शब्द बिरादरी

शैलेश कुमार की 4 कवितायेँ

    1. छठ के बहाने ही सही वापस लौटता हूँ

    छठ के बहाने ही सही
    वापस लौटता हूँ
    अपनी पुरानी चौखट पर

    चौखट
    दरवाजे में नहीं लगी होती
    दरवाजा
    चौखट में लगा होता है
    और
    कभी कभी
    दरवाजे के बिना भी लगी होती है
    चौखट
    चौखट का चौथा सिरा
    जिससे लगती थी ठोकर
    अब नहीं लगता
    शहर की चौखटों में
    इसलिए
    निकलना आसान होता है
    घर से परदेश
    बिना किसी मोह माया के

    चौखट
    मजबूत होती है
    घर की दीवारों से भी
    इतनी कि
    बैठ जाती है
    मन में ही
    इसलिए
    एक बार लांघ दी
    चौखट
    तो
    खुल जाता है दरवाजा
    सदा के लिए
    और फिर
    निकल जाते हैं
    आप
    अपनी दुनिया नई बनाने

    और फिर
    चौखट में रह जाती है
    बस स्मृतियाँ
    थोड़े गली मुहल्ले
    थोड़ी दर दुकानें
    थोड़े बचे लोग
    जो अब भी वैसे ही हैं
    पता नहीं कैसे

    2. कविताओं को बचाकर रखा है मैंने

    कविताओं को
    बचाकर रखा है मैंने
    याद रखने के लिए
    नाम
    पते
    चेहरे
    लम्हे
    और वह सब कुछ
    जिसे प्रेम करता हूँ मैं
    पर
    भूल जाता हूँ गाहे बगाहे

    कविताओं को
    बचाकार रखा है मैंने
    भूलने के लिए भी
    वह सब कुछ
    जो ढोता रहता हूँ
    लदनी के बैल की तरह
    जाने अनजाने

    कविताओं को
    बचाकर रखा है मैंने
    ताकि
    देर सवेर ही सही
    याद रहे कि
    जीवन
    होने के लिए बना है
    ढोने के लिए नहीं

    कविताओं को
    बचाकर रखा है मैंने
    ताकि
    बिना जरूरत भी
    खोज सकूं
    नाम पते ठिकाने
    चेहरे मोहरे
    और वह सब कुछ
    जिसे प्रेम करता हूँ

    कविताओं को
    बचाकर रखा है मैंने
    ताकि
    बचाकर रख सकूं
    सुबह की नमी
    दोपहर की धूप से बचाकर
    शाम ढले तक

    कविताओं को
    बचाकर रखा है मैंने
    ताकि
    देर सवेर
    रात बिरात
    भूल न जाऊँ रास्ता
    अपने ही घर का
    और
    लौट सकूँ
    सही सलामत
    अपनी ही यादों से

    3. इस विकट समय में

    कल एक नया
    आदमी जुड़ा
    मेरी मोबाइल से

    इस विकट समय में
    आदमी
    आदमी से नहीं जुड़ता
    मोबाइल से ही जुड़ता है
    या
    कि
    मोबाइल में ही जुड़ता है
    और
    वहीं से
    डिलीट भी हो जाता है
    किसी एक दिन
    बिना मिले ही

    मोबाइल ही याद रखता है
    जन्म दिन
    शादी की सालगिरह
    यहाँ तक की पुण्य तिथि भी

    आदमी को फुरसत कहाँ
    मोबाइल से
    कि
    याद रख सके
    नए नए चेहरे
    सो
    मोबाइल ने यह भी ले लिया है
    अपने जिम्मे
    और
    वही पहचानना है
    आदमी को
    चेहरे की रेखाओं से
    और तुर्रा यह कि
    मशीन के इस जोड़ घटाव में ही
    फूल कर कुप्पा हुआ जाता है
    आदमी

    जितनी लंबी होती जाती है
    मोबाइल की संपर्क सूची
    उतनी ही
    फैलती जाती है
    उसके सीने की माप

    और
    जितना फैलता जाता है
    आदमी
    उतनी ही सिकुरती जाती है
    उसकी चादर

    सिकुरते सिमटते
    कुछ भी
    याद नहीं रहता उसे
    अपना जन्मदिन तक नहीं

    और इस जोड़ घटाव के बीच
    एक दिन
    ऐसा भी आता है
    कि
    टें बोल जाता है मोबाइल
    और
    अचानक
    गुम हो जाते हैं
    चेहरे
    सारे के सारे
    जगहें
    सारी की सारी

    क्योंकि
    मोबाइल में ही
    कैद है
    लोकेशन
    अपने घर की भी
    घर खोजने
    अपना ही
    मोबाइल की दुकान पर ही
    वापस
    जाता है आदमी

    4. कभी कभार

    कभी कभार
    सोचता हूँ कि
    कौन पढ़ता होगा
    इस छपासग्रस्त समय में किसी को
    कौन होगा
    जिसे अच्छा लगता होगा
    कुछ भी
    अपने लिखे के सिवा
    कौन होगा
    जो खोजता होगा
    शब्दों के बीच का मौन
    अब जबकि
    मिट गया है अंतर
    अक्षर और शब्द का
    किसे सुनाई देती होगी
    ध्वनि या लय
    अब जबकि
    आपकी अपनी पहचान
    भारी है
    आपकी कविता से
    कौन देखता होगा कि
    कविता कैसी है
    या
    है भी कि नहीं
    आप बस लिखते जाइए
    सुबह दोपहर शाम
    नास्ते के पहले
    खाने के बाद
    छपवाते जाइए दनादन
    इधर उधर जिधर तिधर
    बाँटते जाइए कविता संग्रह
    खिंचवाते जाइए फोटो
    नामी गिरामी लोगों के साथ
    लूटते जाइए महफिलें
    अपनी ही पैसे से जमाई हुई
    लेते जाइए पुरस्कार
    ऐसे वैसे जैसे तैसे कैसे भी
    कविता कितनी भी रद्दी हो
    (वैसे भी अच्छी हो तो भी पढ़ेगा कौन )
    बायोडाटा जरूरी है
    राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय स्तर का
    सच पूछिए तो
    हर एक लिखे के बाद
    खुद से करता हूँ यह सवाल
    कविता को पढ़ता कौन है
    इस छपासग्रस्त आत्ममुग्ध समय में

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    परिचय

    शैलेश कुमार

    पटना, बिहार

    1997 में सिविल सेवा में भारतीय राजस्व सेवा में चयन के उपरांत गुजरात महाराष्ट्र एवं दिल्ली में अपनी सेवाएँ दी । उत्कृष्ट सेवा हेतु वर्ष 2015 में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित । वर्ष 2020 में भारत सरकार द्वारा संयुक्त सचिव के पद पर चयन ।
    साहित्यक सांस्कृतिक अभिरुचि बन रही । नामवर के नोट्स और आलोचना अनुक्रमणिका दो किताबें राजकमत स प्रकाशित और चर्चित । सम्प्रति प्रधान आयुक्त के पद पर दिल्ली सीमा शुल्क में कार्यरत ।

    Email: irsshailesh@shailesh-kumar

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