शब्द बिरादरी

गार्गी मिश्रा की छः कविताएँ

1.

धूप बिना दस्तक दिए आती है
उसे मेरा नाम कभी याद नहीं रहा
फिर भी वह मुझे पुकारती है
धीरे धीरे
फ़र्श पर फैलते हुए

उसके पास एक ऐसी भाषा है
जिसकी कोई वर्णमाला नहीं
वहाँ केवल ताप है
और धूल के पास
ठहर जाने का धैर्य।

2.

मेरी खिड़की धूप की बातें सुनती है
खिड़की हमेशा मुझसे बेहतर सुनती आई है
वे दोनों पुराने साथी हैं

काँच को याद है वह समय जब सूरज ज़्यादा ऊँची आवाज़ में बोलता था
जब वह बिना झिझक इस अँधेरी दुनिया में अपना चेहरा झोंक देता था
पहले की अपेक्षा अब वे धीमे बात करते हैं
दहलीज़ पर एक हल्की-सी थरथराहट
दीवार पर टिकी एक फ़ीकी हथेली,
जैसे कोई सवाल जो पूरा होना नहीं चाहता।

3.

धूप उन जगहों की कहानियाँ सुनाती है
जहाँ वह कभी गई ही नहीं
वह कहती है, “उम्मीद कोई मंज़िल नहीं
वह एक प्रतिवर्त है”
रोशनी की ओर एक अनायास झुकाव
एक भूल, जो बार-बार होती है

खिड़की इस बात पर हल्के से मुस्कुराती है
वह जानती है कि स्थिर रहकर सब कुछ
अपने भीतर से गुज़रने देना क्या होता है

वह पारदर्शी होने का साहस जानती है
वह जानती है कैसे रोशनी को
इतने छोटे टुकड़ों में तोड़ दिया जाए
कि वह दया जैसी लगने लगे।

4.

कभी-कभी धूप तिरछी होकर भीतर आती है
अपने साथ लगभग याद की जा सकने वाली
किसी चीज़ की गंध लिए
किसी और जीवन में खुलता हुआ एक दरवाज़ा
किसी का रुक जाने का चुनाव
वह बिस्तर को छूती है
किताबों को छूती है
उन खाली जगहों को छूती है
जहाँ कल बहुत देर तक कोई बैठा रहा
वह वादा नहीं करती
वह बस थोड़ी देर के लिए वहाँ ठहर जाती है
कंधे पर रखे एक अनजान हाथ की तरह।

5.

मैं जानती हूँ कि खिड़की
सब कुछ समेट कर रखती है
उसके बिना
धूप बिखर जाती
अफ़वाह बन जाती

लेकिन मैं यह भी जान चुकी हूँ
कि धूप के बिना
खिड़की भूल जाती
कि वह हर सुबह आँखें क्यों खोलती है

वे दोनों मिलकर
चुपचाप किसी दुख के ख़िलाफ़
साज़िश रचते हैं
वे चिल्लाते नहीं
वे समझाते नहीं

वे बस पास आते हैं
और कहते हैं
“यहाँ”।

6.

आशा ऐसे ही प्रवेश करती है
बिन बुलाए, बिना नाम के,
पर इतनी गुनगुनी
कि उस पर विश्वास किया जा सके

जैसे धूप।

–गार्गी मिश्रा


परिचय

गार्गी मिश्रा

जन्म: 1988, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
हिंदी साहित्य से जुड़ी देश की प्रमुख पत्रिकाओं और वेब पत्रिकाओं में कविताओं, गद्य, व अनुवाद का निरंतर प्रकाशन।
संपर्क : gargigautam07@gmail.com

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