प्रेम में कोई अनुबंध नहीं
प्रेम…
ना कोई शर्त,
ना कोई उत्तरदायित्व का दस्तावेज़ —
जैसे चाँदनी उतरती हो
अधखुले जल पर,
निशब्द… निर्विवाद।
प्रेम वह नहीं
जो अनुबंधों में बाँधा जाए,
कि तुम कब बोलोगे,
मैं कब चुप रहूँगी —
या
कब लौटोगे उसी मोड़ पर
जहाँ हमने साथ चलना शुरू किया था।
प्रेम…
बस होता है —
पलकों पर ठहरी वह बूँद
जो गिरने से पहले ही
भाव बन जाती है।
कभी छत की धूप में
तुम्हारे कंधे की छाया बनकर,
कभी पुस्तक के पृष्ठों में
अधपढ़े वाक्य की तरह…
सांस लेता है प्रेम।
कोई अनुबंध नहीं,
फिर भी तुम हर रोज़ लौटते हो
मन की उस गली में
जहाँ मैंने तुम्हारा नाम नहीं लिया —
पर हर दीवार पर
वो गूंजता रहा।
प्रेम…
जैसे वायु —
दिखता नहीं,
पर हृदय की हर धड़कन में
उसकी उपस्थिति अनिवार्य है।
कचनार सी अनकही
कचनार के फूलों-सी तुम —
न सजी हुई,
न संवरी हुई —
फिर भी पूर्ण,
जैसे ऋतु ने खुद तुम्हें चुना हो
खिलने के लिए।
तुम्हारी मुस्कान में
वही रंग है
जो कचनार की पंखुड़ियों पर
सुबह की धूप उतरते ही
चमक उठता है —
कोमल, मौन,
और अकल्पनीय।
तुम आयीं,
तो शाखों पर आ गई वसंत की छाया,
सूने रास्तों ने
बुलबुल के गीत सुनने शुरू कर दिए,
और
मन की सूखी टहनी पर
प्रेम की कोंपल फूट पड़ी।
कचनार के फूलों-सी तुम —
हर दृष्टि में अलग,
हर स्पर्श में अनकही,
और हर याद में…
कुछ अधूरी-सी, फिर भी पूरी।
मैं जब भी थक जाता हूँ
खोजता हूँ तुम्हें —
किसी पेड़ के नीचे झुकी हुई सी,
एक शांत हँसी में सजी,
एक फूल की तरह
जो कहता कुछ नहीं,
बस…
महसूस होता है।
साकुरा के वृक्षों पर
झरते हैं शुभ्र रेशमी फूल,
जैसे किसी ने आकाश से
बर्फ़ की महीन परतें
धीरे-धीरे धरती पर उकेरी हों।
जापान की हवा
इन पंखुड़ियों को
गुप्त चिट्ठियों की तरह उड़ाती है,
हर पंखुड़ी में छिपा होता है
क्षणभंगुरता का संदेश—
सुंदरता टिकती नहीं,
पर उसकी स्मृति
हृदय की तहों में जम जाती है।
और तभी याद आते हैं भारत के फूल।
गर्मियों की तपती दोपहर में
अमलतास की सुनहरी झड़ी,
मानो धूप ने
धरती को ओढ़ा दी हो अपनी चमक।
बरगद के नीचे बैठा राहगीर
उस पीले उजाले में
पल भर के लिए भूल जाता है
अपना बोझ।
बरसात में खिलता कमल,
कीचड़ से जन्म लेकर भी
निर्मलता का दर्पण बना रहता है,
मानो कह रहा हो—
सुंदरता का अर्थ है
अंधकार में भी उजास ढूँढना।
शरद की भोर में
श्वेत कुमुदिनी का खिलना
और गाँव के आँगन में
गंधराज की सुगंध—
ये सब साकुरा की तरह ही
क्षणिक और गहन हैं।
संबंध गहरा है
साकुरा हमें याद दिलाता है
कि जीवन अस्थायी है,
और अमलतास, कमल, गंधराज
हमें सिखाते हैं
कि अस्थायी भी
अनंत का ही एक रूप है।
जापान की गलियों में
जब लोग रुककर
झरते फूल देखते हैं,
तो लगता है
मानो वे किसी आरती के दीपक हों,
जो पल भर में बुझ जाते हैं
पर उनके धुएँ में
प्रार्थनाओं का गीत तैरता रहता है।
भारत में भी
त्योहारों पर
गेंदा और गुलाब
जब मंदिरों की देहरी पर चढ़ाए जाते हैं,
तो वे भी
कुछ वैसा ही संदेश देते हैं—
“हम टिकने नहीं आए,
हम बस तुम्हें याद दिलाने आए हैं
कि सुंदरता बाँटने में है,
न कि पकड़कर रखने में।”
साकुरा और अमलतास,
कुमुदिनी और गंधराज—
सब मिलकर कहते हैं:
जीवन एक उत्सव है
क्षणभंगुरता के भीतर,
जहाँ हर फूल
अपने झरने से
जीवन की लंबाई नहीं,
उसकी गहराई बताता है।
-हरीश अरोड़ा

समकालीन हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठित वरिष्ठ कवि, साहित्यकार और आलोचक हरीश अरोड़ा दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कॉलेज (सांध्य) के हिन्दी विभग में प्रोफेसर के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। पूर्व में वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के दूरशिक्षा निदेशालय में प्रोफेसर तथा निदेशालय के निदेशालय के रूप में भी सेवाएं दे चुके हैं।
Email-prof.harish.arora@gmail.com