1.एक स्त्री का सपना
पति को सपने आते हैं कारख़ानों के
जिनमें काम किया था उसने तमाम उम्र
ससुर के सपने में आती है हवेली
जहाँ उनकी जवानी गुज़री थी
सास के सपने में आते हैं
अठखेलियाँ करते नन्हें पोते-पोती
जो बहू के पेट में हैं अभी
लेकिन उस स्त्री के सपने में
आती है उसकी बूढ़ी माँ
और आँगन का नीम
जिसके पत्ते छुआकर आज भी
कोई उसे नींद में जगाता है
2.दुख
हम एक दूसरे का मन समझते हैं
जब मैं अकेला होता हूँ
और उससे बात करने वाला भी
आस-पास कोई नहीं होता
वह मेरे घर चला आता है
और दबे पाँव नज़दीक आकर
कान में फुसफुसाता है—
“मैं तुम्हारे साथ हूँ!”
3.लौटना
अभिनव मेरे पास सो रहा है
लगता है पिता लौट आए हैं
मेरे पास
उनके सीने पर सिर टिकाए
सो रहा हूँ मैं आज
अभिनव की जगह
(पिता के लिए)
4.तुम्हें याद करते हुए
तुम्हें याद करना
जैसे घुप्प अँधेरे में अमरूद तोड़ना
तुम्हारी सारी स्मृतियाँ धुँधला चुकी हैं
किसी महीन धागे का सिरा पकड़ता हूँ
मगर फिर हाथ से छूट जाता है
क्या समय स्मृतियों को मिटा देता है?
क्या यह कम है कि
मुझे तुम्हारा नाम मालूम है
तुम्हारी नाक की बाली और गाल का तिल भी
जो अब खिंचकर कान तक आ गया होगा
इसके सिवा बहुत यत्न करता हूँ
तो भी नहीं बन पाता कोई अक्स
मैं सिर्फ़ कल्पना करता हूँ
अब तुम कैसी दिखती होगी
जब तुमने जीम ली होगी और बीस दिवाली
फिर सोचता हूँ
तुम्हारी स्मृति में कैसा होगा
वह दुबला-सा शर्मीला लड़का
जो अब कविताएँ लिखता है
क्या तुम पढ़ती होगी कविताएँ
और ढूँढ़ती होगी उनमें अपने आप को
5.आवाज़ें
वे गाँव में रहते थे
दिन-भर खेतों में काम करते
रात को ज़मीन पर सो जाते पुआल बिछा कर
जब ज़मीनें छीन ली सरकार ने
अमीरों को सौंपने के लिए
अब वे अपनी ही ज़मीनों पर बनी
फैक्ट्रियों में मज़दूरी करते हैं
वे अब भी ज़मीन पर ही सोते हैं
ग़ैरों की हो जाने पर भी
उसे आत्मा से ज़्यादा प्यार करते हैं
लेकिन काँपते रहते हैं दिन-रात
अपनी ज़मीन के साथ-साथ
वे देखते हैं झुग्गियों से तिरपाल हटा कर
अपनी आत्मा के दुश्मनों को
जो लाव-लश्कर के साथ खड़े मिलते हैं बाहर
कहाँ जाएँ, किधर जाएँ, क्या करें
उन पर चौतरफ़ा हमले हो रहे हैं
और एक मैं उनके बीच से शहर आकर
पेड़-पौधों और फूलों के बगीचे ढूँढ़ता हूँ
क्या पंछियों के चहकने की आवाज़ें
अब इस दुनिया से ख़त्म हो गई हैं
या सिर्फ़ मुझे सुनाई नहीं दे रही हैं?
आज अपने घर में सोते हुए
ज़मीन से कान लगाकर सुनता हूँ
आत्मा के दुश्मनों की चहल-क़दमी
जो मैंने कभी गाँव में सुनी थी
खिड़की खोल कर बाहर देखता हूँ
बगल के स्टेशन से रात भर
गुज़रती हैं रेलगाड़ियाँ
और उनके गुज़र जाने के बाद भी
पटरियाँ देर तक काँपती हैं

विजय राही का जन्म 03 फ़रवरी, 1990 को बिलौना कलॉ, लालसोट, दौसा, राजस्थान में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के सरकारी स्कूल से, स्नातक राजकीय महाविद्यालय, दौसा से एवं स्नातकोत्तर शिक्षा हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय से हुई।
हिन्दी-उर्दू के साथ-साथ राजस्थानी भाषा में समानान्तर लेखन। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं, ब्लॉग्स और वेबसाईट्स पर कविताएँ प्रकाशित। कविताओं का अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी, पश्तो, मराठी, मलयालम, नेपाली और मंदारिन में अनुवाद। राजस्थान साहित्य अकादमी- उदयपुर, रज़ा फाउंडेशन, इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर- नई दिल्ली, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल- जयपुर, संगत नेशनल यूथ पोयट्री फेस्टिवल- पटियाला, विदेश मंत्रालय- भारत सरकार, नई दिल्ली में कविता पाठ। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर कविताओं का प्रसारण।
पहला हिन्दी कविता संग्रह ‘दूर से दिख जाती है बारिश’ (2026) राजकमल प्रकाशन समूह, नई दिल्ली से प्रकाशित।
सम्प्रति—
राजकीय महाविद्यालय, कानोता, जयपुर में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी) के पद पर कार्यरत।
ईमेल vjbilona532@gmail.com


