इमारतों और गुंबदों का शहर बाकू
आप किसी देश को कैसे जान पाते हैं? मेरे ख्याल से एक देश को जानने के लिए वहां का इतिहास और संस्कृति ही जरिया है। इतिहास और संस्कृति से मिलते हुए मैं अपनी यात्रा जारी रखती हूं। यात्रा करते हुए मेरे सामने दुनिया कि तमाम खिड़कियां खुल जाती हैं। अजरबैजान की यात्रा ने मेरे जीवन में कुछ और सुंदर अध्याय जोड़ दिए हैं। मेरे लिए ये अनोखा अनुभव है।
खासकर अजनबी शहरों में जहाँ हमें कोई नहीं पहचानता, पर आँखें जैसे पहचान में बदल जाती हैं। जब कोई अजनबी देख कर मुस्कुराता है। मैंने उस देश की बहुत सारी बिखरी हंसी अपने दामन में समेट लिया है। ये तमाम हंसी मेरी उदासी के दिनों को भर देते है। कितना दिलचस्प है ये देखना की यात्रा कैसे आपको ताजगी से भर देते हैं। जब हम बाकू पहुंचे तो उस समय रात के 12, बजे थे। बहुत शांत थी रात पर चुप नहीं थी। सड़कों पर गाड़ियां चल रही थी। एयरपोर्ट से हम बाकू शहर के उस हिस्से में पहुंचे जिसे ओल्ड सिटी कहते हैं। बाकू शहर का ये हिस्सा पुराने किले की तरह है। मकान की ईंटें चौड़ी है और रंग हल्का बादामी।

झालरदार झरोखे, रोशनदान । भूरे हल्के पीले रंग के गुंबद। इन खूबसूरत ईमारतो , गुंबद पर यूरोप से आए हुए कारीगरों की गहरी छाप है। शहर घूमते हुए हमने पाया कि इतिहास हमारे जीवन में बार बार लौटता है। चट्टानों पर पाई गई आकृति जैसे आपस में बातें कर रही हों। कह रही हों देखो हम मौजूद हैं । नृत्य करती हुई, गाती हुई, हंसती हुई आकृतियां मनुष्यता के इतिहास का प्रमाण है। पाषाण युग से लेकर कांस्य युग के संक्रमण काल के दौरान, इस क्षेत्र में पहली चट्टान नक्काशी दिखाई दी, जो स्थानीय जनजातियों के कला का बेहतरीन नमूना है। ये तमाम कलाएं बाकू शहर की धरोहर है। हम चट्टानों के बीच घूम रहे थे। और गुजरे समय को महसूस कर रहे थे। सामने लाल तख्तों की बेंचें पड़ी थीं। पत्ते लगातार उन पर झरते रहते हैं। जब कभी हवा का कोई झोंका उन्हें उड़ा ले जाता, तो वही झोंका वापस मुड़कर दूसरे पत्तों को उन पर बिखरा देते।
मैं घूमते हुए दूर निकल आई – दूसरी तरफ, जहाँ पेड़ों की नंगी शाखाएँ पानी को छू रही थीं। ढलान पर उतरते ही पाँव अनायास ठिठक गए। हवा ऐसे बदन को सहला रही थी जैसे माशूक हो। बाकू हवाओं का शहर है, इसे यहां के लोग “ईश्वर का स्थान” भी
कहते हैं। इस शहर में कई ज्वालामुखी हैं, जिसे “अनन्त ज्वाला” के रूप में जाना जाता है। अब ज्वालामुखी शांत है। पर मिट्टी की गहरी परतों में आग मौजूद है। हमारे साथ मौजूद ड्राइवर ने मिट्टी को छुआ और माचिस लगा दी। लपटें जलने लगी। कहते हैं ये लपटें प्राचीन अग्नि-पूजकों को श्रद्धांजलि देती हैं, जो कभी परिदृश्य में नाचती हुई टिमटिमाती रोशनी का सम्मान करते थे। यहाँ, स्थानीय लोगों के पैरों के नीचे की ज़मीन सचमुच जलती है, शायद सृजन का रहस्य इसी मिट्टी के नीचे दबी हो। यहां की मिट्टी यात्री भर – भर के ले जाते हैं। गर्म , लावा सी दहकती मिट्टी जब शांत होती है तो लोग इसे अपने चेहरे पर लगाते हैं। कहते हैं ये स्किन के लिए बहुत अच्छा है ।
हम ज्वालामुखी के इस विशाल भूमी से लौट आए। बेटे ने मजाक से पूछ मां तुम मिट्टी बटोर कर नहीं लाई। तुम्हारा चेहरा और सुंदर हो जाता किसी क्रीम की जरूरत नहीं पड़ती। हमने कहां ये काम हमने व्यापारियों के लिए छोड़ दिया है। किसी दिन वे इस रहस्यमय मिट्टी का इस्तेमाल खूबसूरती बढ़ाने के दावे के साथ करेंगे। पता नहीं कितने दिन मिट्टी के सीने में ये आग धधकती रहेगी। हम इंसान इससे रौशन होते रहेंगे।
जब शिशिर में रातें जम जाती हैं तो मुझे अच्छी लगती है आग
जो इतनी मिलती-जुलती है उन विचारों से जो
तुम्हारी गहरी आँखों की मनस्थितियों से प्रदीप्त होने लगते हैं
जिनकी दृष्टिहीन चितवन में इस आग में सुलगते हुए देखता
हूँ जो मेरी रात में भी आलोकित रहती है
सुबह के आकाश में सफेद बादलों के गुच्छे लटके हुए हैं। तारों ने आसमान में अपना सर छुपा लिया है। हवा में हल्की ख़ुनकी है। बिस्तर पर पड़े – पड़े हमने बाहर की तरफ देखा। सूरज की हल्की रौशनी पेड़ों के बीच झिलमिला रही है।
शकील अमूमन सुबह जाग जाते हैं। मैं देर तक सोती हूं। आज नींद पहले खुल गई। हमने चाय बनाई । चाय की प्याली लिए हम दोनों बाल्कनी में हैं। बाकू शहर खामोशी से जागता है। हम जिस होटल में हैं वो पुराने शहर की गली में है। सड़क खाली है, वीरान नहीं। पुराने मकान- लैंप-पोस्ट की रौशनी से जगमगा रहा हैं। चाय खत्म करते हुए हमने पूछा?
आज कहां घूमना है ?
बीबी-हेबत मस्जिद देखने चलेंगे।
पर पहले नाश्ता कर लेते हैं शकील ने कहा।
कुछ सीढ़ियां उतर कर हमलोग नीचे होटल के रेस्तरां में आए। पुश्किन पहले से मौजूद था। यहां के लोग खाने के काफी शौकीन है। अज़रबैजानी खाने में कई संस्कृति का स्वाद शामिल है। भौगोलिक नज़दीकी और साझा इतिहास की वजह से अज़रबैजान और ईरान का खाना काफी मिलता-जुलता है। वहां के खान – पान पर सोवियत व्यंजनों का भी प्रभाव है (जैसे “स्टोलिच्नी”, “पिरोज़्की” जैसे सलाद)। वैसे यहां के लोग मुख्यतः भेड़ का मांस, मछली, चावल और ताजे फल-सब्जियों का इस्तेमाल करते हैं। मसालों का इस्तेमाल बहुत कम करते हैं। ताकि प्राकृतिक स्वाद को बरकरार रखा जा सके। हम रेस्तरां में आ गए। करीने से सजी कुर्सी और टेबुल पर पहले से मक्खन, शहद, पनीर, क्रीम , कई तरह के चीज़ तश्तरी में रखा हुआ था। खिड़की के बाहर
सफ़ेद छोटे- छोटे फ़ाख़्ता के जोड़े मटक रहे हैं । एक खूबसूरत नौजवान शायद वो रेस्तरां का मैनेजर है उसने सलाम किया। कैसे हैं आप लोग ? हमने हैरानी से उसे देखा। आप हिन्दी जानते हैं? बहुत थोड़ा। कहां सीखा? यहां बहुत हिन्दुस्तानी टूरिस्ट आते हैं। उनसे सीखा। मैंने चुपके से उसे देखा। करीब 30 की उम्र होगी। उसका रंग पिघले हुए सोने की तरह लौ दे रहा है। उसके बाल स्याह हैं। आँखें जैसे किसी ने शहद भर दिया हो। तरबूज़ी रंग के कपड़े में किसी मॉडल की तरह लग रहा था। । अमूमन यहां के लोग काफी खूबसूरत होते हैं।कई बार इनकी खूबसूरती पर आपकी आँखें ठहर जाती है। हमनें नाश्ते के बाद विदा लिया और टेक्सी से शहर की तरह निकले। रास्ते खूबसूरत हैं। सड़क के किनारे लंबे लंबे दरख़्त। पीले पत्तों के रंग की आभा ऐसी जैसे सूरज गुच्छों में पेड़ पर खिला हो। बाकू शहर से घूमते हुए हमलोग बीबी-हेबत मस्जिद पहुंचे। मेरे सामने एक खूबसूरत ढांचा खड़ा था। चारों तरह पहाड़ियों से घिरा हुआ। इसमें तीन गुंबद और दो मीनारें हैं। मस्जिद के बाहरी हिस्से में चौड़े आंगन हैं और इसमें अरबी सुलेख वाले खंभे और दीवारें हैं, जो कि “मस्जिद अल-अक्सा” से प्रभावित हैं। ये जगह इन दिनों शादी के लिए भी मशहूर है। कई जोड़े अपनी शादी करने के लिए इस मस्जिद में आते हैं।
बीबी-हेबत मस्जिद का निर्माण 13वीं शताब्दी में हुआ था। सोवियत शासन के दौरान इसे ध्वस्त कर दिया गया था और बाद में 1990 के दशक में इसका पुनर्निर्माण किया गया। इस मस्जिद को “फातिमा का मस्जिद” भी कहा जाता है क्योंकि माना जाता है कि यहाँ इमाम मूसा अल-काजिम की एक बेटी को दफनाया गया था। ये मुसलमानों का ज़ियारतगाह है और अज़रबैजान में इस्लामी वास्तुकला का नायाब नमूना । मैं देख रही थी जब कोई भी शासक निरंकुश होता है तो वो सबसे ज्यादा हमला देश की संस्कृति और इतिहास पर करता है। जिस खूबसूरत इतिहास को सोवियत शासन के समय ध्वस्त किया गया आज वो दुनिया का सबसे पवित्र और आध्यात्मिक स्थल है। जाने कितने लोग किस किस उम्मीद से आते हैं यहां। जाने कितनों की मुराद पूरी होती है। हजारों सपने और प्रार्थनाओं को अपने सीने में समेटे ये जगह सिर्फ उम्मीद नहीं है बल्कि एक देश की खूबसूरत सभ्यता की निशानी है।
बाहर सूरज बादलों में छिप गया है। टैक्सी की खिड़की के शीशों पर रोशनी का हल्का-सा आभास है। हवा सर्द है। रास्ते खूबसूरत। हमलोग बाकू से निकलकर दूसरे शहर कबाला की तरफ जा रहे हैं। बाहर सर्दी का धुँधलका है और नवंबर का नीला आकाश..। हम होटल के लॉबी में हैं। प्यारा सा नौजवान हमें अपने कमरे में ले जाता है। कमरा बड़ा और खूबसूरत है। सामने खिड़की के बाहर खूब सारे चिनार के पेड़ है। लाल पत्तियों पर सूरज की हल्की धूप पड़ रही है। कमरे के एक किनारे में सोफा और टेबुल है। खिड़कियों पर पारदर्शी पर्दे लगे हैं। बाहर बहुत शांत है सबकुछ। ये जगह लिखने के लिए ही है। ऐसी जगहें आपको कहानियों के पास ले जाती हैं। मैं अपनी उन कहानियों के बारे में सोचती हूँ, जो मैंने नहीं लिखीं, पर मुझे उनके बारे में सोचना अच्छा लगता है। कहानियां मेरे भीतर है। शायद यहां उन्हें बाहर आने का मौका मिले। हम लोग तैयार हैं , पुश्किन तय कर रहा है कि आज कहां घूमने जाएंगे। बच्चे जब साथ हों तो ये चिंता नहीं रहती कि अजनबी जगह पर क्या करना है। उसके पास यहां का पूरा नक्शा है। बाहर सड़कों पर लोग कम हैं। पर दुकानों में काफी भीड़ है। अभी से क्रिसमस की खरीदारी हो रही है। खरीदारी करने के बाद अक्सर यहाँ लोग चाय पीने आते हैं। यहां की चाय खास है। अमूमन हर रेस्तरां में चाय मिलती है। शीशे की नक्काशीदार छोटे से ग्लास और छोटी सी तश्तरी। साथ में कुछ फल और चीज़ के साथ चाय दी जाती है। बिना दूध की चाय आप चाहें तो शहद डाल लें। हल्की ठंड में भाप निकलती चाय और चीज़ का मज़ा ही कुछ और है। हम बाकू से 225 किलोमीटर की यात्रा कर गबाला पहुंचे। ये शहर दो ऊंचे पहाड़ों की ढलानों से घिरा हुआ है । इसमें हरे-भरे जंगल, शांत झीलें, तेज़ बहती पहाड़ी नदियाँ, गहरी घाटियाँ और लुभावने झरने हैं। हम शहर के सबसे खूबसूरत झरने के पास पहुंचे हैं जिसे ‘येड्डी गोज़ेल’ (सात सुंदरियाँ) के नाम से जाना जाता है। शहर के छोर पर, जहाँ पहाड़ी शुरू होती है झरने की दो पतली धाराएं बह रही है। ऊपर काफी घना जंगल है। इन सात सुंदरियों तक आना आसान नहीं है। ऊंची पहाड़ी पर चढ़ने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है। सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मेरा दम फूलने लगा।
चलते हुए मैं वहीं पेड़ के किनारे बैठ गई। एक सोंधी-सी गंध जंगल के इर्द-गिर्द हवा में तिर रही है । दूसरी तरफ, पेड़ों की नंगी शाखाएँ झरना को छू रही है। वहीं गीली घास का टुकड़ा झरना के छोर तक चला गया । ढलान पर उतरते ही पाँव अनायास ठिठक गए। आहा! झरना के किनारे- किनारे जंगली फूल उग आएं हैं। झरना के नीचे एक छोटा सा रेस्तरां है। जहां हमने चाय मंगाई। सामने एक नौजवान जो शायद अफ्रीकी मूल का है , एक छोटी-सी स्पोर्ट-चेयर पर बैठा था – बिलकुल निश्चल और खामोश। मुँह में पाइप दबी है, जो न जाने कब से बुझ चुकी थी। वह झील के परे घने जंगलों की ओर देख रहा है। मेरी चाय आ गई। पारदर्शी नक्शीदार ग्लास में चाय और प्रकृति को निहारते हुए मैंने देखा मेरे बिलकुल पास, एक दरख़्त की डालियां झूल रही थी।। सूरज की रौशनी से पत्ते चमक रहे हैं। उसकी गरमाई धीरे-धीरे मुझे छूने लगी। घास के नीचे मिट्टी नम थी, और इतनी मुलायम कि पैर नीचे दबने लगते थे। बादल अब भी थे, कुछ पेड़ों के उपर , कुछ हटकर शहर की पहाड़ी पर, किंतु अब वे खाली और हल्के हैं और हवा में उड़ते-से जान पड़ते हैं। हमने जी भर कर पहाड़ों को देखा। जंगलों को कहा मुझे याद रखना। जिन्दगी ने मौका दिया तो फिर मिलेंगे। ऊंचे दरख़्त से कुछ पत्ते झरते रहे जैसे वे मुझे विदा कर रहे हों। विदा मेरे दोस्त विदा!
मैं काफी देर तक वहाँ बैठी रही। अंगूर का बाग मीलों तक फ़ैला है। चारों तरफ बर्फीले पहाड़ हैं। पर अभी पहाड़ों पर बर्फ नहीं है। दिसंबर में पूरा पहाड़ बर्फ से सफेद हो जाता है।
गबाला के दक्षिण- में सावलन घाटी और वाइनरी है। जो काफी मशहूर है। सावलन घाटी अपने विशाल अंगूर के बागों के लिए जाना जाता है। यह सुरम्य पठार गबाला से सिर्फ़ 25 किलोमीटर की दूरी पर है, अभी गुलाबी ठंड है। पहाड़ों पर बर्फ नहीं गिरी है। ये जगह दुनिया में वाईन का शौक रखने वालों के लिए स्वर्ग है। कहते हैं कि जन्नत में हूर और शराब सिर्फ मर्दों के लिए है। औरतों के लिए जन्नत में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। इसलिए हम इसी जमीन पर वाइन का मज़ा तलाश रहे हैं। ताकि अगर जन्नत में वाईन नहीं मिले तो मुझे कोई अफसोस नहीं रहे। वैसे सवाल ये भी है कि मुझे जन्नत मिलेगी या दोज़ख इसका फैसला हुआ नहीं है। अल्ला मियां और भगवान में अभी बहस जारी है। तो उन्हें बहस करने दीजिए मैं ले चलती हूं आपको सावलन घाटी में जिसे मैं वाइन की घाटी कहती हूं। जो ” गारडेन गांव ” में है। ” एएसपीआई एग्रो एलएलसी” यहां की मशहूर कंपनी है जो दुनिया में बेहतरीन वाइन बनाने के लिए जानी जाती है, जिसकी स्थापना 2007 में की गई ।
सोवियत संघ के विघटन के बाद, इस क्षेत्र में अंगूर की खेती के मामले में बहुत कम संभावनाएं थीं। हालांकि, उद्यमियों के एक समूह ने “तेल के पैसे” को एक ऐसे उद्यम में निवेश करने की संभावना को पहचाना । उन्होंने वाइन बनाने के लिए, इटली से अत्यधिक कीमतों पर अंगूर और उपकरण दोनों खरीदे गए।
कहते हैं इतालवी कंपनी डेला-टोफोला की अत्याधुनिक मशीन ने वाइन बनाने की पूरी प्रक्रिया को आसान किया। आज, यह एक प्रमुख वाइनमेकिंग उद्योग के रूप में खड़ा है, जहाँ बेहतरीन वाइन बनाने के लिए नवीनतम इतालवी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। साथ ही यहां के हजारों साल की परंपरा का भी उपयोग वाईन बनाने में किया जाता है।
2007 में अपनी स्थापना के बाद से सिर्फ़ एक दशक से ज़्यादा समय में, सावलन अज़रबैजान में सबसे लोकप्रिय जगहों में से एक है। जहां लोग इस पूरी प्रक्रिया को देखने आते हैं और वाइन पीते हैं। दिलचस्प ये है कि सावलन घाटी में वाइन बनाने की प्राचीन कला को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जा रही है। ये जगह समुद्र तल से लगभग 400 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, हमलोग सावलन घाटी में पहुंच गए हैं। बाहर बड़ा सा अहाता है। अंदर पहुंचते ही एक प्यारी सी लड़की ने स्वागत किया। मेरा नाम नाद्या है। मैं आपको यहां के इतिहास के बारे में जानकारी दूंगी। ये कहते हुए वो हंसी। मुझे लगा जैसे सफेद फूल खिल गए। दूर तक फ़ैले अंगूर के बगीचे की तरफ इशारा करते हुए कहा
की ये करीब तीन सौ एकड़ में फ़ैला है। पहाड़ी के कगार से, नीचे मैदान तक का रास्ता बेहद लम्बा था इसलिए हमने वही से दूर तक फ़ैले अंगूर की फसल को देखा। गुच्छे में लटके अंगूर को देखकर मुझे “द थ्री मस्किटर्स” के लेखक एलेक्जेंडर डुमास ने यात्रा वृतांत का ख्याल आया। वे जब यहां घूम रहे थे यहां के परिदृश्यों से अचंभित थे। घूमते हुए उन्होंने जो लिखा आज दुनिया में वो एक बेहतरीन यात्रा वृतांत माना जाता है। ऐसे कम लोग हैं दुनिया में जो किसी दूसरे देश से आएं हों और उस देश के लोग उनकी मुहब्बत में उनके नाम पर शहर के रास्ते का नाम रख दिया हो। “काकेशस में एलेक्जेंडर डुमास” नामक एक मार्ग स्थापित किया गया है। कहते हैं ये जगह आपको स्विट्जरलैंड की याद दिलाएगा। मैं एलेक्जेंडर की यादों में खोई थी। नाद्या ने कहा आप अंदर आएं। अंदर वाइन के लिए बड़े – बड़े ड्रम रखे थे। वाईन को बनते हुए देखना अनोखा अनुभव था।
नाद्या ने हमें एक बड़े से हॉल में छोड़ दिया। एक नौजवान गर्मजोशी से मिला। उसकी उम्र 30 साल से कम होगी। खूबसूरती ऐसी की कोई देखे तो देखता ही रह जाए। जैसे पहली का नाज़ुक शरमाया हुआ चाँद किसी ने उतार लिया हो। शक्ल देखते जाओ पर जी न भरे। रंगत ऐसी जैसे दमकता कुंदन… । ज़ुबान से शहद टपक रहा था। वो हमें हॉल के बीचों – बीच ले गया। जहां एक बड़ी सी मेज़ पर कई नक्काशीदार वाईन ग्लास रखे थे। स्वागत करते हुए उसने बताया कि वाईन को कैसे पीना है। उसने वाइन को ग्लास में डाला और अपनी नाक ग्लास तक ले गया उसकी खुशबू ली। फिर उसने धीरे – धीरे ग्लास को घुमाया। इस तरह जैसे समुद्र की छोटी छोटी लहरें उठती हैं। फिर एक घूट लिया। उसने हमें भी इसी तरह वाईन पीने के लिए दिया। वाईन पीने का ये अंदाज मेरे लिए हैरान करने वाला था। वाईन के साथ कई तरह के स्वादिष्ट स्नैक्स रखे थे। अलग अलग स्वाद के चीज़ और मक्खन के टुकड़े। मैं वाइन से ज्यादा वाइन पीने के अंदाज को देख रही थी। जिसके अंदाज ने वाइन के नशा को दुगुना कर दिया था।
हमने वाइन होठों से लगाया और मुहम्मद रफी के गाने याद आ गए। शीशे में तुमको उतारे चले गए …. । वाईन के इस अनोखी यादों के साथ हमलोग वहां से निकले। दोपहर ढल चुकी थी।
चिनार के पत्ते झूम रहे थे। अंगूर की छोटी-छोटी लताएं एक दूसरे को चूम रही थीं। कच्चे , हरे , छोटे-छोटे शहतूत झूल रहे थे। चिनार की टहनियों की कुछ नन्हीं शाखें झुक आई थी ’ जैसे कह रही हो फिर मिलेंगे’ । बाहर कुछ घने पेड़ हैं। जिसकी नई पत्तियाँ डूबती हुई धूप में झिलमिला रही थीं। मुझे ग़ालिब याद आए
ग़ालिब’ छुटी शराब पर अब भी कभी कभी
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र ओ शब-ए-माहताब में
–निवेदिता
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निवेदिता
लेखक, कवि , पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता
बेस्ट हिन्दी जर्नलिस्ट ऑफ द ईयर के लिए उन्हें लाडली मीडिया अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। नेशनल फाउंडेशन ऑफ इंडिया द्वारा फेलोशिप
कविता संग्रह
प्रेम में डर
जख्म जितने थे
आवाज एक उम्मीद है
फिलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता, लेखन और एक्टिविज्म
E mail – niveditashakeel@gmail.com