हिरोशिमा और नागासाकी की वह परमाणु तबाही, जिसने चंद पलों में हँसती-खेलती ज़िंदगी को राख में बदल दिया। उसी असीम दर्द और मानवीय त्रासदी की गूँज एडिता मॉरिस के उपन्यास ‘फ्लॉवर्स ऑफ हिरोशिमा’ में जीवंत हो उठती है। यह दास्तान केवल विकिरण और छिपी पीड़ा की नहीं, बल्कि मुख्य पात्र ‘युका’ के अदम्य साहस और करुणा की मिसाल है। जो यह पैगाम देती है कि राख और बारूद के सबसे खौफनाक साए में भी उम्मीद और इंसानियत के फूल खिल सकते हैं।
आज की दुनिया में युद्धों, ड्रोन हमले, बारूदी विस्फोट , हथियारों के नये नये प्रयोगों के बीच अक्सर परमाणु हमले या विस्फोट का खतरा आसन्न हो जाता है. हाल के ईरान बनाम अमरीका- इसराइल युद्ध में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कई चेतावनियाँ परमाणु हमले का अंदेशा पैदा कर रही थी. शांति और मानवता के समर्थक नागरिकों ने दम साध कर कई रातें इस आशंका में गुजारी कि कहीं परमाणु विस्फोट न कर दिया जाए. हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराये गये बमों की तुलना में आज परमाणु और हाईड्रोजन बम की क्षमता और विनाश के स्तर की कल्पना शायद भौतिकविदों के द्वारा प्रदत्त आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है . स्कूल की पाट्य –पुस्तकों में इस तरह के वाक्य है कि धरती पर अभी खतरनाक रासायनिक और जैविक हथियारों का इतना जखीरा है कि इस धरती को एक बार नहीं बल्कि कई – कई बार पूरी तरह नष्ट किया जा सकता है.
इन वैश्विक युद्ध और सशस्त्र संघर्षों के वातावरण में 20वीं शताब्दी की महान स्वीडिश- अमेरिकी रचनाकार और राजनीतिक राजनीतिक कार्यकर्ता रही एदिता मौरिस के उपन्यास ‘हिरोशिमा के फूल’ को पढना एक विशद अनुभव है. एदिता मौरिस स्वीडिश – अमेरिकन राष्ट्रीयता की पहचान लेकर रहीं, किन्तु उन्हें एक या कुछ राष्ट्रीयता तक सीमित कर देना तर्कसंगत नहीं हैं. वे अमेरिकी नीतियों की, उनके शीतयुद्धकालीन राजनीति की आलोचक रही. और उन्होंने अपने सबसे प्रसिद्ध उपन्यास ‘हिरोशिमा के फूल’ के कथानक के लिए ऐसे शहर को चुना जहां 6 अगस्त 1946 को मानव इतिहास की सबसे खतरनाक और सबसे निर्मम अस्त्र का उपयोग एक प्रयोग के तौर पर किया गया था. आज की बची हुई मानव जाति जानती है कि वो कैसा मंज़र था जहां आग के गोले लोगों को जला रही थी, शहर का एक दो तिहाई हिस्सा पूरी तरह से मलबा बन गया था , सड़कों के कोलतार पिघल गये थे और मनुष्य के पैर उनमें झुलस गये थे. परमाणु बम सिर्फ एक बार किया जाने वाला विस्फोट नहीं था बल्कि एक सुनियोजित श्रृंखलाबद्ध चेन रिएक्शन का एक भौतिक कार्यक्रम था जिसे ‘इन्सटाल्ड’ कर दिया गया था. एक मिनट में इस शहर ने एक लाख की आबादी को जिंदा भस्म होते देखा था. एदिता ने इस मानवीय विभीषिका वाले शहर को चुना. उन्होंने अनेक महान लेखकों – कलाकारों की तरह यह साबित किया कि कलाकारों – साहित्यकारों का कोई देश नहीं होता. मानवता की कोई सीमा नहीं हो सकती. इसे सीमित राष्ट्रीयता के दायरे में कैद नहीं जा सकता.
मोहन राकेश का हिंदी अनुवाद है- पानी के बहाव की तरह तरल और असली शुद्ध देसी घी की तरह फिसलनदार. कहीं नहीं लगता कि अनुवाद पढ़ रहे हैं. एक अद्भुत अनुवाद है काव्य की आत्मा की रक्षा करते हुए..
उपन्यास का कथानक बम गिराने के 14 वर्ष बाद का है. यूका सान कथानक की केन्द्रीय पात्र है और कथानक की वाचक भी. शुरुआत एक अमेरिकन युवक सैम के यूका सान के यहाँ किरायेदार के रूप में आने से होती है. सैम उर्फ़ हैरो सान एक शर्मीला युवक है जिसकी पूर्व में तोशो हमादा नामक जापानी प्रेमिका रहा चुकी है. यूका अपनी छोटी बहन ओहात्सू को उसकी देखरेख के लिए ताकीद देती है. यूका का पक्ष ये है कि ये मेहमान खुश होकर गया तो और व्यक्तियों से किराए पर रहने के लिए अनुशंसा करेगा. साथ ही ओहात्सू के लिए उसमें संभावना देखना चाहती है. यहीं से एक – एक किरदार आते हैं और फिर उनकी कहानियाँ. प्रत्येक कहानी का तंतु हिरोशिमा के विस्फोट और उसके बाद के रासायनिक चेन रिएक्शन के घटक प्रभावों से जुड़ा है. यूका नाकानो सान के साथ के खुले मैदान की तरफ जाती है तो सोचती है : “ एक पश्चिम के व्यक्ति की नज़र से उन्हें देखते हुए मुझे लगता है कि वे कितनी गंदली , कितनी घुन खायी हैं! उनकी हालत दर्दनाक नज़र आती है – हिरोशिमा विस्फोट से जिंदा बचे सभी लोगों की तरह” . स्वयं यूका अपनी किमोनी की बांह ऊपर उठ जाने के प्रति सावधान रहती है कि ‘कहीं मेरे दाग तो उसने नहीं देख लिए?’
फ्युमियो युका का पति है जो विस्फोट के वक़्त शहर के बाहर आर्मी में तैनात था. विस्फोट के बाद उसने सैकड़ों शव उठा उठा कर अपने प्रिय जनों की खोज की और इस दौरान वो रेडिएशन का शिकार हो गया. आज वो एक ऑफिस में बॉस की मर्जी के अनुसार कार्य करने को अभिशप्त है क्यूंकि रेडिएशन के शिकार लोगों को कोई काम नहीं देता. वो शनै: शनै: और बीमार होता जाता है और अंततः रेडिएशन हॉस्पिटल में कई अन्य रेडिएशन के शिकार रोगियों के साथ मृत्यु की प्रतीक्षा करने को विवश है. युका अनुभव करती है कि उसने फ्युमियो के साथ रहकर उतना समय नहीं बिताया जितना उसके इंतज़ार में. पर यह भाग्य सिर्फ उसका नही है बल्कि “ युद्ध और युद्ध के बाद की नस्ल में लाखों -करोड़ों युवा जापानी पत्नियों का यही भाग्य है.” स्त्री – पुरुष सम्बन्ध की ये खासियत सामान्य नहीं है, अप्राकृतिक है. युका के पेट में बच्चे ठहरते नहीं थे. उनकी ये अलग तनावग्रस्त जिंदगी थी.
अमेरिकन युवा सैम धीरे धीरे शहर से परिचित होता जाता है. गाइड बमबारी के समय की डिटेल्स बताता है जिसे सुनना कान में गरम उबल रहा तेल ज़बरन फेंकने की तरह है. शहर में एक अजायबघर है जिसे युका जैसे बचे हुए लोग अपना कब्रिस्तान कहते हैं- ‘उस अजायबघर में जाना अपने कब्रिस्तान में घूमने की तरह है.’
समाज विस्फोट से बचे हुए लोगों को उनकी नई शारीरिक और मानसिक स्थिति के साथ स्वीकार नहीं करता. ओहात्स्तु का प्रेमी उसे स्वीकार कर लेता है किन्तु उसका परिवार नहीं. उन्हें पक्का यकीन है कि विस्फोट से बच गयी लडकियां माँ नहीं बन सकती. ओहात्सू पूर्णतः निर्दोष और प्रेम में पूर्ण समपर्ण के बावजूद अपनी आत्मग्लानी को स्वीकार करने के लिए बेबस है. वो कभी भूल नहीं पाती कि अगर बच्चे होंगे तो रेडिएशन के प्रभाव से मुक्त हो पायंगे क्या? यूका मकान मालिक की धमकियां सहने को विवश है क्योंकि उसे पता है कि कोई व्यक्ति विस्फोट से बचे लोगों को मकान नहीं देना चाहता. वास्तव में विस्फोट में किसी तरह बच गये लोग सामान्य मनुष्य नहीं रह गये … वे एक अलग तरह के प्राणी बन गये. 7000 डिग्री तापमान की अकल्पनीय उजास से बचे हुए लोगों का समूह. ऐसा समूह मनुष्य समुदाय ने न तो पहले देखा न बाद में.
पुस्तक का शीर्षक है : ‘हिरोशिमा के फूल’. बहुत सुंदर फूल हैं. इधर उधर आसानी से दिख जाते. ओहात्सू के पास भी फूलों का गुलदस्ता है. सैम सान उसे लेना चाहता है पर ओहात्सू उसे नहीं देती . नदी के पानी में प्रतिदिन फूलों के गुलदस्ते रखे जाते हैं क्यूंकि “ यही वह जगह है जहां हमारी माँ, एक जिंदा जलती मशाल की तरह बम विस्फोट के बाद नदी में कूदी थी. मैं उसे बताती हूँ कि इस तरह के बीस हज़ार मानव शरीरों के अवशेष हमारी इसी नदी में दफन हैं.” नदी में रखे गये सारे फूल वास्तव में पानी पर कब्रें हैं. हज़ारों हज़ार कब्रें. विस्फोट से बचे लोग विस्फोट के मानसिक प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकें हैं. उन्हें अक्सर लगता है कि “ बहुत सी जलती मशालों की तरह जलते सिरों वाली औरतें किनारे से कूद रही हैं. क्या मेरी माँ उनमें हैं?” यहाँ फूल होने का मतलब है चिता. हत्याओं की स्मृति. फूल मार दिए गये प्रियजनों की स्मृतियाँ हैं.
लेखिका ने एक युवा अमेरिकी को द्रवित और पाप बोध से युक्त दिखाया है. एक युवा अमेरिकी बच्चे के कन्धों पर उसके पूर्व पीढी की शासकों के क्रूर पाप और अपराध का बोझ.. वो कितना कीमत चूका पायेगा अमेरिकी शासकों के मानव- अपराधों का, वहशीपन का , बेरहम क्रूरता का…? एक नेकदिल युवा अमेरिकी बस इतना कह पाता है : “ तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे ज़रिये मैंने हिरोशिमा का अर्थ जाना है- यह वो चीज है जिसे ज्यादा लोग नहीं जानते. मैं कुछ एक लोगों को बताऊंगा. यही कुछ मैं इस समय कर सकता हूँ कि लोगों को बताऊँ.” सच! एक प्रेम में डूबा युवा यही कर सकता है..
ये उपन्यास मनुष्य की आगामी पीढ़ी के लिए हिरोशिमा विस्फोट की स्मृतियों का संचयन है.. भविष्य की मानव समाज के लिए…एक बेहतरीन साहित्यिक प्रयास है. एक तबाही का काव्यात्मक रूपक है. लेखिका का प्रयास भविष्य को यह बताने का है कि बेपनाह पूंजी का स्वामित्व और ‘सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र’ होने का नशा शासकों को कितना क्रूर, कितनी ज़ालिम बना सकता है कि लाखों लोगों की क्षण भर में मौत ‘एक प्रयोग’ मात्र है उनके लिए. वे मनुष्यों पर इतने खतरनाक रेडिएशन युक्त विस्फोट को आजमा कर देख सकते हैं. आज ये किताब 1950 के समय की तुलना में और ज्यादा जरूरी लग रही है. हाइपरसोनिक और सुपरसोनिक अस्त्रों और जैविक अस्त्रों के इस खतरनाक समय में पूरी मनुष्यता एक निरंतर सुलग रहे ज्वालामुखी के ढेर पर बैठ बस इंतज़ार कर रही हैं शायद.. खुद के सामूहिक खात्मे का इंतज़ार. युद्धोंमादियों के इस वहशी दौर में ऐसी किताबें शायद कोई उम्मीद पैदा कर सकें. शीतलता और संवेदना कोई एक सूत्र अगर निकल सके..
मनोज मल्हार

परिचय
डॉ. मनोज कुमार
असिस्टेंट प्रोफेसर , हिंदी विभाग , कमला नेहरू कॉलेज ( दिल्ली विश्वविद्यालय
भारतीय साहित्य, हिंदी आलोचना, हिंदी सिनेमा में विशेष रूचि
समालोचन, जानकी पुल ,जनसत्ता, प्रभात खबर , हंस , कथादेश, आलोचना , गगनांचल , परिंदे, विश्वरंग आदि पत्र -पत्रिकाओं में पुस्तक समीक्षा , फिल्म समीक्षा, लेख एवं कवितायें प्रकाशित.
ईमेल : mkumar@knc.du.ac.in