वह लंबा, पतला और कमजोर है। यूं समझो बिल्कुल सीख सलाई-सा। सांवला रंग, सिर पर घने-काले बाल ! ऊंची उठी नाक और चेहरे पर कहीं-कहीं हल्के रोये ! उम्र रही होगी कोई सोलह-सत्रह ! शरीर पर नया जैसा सफ़ेद कुर्ता-पाजामा। नाम है पन्ना।…और काम, इसी श्मशान में मुर्दे फूंकना। दिन भर इसी काम के चलते अंधेरा ढलने पर वह थककर चूर हो जाता है तो ट्यूबवैल चला कर जल्दी-जल्दी चार बाल्टी पानी सिर पर उड़ेल कर वहीं छोटी-सी कोठरी में औंधे मुंह पड़ जाता है।
कहते हैं इसी पीपल वाले शमशान का लंगड़ा पंडित उसे यहां लाया था।…और खुद तो कमाई के दूसरे धंधों में जाने लगा और मुर्दे फूंकने के काम में पन्ना को लगा छोड़ा है। पन्ना के लिये पहले दो महीने बहुत दिक्कतों-दुश्वारियों के रहे। देखने की बात है पंद्रह-सोलह साल का लड़का और मुर्दे फूँकना ! किसी भी सूरत में ये काम मेल नहीं खाता। शुरुआत में उसे दिन भर उबकाइयाँ आती, उल्टी होने को होती और मन हमेशा खराब रहता। खाना गले से नीचे नहीं उतरता। हर वक्त खौफनाक सपने बलात ही आँखों में बने रहते।…और मुर्द-घाट में नींद कहाँ ! उसे भूत-पिशाच दिखाई देते ! एक बार तो उसने भाग जाने की सोची लेकिन एक सवाल सामने था, जाएगा कहाँ ? इन सब दुश्वारियों के बावजूद वह चार-पाँच महीनों में ही सब कुछ सीख गया। अब अकेला ही सारा काम संभाल रहा है। यहां के अन्य कर्मचारियों के लिए वह एकदम अनजान है। उसका आगे पीछे का कुछ पता नहीं है ! कौन मां-बाप हैं ? कहां जन्मा है, कहां बड़ा हुआ, कौन जात, धर्म क्या है और किन परिस्थितियों में यहां तक आ पहुंचा। ये सभी सवाल उसके साथ जुड़े हैं। लोग-बागों के लिए तो वह आसमान से ही टपका है। इतनी बड़ी दुनिया में उसका कोई नहीं है। इतने सब के बावजूद एक किस्सा, जाने झूठ है सच है, उसके इर्द-गिर्द घूमता रहता है…सुनने में आया हैं कि वह अनाथालय में पला-बढ़ा था, एक दिन वहां से लड़-झगड़कर भाग निकला। बहुत दिनों तक दर-दर की ठोकरें खाता रहा।…फिर कहीं एक दिन वह लंगड़े पंडित से टकराया, पंडित के हाथों तो दूर की कौड़ी लग गई। वह उसे बहला-फुसला कर शमशान ले आया।
पीपल वाला श्मशान शहर की हलचल, आपाधापी से हटकर सुनसान में बना हुआ है।
लंगड़ा पंडित रोज रात को शमशान का चक्कर लगाता है और दिन भर में इकठ्ठा हुए सामान कपड़े, चादरें, शालें समेट कर अपने साथ ले जाता है। इस काम में वह कभी कोताही नहीं बरतता।…और पन्ना के लिए कुछ भी नहीं। हां, उसकी बाहर के ढाबे पर सुबह-शाम की रोटी बंधी हुई है, पंडित उसे जरूर महीने में चुकता करता है।…पन्ना भी दोनों टाइम ढाबे में खा कर अपनी कोठरी में चुपचाप लौट आता है। किसी से कोई बात नहीं करता। वैसे भी वह परले दर्जे का संकोची और चुप रहने वाला जीव है।
…बस यही राम कहानी है पन्ना की !
आज वह सोकर उठा, मुँह हाथ धोकर बागीचे में फूलों के बीच पहुंच गया। चाय की तलब उसे परेशान किए दे रही है। अभी सुबह की ताज़ा बयार शरीर की अकड़न को तोड़ भी नहीं पाई थी कि उसके कानों में मध्यम-सा स्वर पड़ने लगा…राम नाम सत है !
” आज इतनी जल्दी…” वह फुसफुसाया। उसने गेट की ओर देखा, एक अर्थी भीतर तक घुस आई है। छोटी सी एक भीड़ यंत्रवत उसके इर्द-गिर्द चल रही है।…सत बोलो गत है ! फिर उसके कानों में पड़ा, वह नाक-भौंह सिकोड़ कर फिर से बड़बड़ाया, ” सुबह, सुबह ! ” वह चाय की इच्छा को वहीं छोड़, लोगों को अपने तक पहुंचने पर संगमरमर के चबूतरे की ओर चलने लगा।
वहां मुर्दे को लाया गया और प्रारंभिक अनुष्ठान शुरू होने लगा। थोड़ी ही देर में पन्ना के मंत्रो उच्चारण ने दूसरे लोगों की ध्वनि को दबा दिया। देर तक वही सब चलता रहा।
पन्ना अब चिता की तैयारी में लगा हुआ है। वहां पहुंचे लोग भी लकड़ियां ला-ला कर उसे थमा रहे हैं। कहते हैं ऐसा करना पुण्य होता है। जने-जने की लकड़ी एक जने का बोझ !
लोगों की मदद से मृतक को चिता पर लेटाया गया। इस पल पन्ना ने उस पर चढ़ी चादरें, शालें उठाकर दाहिने स्थित बेंच पर सधे हाथों से ज्यों की त्यों रख दी। ऊपर तक लड़कियां लग गई। घी डाल दिया गया, सामग्री डाल दी गई। रिश्तेदारों ने परिक्रमा कर चिता को अग्नि दे दी है और इसी दौरान पन्ना फिर मंत्र उच्चारण करने लगा। आग की लपटों के साथ-साथ स्वाहा-स्वाहा की ध्वनि पूरे शमशान की हवा में घुलती जा रही है।
पन्ना वहीं पास ही उकड़ू बैठ गया। साथ के लोग थोड़ी दूरी पर बैंचों पर बैठने लग गए हैं।
मानव शरीर और सामग्री जलने की गंध चारों ओर फैलती जा रही है।
कपाल क्रिया की अवस्था आ गई। पन्ना ने रिश्तेदारों के बीच से छोटी उम्र के सिर मुंड़े लड़के को बुलाया और बांस से कपाल क्रिया करवाई, मंत्र पढ़े।
सूरज ऊपर तक चढ़ आया है, चिता से निकलती आग की लपटें सारे वातावरण को तपा रही है।
बहुत वक्त हो गया है। लोग-बागों का संयम टूटने लगा है वे चलने को तैयार हैं।
पन्ना ने विधिवत तेहरवीं की तारीख बता कर सबको विदा किया।
…जीवन इसी गति से चल रहा है। अगले दिन सुबह-सुबह पन्ना ने बूढ़े माली को काम करते देखा तो खुशी-खुशी पास आकर बोला, ” कब आए ? “
साल भर से रोज़ सुबह की फुरसत के इन्हीं पलों ने उन दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ा दी हैं। वे आपस में खुले हुए हैं।
“बस थोड़ी देर पहले। मैं तो गर्मी-गर्मी सुबह ही काम निपटा देता हूं फिर दोपहर में बाहर नहीं निकलता। ” बूढ़े के हाथ चलते रहे, रुके नहीं।
” चाय नहीं पिओगे। ” उसके भीतर चाय की तलब उठ रही है।
” चाय मांगते हैं पहले बता यह लंगड़ा तुझे कितने रुपए देता है ? “
” रुपये और मुझे ! ” वह आश्चर्य से बूढ़े माली को देखने लगा और फिर बोला, ” अरे बाबा क्या बात कर दी लंगड़ा और पैसे देगा ! “
” कुछ भी नहीं ! ” आश्चर्य से बूढ़े के हाथ रुक गए, वहीं बैठे-बैठे सिर उठाकर उसके चेहरे पर देखने लगा और फुसफुसाया, ” अरे सारा काम तू करता है, दिन में दस-दस मुर्दे फूंकता है और उनका सारा सामान भी वह ले जाता है, ऊपर से तुझे धेला नहीं देता ! यह तो ठीक नहीं है, जुल्म है ! “
” हूं। “
” तू कहता क्यूँ नहीं ? “
” ये तो उसे खुद भी सोचना चाहिए…”
” खुद तो सोच लिया उसने ! देख नहीं रहा कितनी चालू रकम है। कैसे मरता है पैसे-पैसे को ! यहाँ से ले, वहाँ से ले, कितनी जगह टांगे फंसा रखी है।… एक तो दुकान डाली हुई है फिर सत्य-नारायन की कथा, सुंदर काण्ड और न जाने क्या-क्या।…लोगों को क्या पता ये मुर्दे जलाने वाला पंडित है।…वैसे भी लंगड़ा है ना, एक-दो ऐब फालतू है उसमें। अच्छा ये सब छोड़, एक बात बता वह दिन में भी आता है काम के वक्त ? ” बूढ़ा फिर गमले की मिट्टी खोदने लगा।
” वह तब आता है जब कोई बड़ी मुर्गी आती है, वी.आई.पी. मुर्दा। तब दान दक्षिणा मिलती है न, इसलिए। “
बूढ़ा फिर हैरान रह गया। उसके मुंह से कुछ न निकला।
थोड़ी देर के लिए उनके बीच चुप्पी ठहर गई।
बाहर की दुकान से चाय वाला लड़का दो छोटे-छोटे गिलास चाय दे गया।
” एक बार कह तो उसे…” बूढ़े ने खुरपी वहीं छोड़ दी और उसे इशारे से बोला, ” बैठ जा यहीं। “
यहां पेड़ों का अच्छा खासा झुरमुट हैं, फूलों के पौधे और हरियाली चारों तरफ फैली हुई है। यहाँ सुबह गर्म नहीं होती, अभी भी ठंडी बयार चल रही है।
वे दोनों आमने-सामने पंजों के बल बैठ गए हैं।
” कहूंगा जरूर एक दफा, पर सोचता हूं कैसे कहूं ! ” पन्ना बहुत संजीदगी से बोला।
” पहले शर्म छोड़नी पड़ेगी, बिलकुल बेशर्म बन जा। कहना, मेरा भी मन करता है…पहनने-खाने का, बाहर घूमने-फिरने का…”
वे दोनों चुप हो गये। चाय पीकर बूढ़ा अपने काम में जुट गया और वह कुछ कदम चल कर फूलों के बीच पहुँच गया। उसके दिमाग में उथल-पुथल हो रही है…पंडित से कैसे बात छेड़ी जाय !
बहुत देर तक वह वहीं फूलों के बीच टहलता रहा।
उसी दिन से पन्ना अपने शर्मीले स्वभाव को छोड़ रोज़ लँगड़े पंडित को याद दिलाता मगर वह न जाने किस मिट्टी का बना है कि कानों पर जूं तक न रेंगती।
एक शाम उसने पंडित को रोककर, सामने आकर कहा, “ आज तो आप मुझे बता ही दो, महीने में कुछ दिया करोगे या नहीं ? ”
“ दे देंगे तू परेशान क्यों हो रहा है। करना क्या है तुझे पैसों का ? ” उसी लापरवाही से पंडित बोला।
“ कुछ भी करना हो, मैं अपनी मेहनत के मांग रहा हूँ। ”
पंडित चुप रहा, सोचने लगा…जरूर इसे कोई सीखा रहा है, ये इसकी भाषा ही नहीं है। एक छोटे अंतराल के बाद वह कहने लगा, “ देख पन्ना तू यहाँ लोगों के साथ ज्यादा बात न किया कर, ये ठीक लोग नहीं हैं। मैं दूंगा तुझे, मैंने कब मना किया है…”
“ लेकिन आप शायद भूल रहे हैं मुझे यहाँ दो साल हो गए हैं ये काम करते हुए और अभी तक एक फूटी कौड़ी भी नहीं दी है आपने। ” पन्ना की आवाज़ तेज़ हो गई वह कुछ देर रुक कर फिर बोलने लगा, “ एक दिन भाग जाऊंगा, फिर खुद ही देखना…”
उसकी बातें सुन कर पंडित हैरान रह गया, डर भी गया।…इसको कोई न कोई उकसा रहा है। उसने सोचा और उसके कंधे थपथपाते हुए बोला, “ चलो कल बात करते हैं…” दुपहिया पर किक मारते हुए वह श्मशान भूमि के बाहर निकल गया।
मौसम बदल रहा है। धूप की तपीश दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। सुबह-शाम अच्छी खासी ठंडी रहने लगी हैं।…लेकिन यहाँ मुर्द घाट में कुछ भी न बदला। सब जस-का-तस है। मुर्दे आते हैं। पन्ना जी-जान से जुट जाता है, मंत्र बोलता है और मुर्दे को आग के हवाले कर देता है। रोज़ का यही तोड़ देने वाला रुटिन उसकी आकांषाओं और भीतर के इंसान तक को स्वाहा कर दे रहा है। वह इतना थक जाता है कि रात होने तक उसका दिमाग सोचने-समझने लायक ही नहीं रह पाता।
एक सुबह बूढ़े माली ने पन्ना को देखकर चाय मँगवा ली, काम करते-करते कहने लगा, “ हाँ भई कुछ बना, हुई बात ? ”
पन्ना वहीं एक पत्थर पर बैठ गया, सिर नीचे करते हुए बोला, “ कहाँ बाबा, लंगड़ा हाथ ही नहीं रखने देता। बहुत कोशिश कर ली। ”
बूढ़े ने गौर से देखा, उसकी आँखें नम हैं।
“ जब सीधी उँगली से घी नहीं निकलता तो टेढ़ी करनी पड़ती है…तुझे ही कुछ करना पड़ेगा। चिंता मत कर हम भी मदद करेंगे। ” बूढ़े ने बैंच से कमर टेक दी और फिर बोलने लगा, “ लकड़ी की टाल वाले को आने दे, उससे बात करते हैं…”
उस शाम बूढ़ा, पन्ना और टाल वाला इंदर देव तीनों ने गुप्त मीटिंग की।
अगली सुबह सारा शमशान सन्नाटे में जकड़ा हुआ है। बारह बज गये हैं लेकिन कोई मुर्दा नहीं आया। लकड़ी की टाल वाला इंदर देव दस बजे से ही आकर बैठ गया है। निगम का कर्मचारी बूढ़ा माली बगिया में पानी लगा कर इंदर देव के पास बैठा सुस्ता रहा है।
तभी सुनाई दिया, राम नाम सत है ! एक मध्यम ध्वनि आस-पास की खामोशी को बड़ी ही नाजुकी से तोड़ रही है। इतना भर से टाल में बैठे दोनों के कान खड़े हो गये। वे एक दूसरे की आँखों में देखने लगे।
थोड़ी ही देर में वे अंदर आ गये। सामने किसी को न पाकर अर्थी के साथ के सभी लोग बैचेन हो गये। कुछ देर तो वे जैसे-तैसे इंतज़ार करते रहे फिर गुस्साये लकड़ी की टाल पर आकर खड़े हो गये।
उधर इंदर देव भाग-भाग कर चारों ओर देख आया। पन्ना का कहीं नामो-निशान नहीं है।
इस अनहोनी से बूढ़ा माली भी परेशान लग रहा है। लोगों की भीड़ देखकर वह झुंझुला गया। गुस्से में बोला, “ पीछे देखा है ? ”
“ हाँ, देख आया। ”
“ और ट्यूबवैल पर ? ”
“ वहाँ भी कोई नहीं है। ”
“ ऐसा कर, लँगड़े को फोन लगा। ”
भीड़ के सामने दोनों में यही बातचीत चली।
उसी समय बूढ़ा धूम कर वहाँ खड़े लोगों से मुखातिब हुआ और संजीदगी से बोला, “ आप सभी वहीं पहुंचे, हम बुलाते हैं पंडित को। ”
नाराजगी भरी टिप्पणियाँ करते हुई भीड़ वहाँ से हट गई।
इंदर देव ने फोन पर सारी स्थिति लँगड़े पंडित को बता दी। आधे ही घंटे में वह बेतहाशा दौड़ता हुआ पहुंचा और चिल्लाया, “ कहाँ गया वो छोकरा ? ”
“ पता नहीं। ” इंदर देव पहले ही खुंदक खाया बैठा था, पब्लिक उसके पीछे जो पड़ गई थी, कुछेक ने उल्टा-सीधा भी कह दिया था।
“ उसकी कोठरी में देखा ? ”
“ हाँ देख लिया, नहीं है वहाँ। ”
“ ये पूछताछ बाद में कर लेना पहले काम शुरू कर दो, लोगबाग भड़के हुए हैं। ” बहुत संजीदगी से वहीं बैठा बूढ़ा बोला।
परिस्थितियों को देखते हुए पंडित चुप हो गया और मुंह ही मुंह में कुछ बड़बड़ाते हुए संगमरमर के चबूतरे की ओर चल दिया।
डेड-बॉडी के चारों ओर खड़े लोगों में गहरा असंतोष है। कुछ ताकतवर, जवान लड़कों ने पंडित को घेर लिया। उनके बीच तना-तनी हो गई। पंडित ने माफी मांगकर जैसे-तैसे उन सब को ठंडा किया और अंत्येष्ठी के काम में लग गया। उसके हाथ और जुबान लगातार चल रहे हैं लेकिन उसके दिमाग में पन्ना की खोज मची हुई है।
दो-ढाई घंटे बाद काम से फारिक होकर पंडित पीछे की तरफ लकड़ियों की टाल पर पहुंचा तो स्तब्ध रह गया। पन्ना वहाँ बैठा हुआ है।
“ अबे तू यहाँ…” गुस्से और हैरानी में उसके मुंह से निकला लेकिन पल भर में ही स्वयं पर नियंत्रण कर फिर बोला, “ पता है कितनी भाग-दौड़ करके आना पड़ा, वो भी जरूरी काम छोड़ कर…”
“ ये काम भी तो तुम्हारा ही है। इसे कौन करेगा ! ” इंद्र देव अभी भी गुस्से में है।
बातचीत के इन्हीं पलों में बूढ़े ने दो बीड़ियां सुलगा लीं, एक टाल वाले को देते हुए कहने लगा, “ क्या इस काम के इस लौंडे को महीने में कुछ देते हो ? ”
“… लेकिन ये बात तो शाम को भी हो सकती थी, इतना ड्रामा किस लिए ? ”
“ मैंने सौ बार कहा होगा…” आक्रोश में पन्ना बोला, “ अब जब तक हाथ में पैसे नहीं आ जाते मैं काम नहीं करूंगा। ”
खामोशी ने उनके बीच जगह बना ली। पंडित एकटक उनके चेहरे देख रहा है और सोच रहा है…ये साले पन्ना को इतना बोलना कैसे आ गया, इसकी इतनी हिम्मत !…ये इन दोनों की चाल है ! जेब से हज़ार रुपये निकाल कर उसकी ओर बढ़ाते हुए बोला, “ ये ले…”
पन्ना ने अपने हाथ पीछे खींच लिये और उससे नज़रें मिलते हुए बोला, “ हज़ार रुपये ! बस ! तुम्हीं रख लो, नहीं चाहिए मुझे। ”
“ यार पंडित कमाल करते हो, दो साल से कुछ नहीं दिया और अब हज़ार रुपल्ली दिखा रहे हो ! ” इंदर देव आखिरी कश खींच बीड़ी बुझाते हुए बोला।
पन्ना का चेहरा तमतमा रहा है, वह आक्रोश में बोलने लगा, “ आज तय करनी पड़ेंगी…मेरी तनख्वाह और हफ्ते में एक छूट्टी।…नहीं तो ! ”
वहाँ संदिग्ध-सा सन्नाटा फैल गया।
“ तू तो यूनियन लीडरों की तरह बोल रहा है…” पंडित तिरछी निगाह से पन्ना की ओर देखते हुए बोला।
“ लीडरों की क्या बात ! मैं मेहनत करता हूँ उसी का दाम चाहिए, बस ! ”
“ क्या है दाम ? ” व्यंग्यात्मक हंसी के साथ पंडित बोला।
“ दस हज़ार महीना और इतवार की छुट्टी। ” इस बार पन्ना की तरफ से बूढ़ा बोला।
“ दस हज़ार ! तुम सब ने पहले ही प्लान कर लिया था और फिर ये लौंडे के गायब होने का ड्रामा रचा गया…” आखिर पंडित चालू रकम है, सब कुछ समझ गया।
“ तुम दो साल से इसकी कमाई खाये जा रहे हो, वो क्या है…और एक बात बताऊँ कोई टेढ़ा आदमी टकरा गया तो बंद भी करवा देगा, मुझे नहीं लगता ये सोलह-सत्रह साल से ऊपर होगा…चाइल्ड लेबर केस में ! ” इंदर देव पंडित को कड़ी नज़र से देखते हुए बोला।
एक अंतराल खामोशी का आ गया।
“ आज अगर कुछ न हुआ तो मैं चला जाऊंगा…” पन्ना थोड़ा आगे चलकर लकड़ियों के ढेर पर बैठ गया और उन तीनों की ओर देखने लगा।
पंडित की बोलती बंद हो गई है। उसे लगा वह चारों तरफ से घिर गया है। उसने कभी सोचा नहीं था कि इस तरह की परिस्थितियाँ खड़ी हो जाएंगी। वह देर तक बचने के रास्ते सोचता रहा फिर मन ही मन होने वाले नुकसान का हिसाब लगाने लगा। कुछ ही देर में उठ खड़ा हुआ और धीमे से बोला, “ चल तू काम पे लग, कुछ न कुछ करूंगा तेरा। ”
“ नहीं, नहीं ऐसे नहीं ! पहले हाथ में रखो ! तब काम की बात करना…” पन्ना वहीं खड़ा असहमति में सिर हिलाता रहा।
माहौल थम गया। चुप्पी छा गई। कुछ ही देर बाद पंडित जेब से रुपए निकाल कर गिनने लगा और जल्दी से पन्ना के हाथ में रखकर, उन दोनों की ओर तिरछा देखते हुए तेजी से स्कूटर पर बैठ बाहर निकल गया।
वे तीनों एक-दूसरे के चेहरों पर देखने लगे। एक बार फिर चुप्पी ने जगह बना ली और तब टूटी जब एक साथ तीनों के ठहाके श्मशान के सन्नाटे में गूंजने लगे… “ बहुत चालू बनता था साला ! ” टाल वाला इंदर देव बोला।
वे देर तक हँसते रहे।
दो साल में पहली बार पन्ना को इतना खुलकर हँसते देखा गया।
-गजेंद्र रावत
___________________________________________________________________________________________________________
परिचय
गजेन्द्र रावत
विज्ञान स्नातक
प्रकाशन –
1. बारिश ठंड और वह (कहानी संग्रह)
2. धुआँ-धुआँ तथा अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह)
3. लकीर (कहानी संग्रह)
4. मुँह और कान (कविता संग्रह)
5. मेरी चयनित कहानियाँ
6. झूठ के पाँव (कहानी संग्रह)
7. छोटी कहानियाँ
बड़े कथानक
8. पच्चीस कहानियाँ (अंतिका प्रकाशन की श्रंखला)
9. चाँदनी तथा अन्य कहानियाँ (शीघ्र प्रकाश्य)
हिन्दी की सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में निरंतर कहानियों का प्रकाशन
संप्रति – स्वतन्त्र लेखन
ई-मेल rawatgsdm@gmail.com
