राँची
दिनांक : 10 अगस्त 2025
आओ, फूल की बातें करें
एक मन अनगिन चुभन मत शूल की बातें करो
शीर्षक की उपर्युक्त पंक्ति गीतकार रवींद्र उपाध्याय की है जो स्नातक में हम लोगों को हिंदी पढ़ाया करते थे. हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में अनेक लोगों का योगदान होता है. मौलिकता की क्या कोई परिभाषा हो सकती है? खैर, सबसे अधिक मैं प्रेम के बारे में सोचता हूँ. प्रेम के बारे में हमें वैसे ही सोचना चाहिए जैसे फूलों के बारे में सोचते हैं. जब हम फूलों के बारे में सोचते हैं तो काँटों का ध्यान ही नहीं आता है. ध्यान में केवल होता है फूल. जो ध्यान में रह जाए वही तो प्रेम है. जो बिसर जाए वह प्रेम कैसा? जो बिसर जाये वह प्रेम कैसे ? प्रेम ध्यातव्य है. प्रेम ध्येय है. कभी सोचा है कि लोग प्रेमिका को गुलाब क्यों भेंट करते हैं? कहाँ से और कब से शुरू हुई होगी यह परंपरा. अकारण नहीं गुलाब को फूलों का राजा कहा गया है. अनेक रंग के गुलाब के मिलते हैं. लेकिन गुलाबी रंग एक ही है. यही तो प्रेम का रंग है. माली फूल की देखभाल करता है. निकाई-गुड़ाई और सिंचाई के दौरान उसकी अंगुलियाँ लहूलुहान हो जाती हैं. पर उसका ध्यान फूलों पर रहता है. उसे काँटा नहीं दिखाई देता है. ओ प्रेमी ! तुम्हारी दृष्टि तो ऐसी ही होनी चाहिए. जब तुम्हारी दृष्टि ऐसी होगी तो चारों तरफ गुलाब खिल जायेंगे. एक मन है, अनगिनचुभन हैं .इसलिए बेहतर है कि शूल की बातें मत करो. गीतकार उपाध्याय जी सही कहते हैं – खुशबुओं को तलाशो, फूल की बातें करो.
फूल सी सुमन लड़की
दिनांक : 11 अगस्त 2025
सामने एक सुन्दर मकान है. सुरुचिपूर्ण. मुख्य द्वार के चतुर्दिक दर्जनों फूल के गमले हैं. उन्हें अच्छे रंगों से रंगा गया है. उनमें रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हैं. मकान में वयोवृद्ध दंपति रहते हैं. उनकी संतान विदेश में सेटल्ड हैं. दो-चार वर्षों में दो-चार दिनों के लिए आते हैं. खैर,मुझे उनकी कहानी नहीं कहनी है. आजकल अधिकांश घरों की यही कहानी हो गयी है. यहाँ तो मैं फूल सी सुमन लड़की की बात कर रहा हूँ जो इनके सहयोग-सेवा के लिए कुछ माह पहले आयी है. मैं सुबह-शाम अपनी बालकोनी में चाय पीते हुए उस लड़की को देखता हूँ. सुबह जब वह झाड़ू लेकर घर के सामने के हिस्से की सफाई के लिए निकलती है तो मेरी नजर उस पर जाती है. वह पूरी तरह तैयार होकर निकलती है जैसे कोई महिला तैयार होकर अपने ऑफिस जाती है. उसके परिधान साफ़-सुथरे होते हैं. तेल-कंघी किए हुए बाल होते हैं. होठों पर लिपस्टिक लगा होता है. आप पूछ सकते हैं कि इस तरह भी क्यों देखना? आखिर एक सर्जक किस तरह देखे? देखना एक सामान्य क्रिया है लेकिन एक लेखक जब देखता है तो वह विशिष्ट बन जाती है. कवि, व्यभिचारी और चोर देखने का ही तो काम करते हैं. पर दृष्टि की भिन्नता के कारण कवि सृष्टि करता है और व्यभिचारी तथा चोर जेल की हवा खाते हैं.
लड़की विभिन्न घरेलू कार्यों के निष्पादन के पश्चात एक निर्धारित समय ठीक चार बजे फूलों की सिंचाई के लिए बाहर आती है,उस समय भी बिलकुल तैयार और सुसज्जित होकर. एक घरेलू सहायिका को इस तरह प्रसन्नचित्त और हरदम इस स्थिति में देखना किसी के लिए विस्मयकारी हो सकता है. काम करते समय तो अति सामान्य कपड़ों में भी रहा जा सकता है लेकिन यह तो कमाल की लड़की इसके बारे में संक्षिप्त जानकारी इतनी ही सुलभ है कि कुछ वर्ष पूर्व इसका ब्याह हुआ था. पति मद्यप मिला और वह बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेकर उससे मुक्त हो गयी. अभी इसकी उम्र ही क्या है-यही उन्नीस -बीस साल. इस लड़की के चेहरे पर मैं कभी शिकन नहीं देखता. उसका मन सुन्दर है. इसीलिए, मैं उसे सुमन कह रहा है. जिसका मन सुन्दर हो,अच्छा हो,वह हर हाल में फूल की तरह खिला रहेगा. वह जब कभी स्वामिनी के निर्देशानुसार आती है और उसे मैं कोई सामान सौंपता हूँ, वह धन्यवाद करना नहीं भूलती. उसका व्यक्तित्व शिष्टाचारसंपन्न है. यदि कोई व्यक्ति अशिष्ट है तो शायद ही कोई उससे कुरूप दिखे. ज़रा सी प्रतिकूल परिस्थिति में हम घबरा जाते हैं,टूटने लगते हैं. और यह लड़की जीवन के हर पल को सेलिब्रेट कर रही है. मैं संपन्न लोगों की विपन्नता देखी है और गरीबों का वैभव भी. यदि सुभाव हो बाह्य कारकों का प्रभाव कम हो जाता है. इस लड़की को देखकर महसूस करता हूँ कि सीमित या स्वल्प संसाधनों में भी समृद्ध जीवन जिया जा सकता है. मैं सुमन के फूल बनने की मौन शुभकामना करता हूँ.
कृष्ण की मुस्कान का दर्शन
दिनांक: 12 अगस्त 2025
आज नींद खुलते ही कृष्ण की याद आयी. वैसे कृष्ण बार-बार याद आते हैं. मैं कृष्ण को देखता हूँ. चित्रकारों ने कृष्ण की करोड़ों तस्वीरें बनाई हैं. सब में एक साम्यता है. वे हर दम मुस्कराते रहते हैं. उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं,कोई तनाव नहीं. वे बांसुरी बजा बजा रहे हों,रुक्मिणी के साथ हों या महाभारत में सारथि की भूमिका निभा रहे हों, हर स्थिति में सरल-सहज हैं. कृष्ण यदि गीता का उपदेश नहीं भी दिए होते तो उनकी मुस्कान वाली मुद्रा ही जीवन जीने की कला सिखाने के लिए पर्याप्त है. यह मुस्कान अर्थगर्भ है. इसमें जीवन दर्शन है. कृष्ण की गीता इतनी प्रभावी क्यों है? वह इसलिए कि इसका प्रवचन करने वाला स्वयं इसका पालन करता है. चरित्र अनुकरणीय बन जाता है. चरित्र के बिना शब्द निष्प्रभावी हो जाते हैं.
प्यारी बांसुरी पर बात करें तो कृष्ण के होठों तक पहुँचने के लिए उसे आठ जगहों पर छिद्र करवाना पड़ता है. अकारण नहीं कृष्ण बांसुरी से प्रेम करते हैं. बांसुरी बजाते हैं और उसे राधा के पास रखते हैं. वह राधा ही है जो बांसुरी के मर्म और महत्व को समझती है. वही बांसुरी सुरक्षित रख सकती है. कृष्ण के मथुरा चले जाने पर उद्धव जब राधा से मिलने आते है तो वह उन्हीं के माध्यम से उसे कृष्ण को वापस भिजवा देती है. बांसुरी मथुरा में भी बजे, राधा यही कामना करती है. जहाँ कृष्ण होंगे वहां प्रेम और शांति की बांसुरी जरूर बजेगी. राधा का हृदय भी बांसुरी है,उसमें अहर्निश कृष्ण राग बजता रहता है. मुझे कृष्ण याद आते रहें. मैं कृष्ण को कभी भूलूँ नहीं. मुझे श्याम रंग प्रिय है. एक दिन किसी मित्र ने कहा कि मूल रंग श्याम है. यह मदर कलर अर्थात मातृ रंग है. अन्य रंग तो बाद में बने. इसीलिए कलम में भरी जाने वाली रोशनाई को स्याही कहा जाता है. यह स्याही ही है जो सफ़ेद कागज़ और हमारे दिलो-दिमाग को रोशन करती है. पता नहीं लोग गोरे रंग पर क्यों फ़िदा होते हैं. मैं तो कृष्ण से यही विनती करूँगा-मोहे श्याम रंग रंग दे.
मुफ्त में कोई नमस्कार भी नहीं करता
आदतन अन्य लोगों की तरह बार-बार फेसबुक पर लौटता हूँ. आज फेसबुक पर टहलते हुए अनेक प्रश्न मन में उठने लगे. जैसे यही प्रश्न कि फेसबुक का नाम सुचिंतित तथा सुविचारित है या ऐसे ही रख दिया होगा. मुझे यह नहीं मालूम. कभी-कभी ऐसा भी होता है कि कई दिनों तक किसी विषय पर हम निर्णय तक नहीं पहुँचते है और अचानक क्षण भर में समस्या हल हो जाती है. जैसा “अच्छा तो हम चलते हैं “गीत के साथ हुआ था. बैठकी के बाद गीत आकार नहीं ले रहा था. गीतकार ने निराश होकर यह पंक्ति कही होगी. और कमाल देखिये कि यही गीत का मुखड़ा बना और गाना भी सुपरहिट हो गया. तो बात फेसबुक की जिसका सटीक अनुवाद आज तक नहीं हुआ. फेसचेहरा है तो बुक किताब- चेहरा की किताब. अनुवाद सटीक नहीं है लेकिन यह सचमुच चेहरे की किताब है. यहाँ सब कुछ प्रकट हो जाता है. प्रोफाइल में ताला लगा कर रखिएगा तो भी आपकी मानसिकता प्रकट हो जायेगी. एक टिप्पणी,एक तस्वीर कलई खोलकर रख देती है. टिप्पणी कीजिए तो भी, नहीं कीजिए तो भी. यहीं आकर एक प्रमेय सिद्ध होते हुए देखा कि मुफ्त में कोई नमस्कार भी नहीं करता. साथ ही,बड़े लोग दूसरों के कंधे पर खड़े होते हैं और अभिवादन पर मौन साध लेते हैं.
धूप के टुकड़े सा चमकता सच
पूस-माघ के महीने में उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड होती है. सूरज कभी-कभी मुंह दिखाता है. चारों तरफ धुंध ही धुंध. उस दौरान सायंकाल में कुर्सी पर बैठा कोई भी आदमी अपनी कुर्सी उस तरफ खिसका लेता है जिधर धूप का आखिरी टुकड़ा शेष हो. यह डायरी भी क्या है. सच का एक टुकड़ा ही तो. डायरी के जो पन्ने फाड़ दिए जाते हैं उसमें असली सच होता है. सबसे बड़ा सच तो जो आज तक लिखा ही नहीं गया. सच का एक टुकड़ा आता है तो सिंहासन हिलने लगता है. संबंधों में दरार आ जाती है. मित्र रूठ जाते हैं. सच गरिष्ठ होता है. काव्य हो या इतिहास इसमें भी सच का एक टुकड़ा मात्र है. दरअसल, सत्य आग है और ताप किसे बर्दाश्त हो सकता है. सब चांदनी में टहलना चाहते हैं. मैं भी पूस की धूप का एक टुकड़ा आपके सामने रख रहा हूँ.
पाखी का अगस्त, 2025 अंक
कल पाखी का अंक मिला. इसमें कविताएँ आईं हैं. यह अंक अपनी रचनाओं से अधिक इस बार के अपूर्व जी के संपादकीय और शोभा अक्षर के लेख के कारण चर्चाओं में रहा है. तेजी से विकसित होते भारतीय समाज में विवादित मुद्दों की कमी नहीं है. सभ्यता और संस्कृति का नया व्याकरण लिखा जा रहा है. भोजन,भजन और पहनावे अपनी रुचि के अनुसार हों तो सुविधाजनक रहते हैं. इस पर कोई भी विवाद सार्थक नहीं कहा जा सकता. रूढ़िवादी परम्पराओं का भंजन जरूरी है लेकिन संस्कार के दायरे को भी हमेशा ध्यान में रखना हितकर होता है. सवाल यह भी उठता है कि क्या हमारे चिंतन का दायरा सिमटता जा रहा है?
लम्बी कविताओं की वापसी
लम्बी कविताओं को लिखना शुरू से कठिन रहा है. इसे साधना तो और भी कठिन. मध्य में ही इसके टूटने-बिखरने का खतरा बना रहता है . इधर पिछले कुछ दिनों से सदानीरा पर तीन प्रतिभाशाली कवियों की कविताएँ आयीं है. अखिलेश सिंह की सुचिंतित टिप्पणी के साथ अविनाश मिश्र का यह नया प्रयोग है. इसके सफ़र पर नजर बनी रहेगी.
कुत्तों पर सर्वोच्च निर्णय
दिनांक:13 अगस्त 2025
गली में घूमने वाले कुत्तों पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया है. कुत्ता-प्रेमी नाराज हैं तो भुक्तभोगी खुश. बेंगलूर में रहते हुए मैंने कुत्तों पर बहुत कुछ लिखा-खासकर व्यंग्य के रूप में. अब तो वह मेरे हाल ही में प्रकाशित व्यंग्य संग्रह “बुद्धिजीवी और गधे “में संकलित हैं. कुत्तों पर अनेक लोगों ने लिखा है. मुझे समकालीन भारतीय साहित्य में कभी प्रकाशित एक कहानी याद आ रही है. कथा नायक सरकारी पैसे पर छुट्टी यात्रा रियायत(एलटीसी) लेकर भारत दर्शन के लिए निकल जाता है . घर में वृद्ध माँ -बाप को इसलिए छोड़ देता है कि वे कुत्ते की देखभाल करें. रईसों के कालीन मनुष्य के पांवों से गंदे हो जाते हैं लेकिन वे कुत्तों के साथ बेड शेयर करते हैं. वरिष्ठ कथाकार मधु कांकरिया की एक कहानी पढ़कर कुत्तों के बारे में मेरी जानकारी में इजाफा हुआ. महाभारत में वर्णन है कि युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण के समय कुत्ता भी साथ-साथ चल रहा था. इस मिथक की व्याख्या हो सकती है. अब कुछ कुत्ते खासकर विदेशी नस्ल वाले धरती पर ही स्वर्गिक सुख का आनंद ले रहे हैं. कुत्तों को देखकर मेरा भाग्य पर भरोसा और अटल हो जाता है. कुत्तों पर मेरी जानकारी बहुत कम है. उस पर अनधिकृत रूप से बोलने की चेष्टा कर रहा हूँ. यह अनुसंधान का विषय है कि लोग कुत्तों से इतना प्रेम क्यों करते हैं?. ऐसा प्रेम उन्हें बकरियों से क्यों नहीं होता? खैर,प्रेम के मामले में किसी की पसंद के बारे में टीका-टिप्पणी करना उचित नहीं है. कुत्तों के बारे में एक बात निर्विवाद है कि गरीब आदमी का कुत्ता भी गरीब होता है. मैंने एक लेख में इसका जिक्र किया है. रईसों की पहचान उनके कुत्तों से होती है. मैं कुत्तों के बारे में रहीम के बताये रास्ते पर चलने का पक्षधर हूँ. यह देखना दिलचस्प होगा कि हिंदी में धारदार श्वान-विमर्श की शुरूआत कब होगी? डायरी के इस अंश के लिखे जाने तक कुछ विचारोत्तेजक पोस्ट सोशल मीडिया पर तैरने लगे है. आप गौर करें तो कोई भी विमर्श दीर्घजीवी नहीं होता. अल्पायु में ही काल-कवलित हो जाता है. सब कुछ ब्रेकिंग न्यूज़ में बदलता जा रहा है.
बात करने से बात बनती है
मेरे दफ्तर में एक आदमी था. वह मुंह खोलता ही नहीं था. मैंने ऐसे आदमियों पर कभी एक लेख लिखा था- बिना मुँह का आदमी. हमारे यहाँ ऐसे लोगों को ‘मुँह का बछिया’ कहा जाता है. बहरहाल, बात करनी चाहिए. इससे जानकारी बढ़ती है. संवाद का अपना सुख है. बीच-बीच में समानधर्मा सर्जकों से बात कर थोड़ा प्रसन्न हो जाता हूँ. कुत्ते पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर प्रिय कवि स्वप्निल श्रीवास्तव से बातचीत में कई अच्छी जानकारियां मिली. यही कि विष्णु खरे ने उत्तर महाभारत प्रसंगों पर कई अच्छी कविताएँ लिखीं है. गोरखपुर के कवि गणेश पाण्डेय ने कुत्तों पर एक उपन्यास लिखा है. उन्होंने कुत्ते पर लिखी अपनी कहानी का सारांश सुनाया. सलाह यह भी दी कि हमें मिथकों को पढ़ना चाहिए. मैं अपनी इस राय पर कायम हूँ कि हमें सभी वर्ग के उपलब्ध लोगों से बात करनी चाहिए. यहाँ रिजर्वेशन उचित नहीं. एयरटेल का यह स्लोगन – बात करने से बात बनती है ,बेहद सटीक है. विज्ञापन की भाषा मूल्यवान होती है. यह बहुमूल्य सीख देती है. जैसे हर दोस्त जरूरी होता है. केवल जरूरत के लिए दोस्त नहीं बनाये जाने चाहिए.
कैसे कह दूं कि मुलाक़ात नहीं होती है!
कवि क्या देखता है? क्या सोचता है? कहाँ तक पहुंचता है? क्या लिखता है? इन प्रश्नों का उत्तर इतना आसान नहीं है. जैसे उपर्युक्त शीर्षक की अगली पंक्ति है-रोज मिलते हैं मगर बात नहीं होती है. स्थिति इसके उलट भी होती है. रोज बात हो और मिलना भी नहीं हो. आज के समय का एक सच यह भी है. हम पास-पड़ोस में रहने वाले अजनबी लोग हैं. लगभग हर कॉलोनी अपरिचितों का मोहल्ला है. बगल वाले का नाम-पता बगल वाले को मालूम नहीं. दस इंच की दीवार चीन की दीवार में तब्दील हो गयी. बर्लिन की दीवार 1989 में ढहा दी गयी .पूरब और पश्चिम का भेद मिट गया. और हमारे समाज में मेल-जोल के बदले मोल-तोल का चलन बढ़ता जा रहा है. इसके कारणों की पड़ताल एक गुमनाम लोक कवि कैसे करता है,आप भी देखिये-
प्रीतम बसे पहाड़ पर ,घर-आँगन के बीच.
दुश्मन बसे दुआर पर लाख कोस के बीच.
मेरे घट में आँसू हैं
दिनांक:14 अगस्त 2025
वे बड़भागी होते हैं जिनके अवकाश के दिन विश्वास के दिन में बदल जाते हैं. नौकरी के दिनों में आदमी सोचता है कि सेवानिवृत्ति के उपरान्त अपने मन के अधूरे कामों को पूरा करूँगा. बहुत कम लोग होते हैं जो इस स्वप्न को पूरा कर पाते हैं. जनवरी 2004 से फरवरी 2008 के दिन मेरे जीवन के सबसे कठिन दिन थे. इस दौरान पत्नी की चिकित्सा के क्रम में सी एम सी वेल्लुरू, जमशेदपुर और राँची के विभिन्न अस्पतालों का चक्कर लगता रहा. इस दौरान जो यातनाएं झेलीं,उनको लिखने का मन था. आज भी वह इच्छा बनी हुई है. मैंने सहृदय और संगदिल डाक्टरों और नर्सों को देखा. पत्नी की अथाह पीड़ा देखी. लोगों की सद्भावना और निजी सम्बन्धियों का दुराव देखा. गलत दिशा में गाड़ी चलायी. इंजन में बैठ कर सफ़र किया. मृत्यु को खुली आँखों से देखा. मैं बार-बार सोचता हूँ कि ये सारी चीजें सामने आनी चाहिए. मैं दुःख बेचना नहीं चाहता. कवि किशोर की एक पंक्ति है- क्या करूँगा लेकर संवेदना तुम्हारी? मैं तो पनिहारिन की तरहसर पर पानी का घड़ा लेकर सावधानी से एक-एक कदम रख रहा हूँ. अब क्या करूँ कि घट से कुछ बूँदें छलक जा रही हैं. फर्क इतना ही है कि पनहारिन के घट में पानी भरा है और मेरे घट में आँसू. दुःख दोनों को है. वह पनघट पर दुःख बांटती थी और मैं आप मित्रों के साथ. आपको मित्र कह रहा हूँ. यह भरोसे का भाव है.
लिखने से क्या मिलता है ?
मैं क्यों लिखता हूँ? किसके लिए लिखता हूँ? लिखने से क्या मिलता है ? ये सब कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो अनेक लेखकों से पूछे जाते हैं. आश्चर्य कि ऐसे प्रश्न किसी पेशा से जुड़े अन्य लोगों से नहीं पूछे जाते. इसका बगैर कोई तार्किक विश्लेषण किए बिना सपाट उत्तर दूँगा. लिखने से आनंद मिलता है. कुछ लिखकर संतोष प्राप्त होता है. मन की बात अर्थात स्वयं और समष्टि का सुख-दुःख अभिव्यक्त होता है. दूसरी बात यह कि लेखन अनाम लोगों के नाम चिट्ठी है. यह सार्वजनिक है. किताब एक बंद लिफाफा है. इसे कोई खोलकर बाँच सकता है,दूसरों को सुना सकता है. अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचने के लिए लेखन उत्तम साधन है. तीसरा प्रश्न भी मुझे बिलकुल विचलित नहीं करता. मैं जानता हूँ लेखन से अर्थोपार्जन करना मेरा ध्येय नहीं है. कोई पत्रिका यदि कुछ पारिश्रमिक देती है तो उसे पत्र-पत्रिकाओं पर ही खर्च कर देता हूँ. घर के आसपास जो हम फूल लगाते हैं तो उससे कोई आमदनी नहीं होती. सब लोग फूलों की व्यावसायिक खेती नहीं करते. साहित्य-सृजन का काम भी फूल लगाने जैसा है. उसमें अपना श्रम, समय और पैसे का खर्च करना पड़ता है. हम फूल के खिलने का इन्तजार करते हैं. हम अनुकूल मौसम का इन्तजार करते हैं. हमें फूल देखकर खुशी होती है. हमें अपना सृजन देखकर वैसा ही सुख होता है जैसे किसी स्त्री को अपने नवजात शिशु को देखकर होता है. वह सारी पीड़ा भूल जाती है. अब स्त्री से यह नहीं पूछा जाता कि तुम माँ क्यों बनना चाहती हो ?
स्वतंत्रता दिवस: मन थोड़ा उदास हो जाता है
दिनांक: 15 अगस्त 2025
आज स्वतन्त्रता दिवस है. इसे मैं त्यौहार के बजाय राष्ट्रीय पर्व कहना उचित समझता हूँ. पर्व का एक अर्थ गाँठ या बंधन है(जनेऊ के धागे में गाँठ लगाने को पर्व लगाना कहते हैं). जब हम दो चीजों को सटाकर गाँठ लगाते हैं तो वह एक हो जाता है तथा और मजबूत हो जाता है. पर्व का काम है जोड़ना. महाभारत विभिन्न पर्वों में विभक्त है.बहरहाल, स्वतंत्रता दिवस हमें जोड़ता है,एक सूत्र में बांधता है. इस दिन मुझे दो बातें अवश्यमेव याद आती है. सशस्त्र सेना से लैस अंग्रेजों को हम निहत्थे भारतीयों ने कैसे खदेड़ दिया. वह संकल्प की शक्ति थी जिसने यह संभव किया. हमारे स्वतंत्रता सेनानी गांधी,बाल गंगाधर तिलक,लाजपत ,आजाद, बिस्मिल, अशफाक उल्ला सुखदेव ,भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस आदि के संकल्प को नमन करना होगा जिन्होंने निर्भीकता से अंग्रेजों का मुकाबला किया और पूरे देश में यह भाव भर दिया कि हमें कोई गुलाम नहीं रख सकता. आज उस संकल्प का अभाव खलता है. हम स्वतंत्रता का सही तरीके से प्रयोग नहीं कर रहे हैं. स्वाधीनता के बिना स्वतंत्रता अधूरी है. एक स्वंतत्र व्यक्ति या राष्ट्र एक-दूसरे का सम्मान करते हैं. यदि हम दूसरे की स्वतंत्रता पर आघात पहुंचाते हैं तो अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण नहीं रख सकते. दुर्भाग्य से हमारा स्व पर नियंत्रण कमजोर पड़ जाता है और इस तरह हम अपनी स्वतंत्रता को आघात पहुँचाने से बाज नहीं आते. दुखद यह है कि हम स्वतंत्रता के मूल्य को नहीं समझते. स्वतंत्रता अंतर्मन से अनुभूत दायित्वबोध है. जिसे इसकी अनुभूति होती है वह देश के कण-कण से प्यार करता है. अब इस कसौटी पर हमें स्वयं को कसना चाहिए. देशभक्ति के लिए कोई ख़ास दिन नहीं होता. इस पर विस्तार से बातें करते हुए मन भर जाता है,आँखें नम हो जाती है. सवालों के घेरे में हम खुद को पाते हैं. राजनीतिक हालातों को देखते हुए लगता है कि क्या इसी के लिए देशभक्तों ने कुर्बानी दी थी. हमें यह प्रयास करना होगा कि आने वाले वर्षों में यह पर्व महोत्सव बने.
वरदान प्राप्त पीढ़ी
आज जानकी पुल पर जलवायु परिवर्तन विषयक एक विदेशी लेखिका कैरेलीना ब्राउन की कहानी एन्थ्रोपोसीन का देवेश पथ सरिया कृत अनुवाद पढ़ते हुए यह महसूस हुआ कि इस शताब्दी के लोग वरदान प्राप्त हैं. चीजें इतनी आसानी से सुलभ हो जातीं है कि हम दंग हो जाते हैं. कुछ दुर्लभ सामग्रियां सामने आतीं हैं तो ऐसे भाव का आना स्वाभाविक है. हम पढने-लिखने वाले लोगों के लिए इससे अच्छा क्या हो सकता है कि अपने प्रिय लेखकों को पढ़ें, उन्हें याद करें और लिखें. विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्मों के आ जाने से यह सब सुलभ हुआ है. एक विडंबना यह भी जुड़ गयी है कि किसी विषय पर शंका-निवारण के लिए हमारे आसपास गुरुजन या विशेषज्ञ अब शायद ही उपलब्ध हैं. सारी चीजों के लिए हम गूगल की ओर देखते हैं . बहरहाल, कला-साहित्य और अन्यान्य क्षेत्रों में डिजिटलाइजेशन का अच्छा काम हुआ है और विश्वास है आने वाले दिनों में हम और संपन्न होंगे. देखना यह होगा कि इन संसाधनों का हम कितना समुचित उपयोग कर सकते हैं. बावजूद इसके हमें सूचनाओं के जाल से निकलने की कला भी आनी चाहिए. चयन का विवेक होना भी आवश्यक है.
स्कूल जाते बच्चे
सुबह की सैर पर स्कूली बच्चों से सामना होता है. तरह-तरह के बच्चे. स्कूल बस में,निजी वाहनों में, पैदल तथा घिसी चप्पल या नंगे पाँव जाते बच्चे. उनकी स्थिति से सब वाकिफ हैं. उनमें से एक बच्चा जो अब किशोरावस्था की दहलीज पर खड़ा है घर से पैदल निकलता है और एक किलोमीटर चल कर उसे ऑटो पकड़ने के लिए मुख्य सड़क तक आना पड़ता है. इस बीच वह दर्जनों मोटर साइकिल वालों को लिफ्ट के लिए हाथ देता है. इस क्रम में वह लगभग आधी दूरी तय कर लेता है. मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि ऐसा वह क्यों करता है? दूसरों पर आश्रित होना,वह भी इस उम्र में! मुझे अच्छा नहीं लगता है. मैं स्वयं छ:किलो मीटर पैदल चलकर स्कूल पहुँचता था. चौबीस किलोमीटर साइकिल चलाकर कॉलेज जाता था. अपना सफ़र पूरा करने के लिए पांवों में ताकत होनी चाहिए. स्वाभिमान से समझौता क्यों? अपरिहार्य स्थिति हो तो अलग बात है. जीवन में छोटी-छोटी बातों का अधिक महत्व है. जो इस महत्ता को नजरंदाज करते हैं बड़ा काम नहीं कर पाते हैं. लघुता की महत्ता असंदिग्ध है. महत्व एक पल का है. पलक झपकते विमान उड़ जाता है. एक पैसा कम हो तो रुपया पूरा नहीं बन पाता है. हम पलों में जीते हैं. जो पल का महत्व समझता है वही सफल बन पाता है.
संपन्नता और प्रसन्नता
इस समय की विडंबना यह है कि जो संपन्न है वह अप्रसन्न है. मेरा व्यक्तिगत मत है कि प्रसन्नताही संपन्नता है. जो प्रसन्न नहीं है उसे विपन्न मानना चाहिए. केवल धन होने से कोई संपन्न नहीं होता. तुलसीदास ने रामचरित मानस में रावण के दारिद्र्य का चित्रण किया है. वह संपन्न है लेकिन वैचारिक और नैतिक रूप से दरिद्र है. गाहे-बगाहे जीवन में अनेक संपन्न दरिद्र लोगों से दो-चार होना पड़ता है.
दिनांक: 16 अगस्त 2025
सुबह जब टहलने के लिए निकला तो कविता महावीर मंदिर को धो रही थी. लौटते वक्त तक वह मंदिर की सफाई में लगी रही. उसने कहा – “पहले आप के घर का ही काम कर देता हूँ”. मैंने सहमति में सर हिलाया. वह पंद्रह दिनों के बाद अपने गाँव से ससुर का श्राद्धकर्म सम्पान कर लौटी है. एक लाख तीस हजार रुपये कर्ज लेकर उसने भाई-बंधुओं को खिलाया है. सूद की दर पांच रुपये सैकड़ा है. उसे सधाने के लिए वह सुबह सात बजे से शाम छ:बजे तक तीन घरों में लगातार काम कर रही है. मैं सोचता हूँ कि प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों में चित्रित समाज अब भी नहीं बदला है. विडंबना यह है कि उनके विभिन्न पात्र अब भी मौजूद हैं. कुछ का स्वरूप बदल गया है तो कुछ के लोकेशन. इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए अलग से लिखूंगा. कर्मकांड और दिखावे के मकड़जाल से कब मुक्ति मिलेगी. इतने वर्षों के बाद भी हम एक सभ्य और विवेकसंपन्न समाज नहीं बना पाए.

ललन चतुर्वेदी (मूल नाम-ललन कुमार चौबे)
मुजफ्फरपुर(बिहार) के पश्चिमी इलाके में
प्रकाशित कृतियाँ : प्रश्नकाल का दौर , बुद्धिजीवी और गधे (दो व्यंग्य संकलन), ईश्वर की डायरी , यह देवताओं का सोने का समय है एवं आवाज घर (तीन कविता संग्रह) तथा साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएं एवं व्यंग्य प्रकाशित।
रांची-834003
मोबाइल न. 9431582801
ईमेल: lalancsb@gmail.com


