शब्द बिरादरी

शंकरानंद की सात कविताएं

१.इतना शोर

सुनना इच्छा पर निर्भर करता है

कोई जरूरी नहीं कि

बोलने की तड़प पत्थर को गला ही दे

अब तो इतनी पुकार है कि

उसका हिसाब नहीं

धूप के कण में जितनी धूल नहीं

उससे अधिक है इस पृथ्वी पर आवाज

एक बच्चे का कलपना कौन सुनता है

स्त्री की सिसकी में घुल गई उसकी भाषा

वह मुहाने पर बैठा बूढा आदमी

न जाने कब से कुछ बोल रहा है

यहाँ ठहरने की फुर्सत किसे है

नदी पानी पेड़ और पहाड़ तो मूक हैं

उनका दर्द कौन पोंछेगा

जब मनुष्य की भीड़ कराह रही है

और जिसे सुनना है

वह आसमान में देख रहा है शून्य

एकटक |

२.जलने का निशान

ठण्ड में जब कांपती है देह

तो याद नहीं रहता कि

आग जलाने की सही जगह कहाँ है

मैं आग पर भरोसा करता हूँ

उसे सुलगा सकता हूँ बारिश के बीच

लकड़ी कोयला पुराने कागज जैसी

असंख्य चीजें आग का पता हैं

वह लौट सकती है हर बार

चूल्हे की आग और भूख का रिश्ता

सदियों पुराना है

लेकिन जमते हुए खून के बारे में सोचते हुए

सारी तरकीबें बेकार हो जाती हैं

बस याद रहता है कि एक तीली चाहिए

बर्फ सी हथेली को गर्म करने के लिए

वैसे लोग भी कम नहीं

जो पूस की रात में भी थरथराते हैं तो

अपनी देह के बारे में नहीं

घर के रंग के लिए बेचैन हो जाते हैं

आग सुलगाने से पहले

वे जलने के निशान के बारे में सोचते हैं  

पत्थर की सुन्दरता को बचाए रखने के लिए|

३.हिसाब के बाद

अनजान जगह में कोई पहचाना नहीं

हर चेहरा नया है

हर मोड़ घुमावदार

मैं एक स्त्री का हाथ थामे चल रहा हूँ

मिट्टी वही है पहले वाली

हवा कुछ अलग है

जिसमे डर की गंध वाली आंधी

रह रह कर मन की अलगनी कंपा देती है

सहसा ढह जाते हैं स्वप्न

मैं देखता हूँ रात का चेहरा

समूचा चन्द्रमा

जो एक सा फैला है मेरी पूरी दुनिया में

पानी की तरह हिलता हुआ मन

धीरे धीरे डर के कंकड़ को

जमा देता है पृथ्वी की सतह पर

मैं हिसाब लगाता हूँ

कि डर के कंकड़ से

मेरी उम्मीद का वजन ज्यादा है |

४.संदिग्ध होना

जो हमेशा के लिए चला जाता है घर छोड़ कर
वह भी बुलाने पर
लौटने की सोचता है एक बार

जड़ें बहुत मुश्किल से मिलती हैं
उसे खोने का मतलब
संदिग्ध हो जाना है
संदिग्ध होना
अपराधी होना है

इतने शक और संदेह से भरी हैं स्मृतियां
कुछ भी नया लगता है तो
मन खटक जाता है

कोई मनुष्य
कोई टिफिन
कोई बेग

कोई खिलौना
कोई कपड़ों से बंधी गठरी

इस दुनिया में संदेह करने के लिए
अकेला होना काफी है

इसीलिए लौटने का रास्ता
मुझे हमेशा पसंद आता है
जहां भी जाता हूं तो सबसे पहले
लौटने के रास्ते की पहचान करता हूं

जड़ें संदिग्ध होने से बचाती हैं!

५.योजनाओं का क्या है

जो योजनाएं हैं
वे कागज और पैसों की भूखी हैं


वे मिट्टी खा जाती हैं
खेत कुतर देती हैं
सोख लेती हैं मनुष्य का खून-पसीना

फिर उसे लापता कर देती हैं  


जहां ऊंची थी जमीन
वहां फिर एक तालाब बन रहा है
अभी सूखा है
बाद में पानी लगेगा

बांध का क्या है
उसे हर साल टूटना है
हर साल बनना है
बारिश में गलना है
पानी में बहना है

इस तरह यह एक फसल है
जिसे हर साल कुछ न कुछ
देकर जाना है।

६.चिट्ठियों के दुश्मन

तुम जो दूसरों की चिट्ठियां पढ़ते हो
तुम कहां समझ पाओगे वह तकलीफ
जो लिखने वाले ने रोशनाई से रच दी है

दूसरों का दर्द नहीं जानने पर
सबकुछ मजा ही देता है
चाहे वह किसी की

आह ही क्यों न हो

तुम एक-एक कर देखते हो
उलटते हो हर एक लिफाफे को
अंदाजा लगाना चाहते हो कि
उसमें आखिर क्या हो सकता है

तुम कभी नहीं महसूस कर पाओगे कि
खुली हुई चिट्ठियां देख कर

कैसा लगता है

जिसने भेजी है

वह उम्मीद में है कि जवाब आएगा
जिसके लिए भेजी गई है
वह भी सोच रही है कि
अभी तक क्यों नहीं मिली चिट्ठी

जबकि चिठ्ठी तो तुम्हारे पास है और
तुम्हें बेचैनी की कोई परिभाषा नहीं मालूम
दो दिन बाद भी पहुंचाने जाओगे तो
हिचक नहीं होगी
नहीं भी पहुंचाओगे तो

कोई मलाल नहीं होगा

किसी ने तुम्हारे नाम नहीं लिखी कोई चिट्ठी
इसीलिए शायद

तुम चिट्ठियों के दुश्मन हो!


७.कोई लालटेन नहीं जलाता
जिन घरों में सांझ ढलते
दरवाजे पर जल जाता था लालटेन
अभी वहां महीनों से अंधेरा है
रात पहले से ज्यादा बढ़ गई है और
लालटेन में जंग लग चुकी है

कोई घर इतना भी उजाड़ हो सकता है कि
वहां चिड़िया तक आंगन में उतरना भूल जाए
यह बहुत करीब से देखा है मैंने

दादा जी दरवाजे पर
दूसरों के लिए रोशनी जला कर रखते
ताकि राहगीरों को ठोकर नहीं लगे

आज जब वे नहीं हैं तो

कोई नहीं पूछता कि
यहां जो बैठते थे सांझ ढलते उनका क्या हुआ
वे दिखाई नहीं देते
यह सिर्फ मेरे लिए उदास होने का कारण है
दूसरों के लिए यह एक मामूली बात है

लोभ लालच और स्वार्थ से भरी दुनिया में
जो अपने हिस्से की रोशनी लुटा देते हैं
उनकी गोद में ठहर जाता है

पहाड़ की तरह जमा हुआ अंधकार

उनके लिए कोई लालटेन नहीं जलाता!

शंकरानंद

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परिचय

शंकरानंद
सम्प्रति – लेखन के साथ अध्यापन

संपर्क-क्रांति भवन,कृष्णा नगर,खगडिया-८५१२०४

मोबाइल-८९८६९३३०४९

Email: shankaranand530@gmail.com

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