बीतें दिनो की एक शाम थीं। हम चार दोस्त अपनी पसंदीदा जगहों में से एक किपलिंग बंगला के खंडहर में मिले। यहां मिलने का मतलब ही होता है कि हम अपने-अपने जीवन में…
सांय-सांय करती हवा…. फड़फड़ करता पांडाल और सरकस के अन्तिम शो का अन्तिम सीन… (शायद नहीं… यह तो शुरुआत थी)…
वर्ष 1969, जुलाई के दिन थे। बारिश के बाद के उमस भरे दिन। क्यूंकि स्कूलों/कॉलेजों की गर्मियों की छुट्टियाँ…
इमारतों और गुंबदों का शहर बाकूआप किसी देश को कैसे जान पाते हैं? मेरे ख्याल से एक देश को जानने के लिए वहां…
मेरे पिता आज से लगभग 45 वर्ष पूर्व, बुधवार, 9 जुलाई 1980 को इस दुनिया को, हम सब को छोड़ कर चले गए। कभी-कभी मन में ये…






















