कविता

विवेक उपाध्याय की कविताए भाग – 1

अहंकार

मनुष्य का जीवन तब पलता है
धर्म और अधर्म के मार्ग पर चलता है
जब भी हो भयभीत तो उस ईश्वर को याद करता है
परन्तु अहंकार वस कभी ईश्वर को बाधने चलता है
कृष्ण सभा में देते चुनौती
अहंकारी उसे स्वीकार करता है
अंत की परवाह किये बिना
फिर स्वयं नरको का भोग करता है
इसीलिए विपदा जब आती है
विवेक,बुद्धि को हर जाती है
और जिस सभा में अनेक वीर हो
वहां अहंकार छुपता कहां
दुर्योधन सभा में उपहास करता
करता उसका जो जग हरता
मुख खोले तो ग्रह दिखते
तीन पग में अंबर हिलते
हिलते-डुलते देखे सभा ने
दिन में तारे देखे सभा ने
पर अहंकारी समझ ना पाया
बुद्धि का प्रयोग कर ना पाया
जग के पालनहार को समझ ना पाया
खुद का विनाश टाल ना पाया
देकर चुनौती स्वयं कृष्ण चले
तोड़ कर जंजीरों को रण में रण करने स्वयं पालनहार चले
मित्रों,साथियों को समझाते
अंत निकट आया है इसका
मयत्री के संबंधों में
आज दाग लगाया है
अब कुरुक्षेत्र के मैदाने में फिर से रण होगा
लहू से भूमि फिर रक्त संचित होगा
आज कृष्ण स्वयं उपदेश देंगे
धर्म रक्षा हेतु भ्राता से भ्राता प्राण लेंगे
छल कपट से कोई जीत ना पायेगा
वीर रण की भूमि से तिलक कर जाएगा
और चोसर के खेल में आज प्रपंच जित ना पाएगा
अहंकार आज स्वयं तिल तिल मर मिट जाएगा
दुर्योधन उस दिन मरा जिस दिन द्रोपदी के साथ अन्याय हुआ
पर कर्मों का खेल ऐसा होता है पाप का फल तुरंत नहीं मिलता है
आज देखना कुरुक्षेत्र के मैदानो में कैसा रण होगा
युगो युगो तक ऐसी कल्पना से मन भयभीत होगा
भाई भाई पर टूट पड़े
अपने कर्मों का फल देखने खूब चले
चलो अब अहंकार की बातों से नाता तोड़ते हैं
इतिहास से कुछ नया सीख चलते हैं
और अपनी उन पगडंडियों पर
एक नया समर भविष्य लिखते हैं
इसमें छल, कपट,अहंकार,द्वेष ना हो
अपनों के प्रति विचार अनहित ना हो
फिर देखना स्वयं जगत के मालिक
हृदय में बैठेंगे
मन, बुद्धि और कल्पनाओं से विचार प्रफुलित होगे।।

                     विवेक उपाध्याय 

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