शब्द बिरादरी

डॉ. मनोज कुमार की तीन कवितायेँ

1. एक्सप्रेस – वे और पगडंडियाँ

    आठ लेन की बेहद चौड़ी सड़क.

    फर्राटेदार गुजरती गाड़ियां

    साफ़ सुथरी सलीकदार.

    किनारे के पेड़ बेहद सहमे सिकुड़े से

     तेज़ रफ़्तार वाहनों से हवा के धक्के खाते.

     बेहद मजबूत सतह को पार नहीं कर सकती चींटियाँ.

     न गाय बकरियां भेड़ों का झुण्ड,

     वे तो यहाँ आ भी नहीं सकते

     न बैलों को हांकता कोई आदमी..

     ये एक्सप्रेस वे है-

     विकास का एकदम नया चेहरा.

     राजमार्ग और राजपथ इनके आगे निस्तेज

     इन पर दशकों चलने वाले ट्रक  बसों के योगदान

    धुंधला दिए गये , गायब कर दिए गये.

    कभी कभार

    एकाध पगडंडी आ जाती है किनारे  

     कुछ बिखरी माटी

    कुछ बारिश के बनाए  गड्ढे

     इधर उधर उगे दूब.

     वहाँ रस दिखती है

     दिखती है ओस.

     एकाध भैंसागाड़ी दिख रही

     कुछ देहाती से लोग.

     मैं कहाँ हूँ?

     मैं एक्सप्रेस वे के किसी लेन में  

     घिसट रही बस में हूँ , पर मैं

     पगडंडी की माटी पर हूँ

     नरमी को महसूस करता. 

    2. अमृतसर आते आते …

    हरियाई चुंदरी  ताने  खेत –खलिहान,

     नाचते से गुजर जाते

     सफेद वृक्षों की तरतीबवार कतार.

    अमृतसर करीब आ रहा है …

    शेखपुरा, नौशेरा, बटाला, धारीवाल, तलवंडी.

    .. कुछ सुने सुने से लगते ये नाम

     जाने पहचाने से.

     एकाएक कई किताबों के पन्ने सामने आ जाते हैं

     पृष्ठों के परिच्छेद

     शब्दों की दृश्यावली.

     स्मृतियों में भयावहता  उभरती है

     बादलों के घेरे में पहाड़ की तरह.

     शाहनी ट्रक  पर  सवार है                                                                                                     

     शेरा गंडासे को छुपाता हुआ…

     सिरों पर गट्ठर लाद इधर –उधर  छुपते छुपाते लोगों का हुजूम..

     रंगमंच के तनाव भरे दृश्य की बदहवाश भाग दौड़.

    तलवारें  हवा में लहराती चमकती ..

     सफ़ेद दाढ़ी में  लाल लहू की बूंदे ..

    थाह ले ले चलने वाले

    एकदम से भागते हैं तेज क़दमों से.

    किसी लड़की की बदहवाश चीखें

    कुचले जिस्म पर कोई वस्त्र नहीं

    रेल अमृतसर की ओर भाग रही है

     भीष्म साहनी रेल का पीछा  करते हुए..

     मंटों के माथे पर खून से लिथरी मिट्टी..

    टोबा टेक सिंह ठीक उनके सामने

     ‘ओपड़ी गुड़ गुड़िया दी’ बुदबुदा रहा है ,

     नहीं मालूम उसका वतन कौन सा ..

    न मंटो को मालूम.

    ….

    भव्य दुधिया रोशनी में अंगड़ाई लेता नेशनल हाईवे.

     गाड़ियों तेज गति से भागती हुई.

     मैं नींद के उनींदे से बाहर आ

     चाँद को देखता हूँ..  मुस्कुराता चाँद

     अपनी पूर्ण चमक और भव्यता के साथ.

     इस वक़्त चाँद से शीतलता आ रही है

    उन दिनों चाँद से लहू टपकता था.

     लाल रक्त में डूबा चाँद

     भयावह  चांदनी  

     तलवार और कटारों  के  आगे भागते जिस्म.

      महज धार्मिक पहचानें  थी  इंसानी जिस्म की

     और कोई पहचान नहीं!

    कुछ भागते पदचाप

    कुछ भयावह चीखें

    कुछ कराहते जिस्म

     कुछ रोते  पिता

     कुछ ह्रदय वेधी चीत्कार करती माँएं….

     दृश्यों की भागदौड़ में

     एकाएक कृष्णा सोबती  भव्य चेहरे के साथ

     आकार ग्रहण करती हैं

     और मैं ‘जिंदगीनामा’ की पृष्ठों में गुम होता चला जाता हूँ..

      इस तरह  ‘अमृतसर आ गया है’ …

    ……………………………

     3. धूप और गुलमोहर का प्रेम 

    धूप में कितनी आग होती है

    आग में लाली..

    ग्रीष्म के तपिश भरे दिनों में

    नये नये चमकदार पत्तों का हरापन

    धूप की सोहबत में निखर निखर आता है..

     धूप में रह रहे अंगारे

     गुलमोहर को लाल कर देते हैं …

     दुनिया को सबक देते हुए कि

     प्रचंड घाम में ही गुलमोहर खिलता है ..

     ग्रीष्म में खिलखिलाने वाला गुलमोहर बनो.

     शीतलता ही प्रेम की जमीन नहीं है…

     सूखी पथरीली फटी हुई जमीन पर

     एक अंकुर का निकल आना प्रेम है..

    स्निग्धता से सभी प्रेम करते हैं ..

    कर सको तो कठोरता से प्रेम करो

    जैसे सुकरात ने ज़हर से किया था.

    मीरा की तरह पीड़ा में आनंद खोजो …

    आदिम और अटूट प्रेम है

    गुलमोहर की लाली

    और तपाती हुई धूप में ..

    करो अगर प्रेम तो

    धूप और गुलमोहर की तरह करो…

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    परिचय

    डॉ. मनोज कुमार

    असिस्टेंट प्रोफेसर  , हिंदी विभाग , कमला नेहरू कॉलेज  ( दिल्ली विश्वविद्यालय

    भारतीय साहित्य, हिंदी आलोचना, हिंदी सिनेमा में विशेष रूचि

    समालोचन, जानकी पुल ,जनसत्ता, प्रभात खबर , हंस , कथादेश, आलोचना , गगनांचल , परिंदे, विश्वरंग आदि पत्र -पत्रिकाओं में  पुस्तक समीक्षा , फिल्म समीक्षा, लेख एवं कवितायें प्रकाशित.

    ईमेल  : mkumar@knc.du.ac.in

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