहीं है | वस्तुत: मानवीय संभावनाओं की तलाश करें तो यह शिक्षा तंत्र भटकाव भरा है |
बीच में बेल बजी | सदानंद गेट तक जा कर आ गया |
अख़बार का बिल था |
फिर हम में से कोई नहीं बोला | मैंने सदानंद के चेहरे को पढ़ने की कोशिश की | बहुत कुछ अब भी उसकी आँखों में अव्यक्त सा तैर रहा था | चेहरे से एक छटपटाहट सी टपकने को थी | खिली खिली धूप में रात भर की अलसाई पत्तियां अपना आलस्य त्याग कर रंग बदल रही थी |
वह बोला : सर याद है जिस दिन आपने मेरे प्रश्न का उत्तर दिया था | उस उत्तर ने मुझे बचपन में पहुंचा दिया था | उस प्रश्न को पूछा भी इसलिए था कि ऐसी ही मुझ जैसी एक कहानी मेरे वियार्थी के साथ दोहराने जा रही थी | मुझे बस उसके लिए खिड़की की तरफ पीठ करके खड़े होना था जो मुझ से नहीं हो पा रहा था | लेकिन जब मैंने खुद के बारे में सोचा तो खिड़की की तरफ पीठ कर के खड़े होने में मुझे कुछ ख़ास दुविधा नहीं हुई | अगर आज मैं वैसा नहीं करता तो उस दिन वाला सदानन्द मर चुका होता |
फिर वह कुछ नहीं बोला | बस उठा और बगीचे में ठीक उसके सामने खिली गुलाब की जड़ से निकल आए सात पत्ती खरपतवार को कटर से काट दिया |
सुरेश हंस
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परिचय
सुरेश हंस
कहानी और कविता लेखन में रूचि।
४ प्रकाशित उपन्यास। २०१३ में उपन्यास तिनका तिनका के लिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय, ( मानव संसाधन शिक्षा मंत्रालय ) आर के पुरम की ओर से हिंदीत्तर भाषाओँ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित
शोर्ट फिल्म्स, फोटोग्राफी, पेंटिंग, यायावरी, यात्राएं, पर्वतारोहण में रूचि
Email: sureshhans.hans@gmail.com
