मुद्दतों बाद किसी हिंदी फ़िल्म का इंतज़ार किया वरना ओटीटी ने विश्व सिनेमा का ऐसा ज़ख़ीरा सहज उपलब्ध करवा दिया है कि बॉलीवुड मसाला फ़िल्में उनके मुकाबले में कहीं टिक नहीं पातीं। हालांकि हमारे समय के हिंदी सिनेमा में इम्तियाज़ अली जैसे कुछ निर्देशक सुखद अपवाद हैं। इम्तियाज़ अली एक सूफ़ी तबीयत के खोजी यायावर हैं। यह खोज दिखती बाहर है पर चलती भीतर है। जैसे ही इम्तियाज़ द्वारा निर्देशित नई फ़िल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ थिएटर में लगी, मैं जाकर देख आया।
विभाजन, युद्ध और निर्वासन जैसी त्रासदियाँ कुछ बुनियादी सवाल हर बार हमारे सामने खड़ा करती हैं। मसलन, मनुष्यता की नींव वाक़ई मजबूत कितनी है? क्या उसे धर्मोन्माद आदि की छोटी-सी चिंगारी ध्वस्त कर सकती है? क्या ‘निर्वासन’ और ‘विस्थापन’ शत प्रतिशत पर्यायवाची शब्द हैं या ऐसा कहा जा सकता है कि हर निर्वासन एक विस्थापन होता है लेकिन हर विस्थापन का एक निर्वासन होना ज़रूरी नहीं? क्या निर्वासन महज़ एक भौगोलिक विडंबना है या इसे हम मानसिक और दार्शनिक तौर पर भी परिभाषित कर सकते हैं? भारत-पाकिस्तान विभाजन के संदर्भ में विस्थापितों पर गौर करें तो दर्द और ज़िल्लत झेलने के बाद अंततः कब जाकर शरणार्थियों ने ख़ुद को उस नये देश का मूल निवासी मानना शुरू कर दिया होगा जहाँ उन्होंने अपना ठिकाना बसा लिया था? क्या कभी नहीं—मरते दम तक नहीं? आज भी दिल्ली के कुछ इलाक़ों को ‘रिफ्यूजी कॉलोनी’ कहा जाना और पाकिस्तान में ‘मुहाजिर’ जैसे शब्द का इस्तेमाल क्या यह साबित नहीं करता कि अब भी साल सैंतालीस के कोड़े कुछ लोगों की देह और आत्मा पर लगातार पड़ते ही जा रहे हैं?
विभाजन पर आधारित जो अन्य फ़िल्में मैंने देखी हैं, उनसे जो बात ‘मैं वापस आऊंगा’ को अलग बनाती है, वह यह है कि यह फ़िल्म कृत्रिम नहीं है। यह वास्तविकता के इतने क़रीब है कि प्रेम कहानी में भी निर्देशक कोई फंतासी भरी छूट नहीं लेता, कोई गीत या दृश्य ठूंसा हुआ नहीं लगता। सब कुछ उस दौर के अनुसार होता है। यह फ़िल्मी होते हुए भी एक फ़िल्मी प्रेम कहानी नहीं लगती है। प्रेम कहानी को इतना इंटेंस नहीं बनाया गया है कि किरदार और कहानी अपनी लय खो बैठें। कीनू (वेदांग रैना) और जिया/अफ़साना (शरवरी) के बीच रिश्ता एक धीमी चलती धुन की तरह आगे बढ़ता है और वह आगे बढ़ता ही रहता है—फ़िल्म के आख़िरी फ़्रेम तक।
विभाजन की सुगबुगाहट के समय लोग अपनी सहज स्वाभाविक ज़िंदगी जी रहे होते हैं। वे तय कर रहे होते हैं कि उन्हें अपनी ज़मीन नहीं छोड़नी है, जैसा कि राजस्थानी में कवि पह्मनाभ द्वारा पंद्रहवीं सदी में कहा गया है—‘इला ना देणी आपणी’। हालांकि साल 1947 के लोगों के मन में यह भावना वीर रस से प्रेरित न होकर सहज मानवता से प्रेरित रही—भाईचारे पर बहुत यक़ीन था उन्हें। लेकिन हम जानते हैं कि इतिहास कुछ और है तो उन लोगों की तक़दीर कुछ और होनी थी। वह वैसी हुई भी। लेकिन इस फ़िल्म में दृश्य इतने भी एकाएक नहीं बदलते हैं, न ही परिस्थितियाँ। इम्तियाज़ ने किसी भी सेंसेशन का शिकार होने से फ़िल्म की पटकथा को बचा लिया है। कहना न होगा कि पटकथा किसी भी फ़िल्म की जान होती है।
जब आप पुराने पंजाब को देखते हैं तो फिल्मांकन आँखों को सुकून देता है। जब विभाजन के बारे में नायक की आँख खुलती है (जो एक शायर होता है) तो इम्तियाज़ एक पेन का टूटना और स्याही का बिखरना दिखाते हैं। यह एक प्रतीकवादी दृश्य बन जाता है। यह शायर कीनू के सपने टूटने का क्षण है। विभाजन के दौरान हिंसा के दृश्य एक दुख भरी कविता की तरह फ़िल्माए गए हैं। इम्तियाज़ सहज ही अपने किरदारों से यह कहलवा देते हैं, “हमारे ख़ानदान पर औरतों का श्राप है।” यह संवाद उस दौर में औरतों पर हुए पूरे अत्याचार को सिर्फ़ एक पंक्ति में बयाँ कर देता है। इसे एक बड़े पैमाने पर देखें तो शायद दुनिया की समस्त रिफ्यूजी कौमों पर औरतों का क़र्ज़ है (श्राप न सही)।
नसीरुद्दीन शाह ने इम्तियाज़ के निर्देशन में अपने अभिनय की चरमावस्था को प्राप्त किया है। मुझे नहीं लगता कि कोई और बूढ़े ईसर सिंह के किरदार को उनसे बेहतर निभा सकता था। डिमेंशिया की बीमारी से जूझ रहा एक बूढ़ा रिफ्यूजी शायर अपनी स्मृति के टुकड़ों को जोड़कर पाकिस्तान में छूट गई अपनी प्रेमिका की छवि मन में सुरक्षित रखता है। वह अस्फुट आवाज़ में बोलता है, काँपते हाथों से काग़ज़ पकड़ता है। उसने पाकिस्तान में छूट गए सरगोदा को अब तक अपना घर माना हुआ है। ‘हिंदुस्तान’ आने के बाद जवानी में उसने ख़ुद को रिफ्यूजी मानकर अटूट मेहनत की है क्योंकि कोई और विकल्प था नहीं उसके पास। वह जिया के प्रति अपने प्रेम और वायदे को अपने भीतर जज्ब किए एक समर्पित प्रेमी बना रहा है। सिवाय उस दृश्य के जहाँ 1953 की पाकिस्तान यात्रा के दौरान उसे पता चलता है कि जिया ने मजबूरी में शादी कर ली है और वह उसे बिना मिले ही लौट आता है—लड़की की परिस्थिति समझे बिना—उन पलों में ग़ुस्से से भरे युवा ईसर सिंह (वेदांग रैना) को ‘male ego’ के वशीभूत व्यक्ति और परास्त प्रेमी दोनों दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है।
जवान ईसर सिंह के किरदार में वेदांग रैना की अदाकारी सबसे अधिक आश्चर्यचकित करती है। उनके चेहरे पर एक सहज मासूमियत है और बोलती हुई आँखें। ‘हमन है इश्क़ मस्ताना’ एक अनूठा गीत है जिसमें कमाल की कोरियोग्राफी है और वेदांग ने इस अद्भुत नृत्य को इतनी सहजता से किया है जैसे जीभ पर रखते ही कुछ मिठाइयाँ अपने आप मुँह में घुल जाया करती हैं। शरवरी का उर्दू उच्चारण ख़ालिस और सुकून देने वाला है। जिया (शरवरी) की अदाएँ और लटके-झटके भी उस बीते हुए दौर के लगते हैं जिनमें एक मुलायमियत है, नज़ाकत है।
दिलजीत दोसांझ अब बेहद साफ़ हिंदी बोलने लगे हैं। उनका किरदार एक एनआरआई का है और उसकी अपनी जीवन यात्रा को देखते हुए यह समझा जा सकता है कि उसके उच्चारण में पंजाबी लहजा नहीं बचा होगा। लेकिन रजत कपूर की हिंदी भी पंजाबी लहजे से विहीन होना थोड़ा निराश करता है। आधुनिकता के चलते हर नयी पीढ़ी के साथ भाषा का कुछ ह्रास होता है लेकिन ईसर सिंह की अगली पीढ़ी में भी यह होना स्वीकार्य नहीं लगता। फ़िल्म में जो ‘वर्तमान’ दिखाया गया है, उसमें बूढ़े नसीरुद्दीन शाह (जो अभिनय के अलग ही मुकाम पर हैं) और दिलजीत के अलावा किसी ने ख़ास प्रभावित नहीं किया। वर्तमान से संबंधित दृश्यों में कलात्मकता की कमी भी महसूस होती है। दिलजीत के स्टैंड अप कॉमेडी वाले दृश्य बेहतर लिखे जा सकते थे।
चूँकि इस फिल्म में आप एक साथ आज के दौर और 1947 के दौर को देख पाते हैं, तो एक तुलनात्मक विश्लेषण करने की स्वतंत्रता आप ले सकते हैं। उस दौर की भाषा और तहज़ीब हमें आईना दिखाती है कि हमने संस्कृति का कितना भव्य रूप खो दिया है। प्यार जितना सहज उपलब्ध होता गया, इतनी वह गहराई खोता गया।
फ़िल्म के गीत इम्तियाज़ की अन्य फ़िल्मों की तरह इरशाद कामिल ने लिखे हैं और उन्हें संगीतबद्ध किया है एआर रहमान ने। गीत इस कहानी के पूरक हैं। जिन बातों को कहने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ किरदारों के बीच नहीं निकल सकीं, उन्हीं भावनाओं को फ़िल्म के गीत भली-भांति व्यक्त कर देते हैं। ऑटो ट्यून संगीत और रैप के इस फीके दौर में इस फ़िल्म के गीतों का चर्चित होना यह भी सिद्ध करता है कि वास्तव में विशुद्ध मेलोडी हर दौर में सराही जाती रहेगी।
यह फ़िल्म इम्तियाज़ की अन्य फ़िल्मों से कुछ मामलों में समान है और कुछ में जुदा। जहाँ वह अलग है—एक मूल विचार के तौर पर—वहाँ भी वह बहुत स्वाभाविक और ईमानदार है। यह फ़िल्म और इसको मिल रही तमाम मुहब्बतें (इस लेख सहित) कीनू और जिया के लिए हैं और उनके जैसे बहुत से प्रेमियों के लिए भी जिनके बीच का धागा 1947 में खींची गई एक लकीर ने तोड़ डाला।
~देवेश पथ सारिया
परिचय
देवेश पथ सारिया एक हिन्दी कवि-गद्यकार एवं अनुवादक हैं।
कविता संकलन : अदृश्य आत्मीय की टोह में (2025), नूह की नाव (2022), ; कहानी संग्रह : स्टिंकी टोफू (2025); कथेतर गद्य : छोटी आँखों की पुतलियों में (2022, ताइवान डायरी); अनुवाद : यातना शिविर में साथिनें (2023), हक़ीक़त के बीच दरार (2021) ।
पुरस्कार : भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (2023), स्नेहमयी चौधरी सम्मान (2025)।
अनुवाद : देवेश की रचनाओं का अनुवाद अंग्रेज़ी, मंदारिन, स्पेनिश, रूसी, बांग्ला, मराठी, पंजाबी और राजस्थानी भाषा- बोलियों में हो चुका है। अंग्रेज़ी में भी एक कविता संग्रह A Toast to Winter Solstice (2023, अनुवादक : शिवम तोमर) प्रकाशित।
संपादन : गोल चक्कर वेब पत्रिका (golchakkar.org)
ईमेल : deveshpath@gmail.com



This is exactly where the true relevance of this film by Imtiaz Ali becomes clear. There are many children in today’s new generation who have not read Jhootha Sach by Yashpal or Tamas by Bhisham Sahni, who are not very familiar with Manto’s writing, and who have not read Sahir’s poem Parchhaiyan while wiping tears from their blurred eyes. They are equally unaware of powerful English masterpieces like Train to Pakistan by Khushwant Singh, which beautifully yet painfully captures the raw human cost of that era. This film introduces them to the bitter reality of those times with great silence and seriousness. Imtiaz Ali’s effort to connect the new generation with this chapter of their own history is truly meaningful. Read on my Facebook wall to know why my connection with good films is so deep.
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