1. अप्रासंगिक
मिलना जितना अनिश्चित और अकस्मात रहा
उतना ही नियोजित था मानो अपरिचित होना
एक उदास शाम और बेचैन रात के बिल्कुल बीच
कभी न कभी खाली होना ही था आसमान को
कभी न कभी चुप हो जाना था हमसे गुजरती हवाओं को
कभी न कभी तो देखनी ही थी तुम्हारी पीठ
नींद की दवाइयों से हरी जाएगी स्मृति की अनींद
मल्टी-विटामिन से देह से किसी की अनुपस्थिति से आई दुर्बलता
दुख दूर करने के लिए दोस्त सुनाएँगे अपने-अपने शोक-पत्र
डॉक्टर समझाएँगे दुनिया बहुत बड़ी होती है
और यूनिवर्स में एक दुःख बहुत मामूली और छोटा ।
एक्स-रे रीपोर्ट में नहीं आएँगे मन में चलने वाले कदमों के निशान
वीरानेपन का भला कहाँ बनेगा कोई प्रतिबिम्ब
मनकों की तरह एक-एक दिन छूटकर गिरेंगे दूर
और अभी बिल्कुल अभी निकले होंगे उनकी प्राथमिकता से
पहले आवाज अप्रासंगिक होगी
फिर हमारे बीच की बातें
फिर धीरे-धीरे चेहरा अप्रासंगिक होता जाएगा
जहां सबसे अधिक प्रासंगिकता रहेगी
ठीक वहीं पर होना होगा सबसे अधिक अप्रासंगिक
2. एक चरवाहे का गीत
ख़ानाबदोश था मेरा आदिम चरवाहा
वह घर नहीं चारागाह बदलता था
उसके लिए खुद की भूख और
उसके पशुओं की भूख बराबर हुआ करती थी
गीत गाता हुआ वह जंगलों को पार करता
नदियों में अपने पशुओं के साथ नहाता था
नदियों को आस-पास लिए रहता था वह
उसके लिए उसकी प्यास और
उसके पशुओं की प्यास बराबर हुआ करती थी
उसके हाथ में उसके ईश्वर की लाठी थी
जिससे वह अंत तक अपने पशुओं की रक्षा करता था
उसके लिए उसकी जान और
उसके पशुओं की जान एक ही थी
एक अच्छा चरवाहा अपने पशुओं के लिए
अपनी जान भी दे सकता
3. कालहीन
इतनी सुबह नहीं उठना चाहता कि कोई सुप्रभात जगाए मुझे
इतनी देर नहीं सोना चाहता कि शुभरात्रि ही सुला सके कोई
अब चौबीस घंटे को समय नहीं दूँगा ज़रा भी
महीने, छमाही और साल को एक दिन में बदल देना चाहता
और इस तरह मैं तुमसे अपना सारा वक़्त चुरा लूँगा
तुम्हारी घड़ी में मेरा कोई समय नहीं बजेगा
तुम्हारी कॉल हिस्ट्री नहीं गिनेगी कोई घंटे
तुम्हारे लिए अधिक खाली छोड़ जाऊँगा इक्कीसवीं सदी
तभी मेरे भ्रम ने मुझसे कहा
अब दुनिया के सभी नंबर तुम्हारे ही हैं
किसी भी नंबर से आ सकता है मुझे तुम्हारा फोन
4. अर्थ
रात का मतलब केवल अँधेरा नहीं
दिन का मतलब नहीं है केवल उजाला
बरसात का मतलब केवल नमी नहीं
और पतझड़ का मतलब नहीं केवल उजाड़ भर
जैसे तुम्हारा अर्थ कब केवल
तुम्हारा अर्थ ही रहा, मेरा अर्थ नहीं रहा।
केवल दरवाजे ही कहाँ
खिड़की और रोशनदान भी हैं
अभिव्यक्ति के कक्ष में
हाँ वही, मेरी परम अभिव्यक्ति
खोई हुई; कुछ अर्थ कुछ अभिप्राय
और कुछ अनेकार्थ और संभावित
जिस तरह बरसात की रात पंछी
छिपा लेते अपने परों में अंडे
जैसे पत्ते छिपा लेते कोई हरित कीट
जैसे रेत छिपा लेती शीशा
वैसे ही मैं छिपा लेता हूँ तुम्हारी बात,
तुम्हारा नाम छिपा लेता हूँ भीतर
उस तरह नहीं
जिस तरह कोई कवि छिपाता है अपने पाप
बल्कि उस तरह
जैसे कविता छिपा लेती है कोई न कोई एक अर्थ
5. परिपक़्वता
हिंसा के नवीनतम दृश्यों की आदी हो चुकी आँखें
कुछ भी देख सकती हैं अब; अपेक्षाकृत और क्रूर
अद्यतित संस्करण में बहरे हो चुके कान
अभ्यस्त हैं हर चींख अनसुनी करने के लिए
कितना भी ताज़ा पाप हो, कितनी भी तड़पी हो लाश
आत्मा पर हर सड़ी दुर्गंध बर्दाश्त कर सकती है ये नाक आज
कोई भी झूठ निगलने पर नहीं पड़ते छाले
चीभ से ढकेल सकते हैं हम डकार भर की आह भी
कोई भी स्पर्श महसूस नहीं होता है अब
न प्यार का न घृणा का
ओह! मेरी इंद्रियाँ
कितनी परिपक्व हो चुकी हो तुम
6. दुख की चिट्ठी
सबसे अमौखिक दुख
सबसे अकेले भोगना पड़ता है
हर दुख आत्महत्या से पहले
चिट्ठी नहीं लिख पाता
कहने से दुख नहीं मिटता
केवल उसके शब्दकोश के शब्द कम हो जाते हैं
7. ईश्वर संरक्षण का गीत
दुनिया भर में
ईश्वर की सभी परिभाषाएँ
एक दूसरे को काटती हैं,
हम उसे जितना अधिक
करेंगे परिभाषित
वह होता जाएगा उतना ही समाप्त
8. पुकार
इतनी जोर से मत बोलो
कि बहुत सारी आवाज़ें दब जाएँ
बल्कि इतनी जोर से सुनो
कि बहुत सारी चुप्पियाँ बोल उठें
9. मृत्यु का संगीत
ऐसा कुछ होगा जिससे एक साथ सभी स्पर्श छूट जाएंगे मुझसे
ऐसा कि मैं शायद रोकना चाहूँगा फिल्म का कोई सीन
देखने के लिए आँखें मूँदूँगा पर वे खुली रह जाएँगी
जीवन के पियानो पर कुछ और संगीत छेड़ना चाहूँगा
पर मुझे शायद वह फिर कभी मौका नहीं देगी।
हृदय की धड़कन के लय पर अतीत के गीत बजने लगेंगे
साँसों की गति की उच्च-मंद्र स्वर पर हवा रुक जाएगी
दुनिया भर के मोह आकर आत्मा से लिपट जाएँगे
घड़ी की सुइयाँ बहुत तेज भागने लगेंगी
तुम न जाने कहाँ होगी उस वक़्त !
वह फल पक कर चू जाएगा अब
उस कमल की आखिरी पंखुड़ी भी अब अलग हो जाएगी
वह कगार भी टूट कर बह जाएगा
कभी सूर्योदय न होने वाली रात हो जाएगी
पूरा दम लग जाएगा
असीम सन्नाटे में बजेगी वह धुन –
दिमाग की सभी नसें खर्च होंगी उसको पकड़ने में
तभी बहुत दूर से बहुत मद्धिम बजता मृत्यु का संगीत
सुनाई दे जाएगा जिंदगी के सबसे ईमानदार श्रोता को !
10. असमर्थता
क्या विडंबना है
उसका दुख नहीं बचा
अकेलापन बचा
सारी टीस मानों
उसे शब्द देने तक की है
सब अंतस छान मारने के बाद भी
नहीं हाथ आ रही वह
ऐसी कौनसी जगह है मन की
कि जिसको थोड़ी देर थाम लूँ तो
थोड़ा सम्भल जाए जीवन
ऐसी कौन सी अमरबेल है भीतर
जिसको झकझोर दूँ
तो तनिक झर जाएँ स्मृतियाँ
ऐसा कौन सा संग्रह होगा
पुरखा-कवि का
जिसमें मिलेगी
इस अनुभूति की भाषा
जरूर भाषा से बड़ी होगी अनुभूति
जो दुनिया भर के
स्वर-व्यंजन मिला देने के बाद भी
कितना कुछ रह जाता अकथ
–केतन यादव

परिचय
केतन यादव, गोरखपुर।
वर्तमान में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शोध छात्र।
प्रकाशन : आलोचना, समालोचन, तद्भव, पक्षधर, वागर्थ, कृति बहुमत, साखी, समकालीन जनमत, समावर्तन, वनमाली कथा, समय के साखी, जनसंदेश टाइम्स हिंदुस्तान, अमर उजाला आदि पत्र-पत्रिकाओं एवं वेब माध्यमों पर कविताएँ प्रकाशित।
पहला कविता संग्रह ‘एक चरवाहे का गीत’ (2026) राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित।
ईमेल– yadavketan970@gmail.com