सुबह की चाय और ठंडी ब्रेड के साथ, वह आईने में अपना अक्स नहीं, ‘किरदार’ ढूंढता है। एक सीलन भरे कमरे में, जहाँ धूप भी किराया माँगकर आती है, वहाँ वह शेक्सपियर और मंटो के संवाद रटता है।
उस छोटे से घर में, उसके ख़्वाब साँस लेते हैं, दीवारों से गिरती पपड़ियाँ, उसकी असफलताओं का हिसाब रखती हैं। फर्श पर बिखरी स्क्रिप्ट के पन्ने उसकी असली जागीर हैं, जिन पर चाय के दाग़ नहीं, उसके पसीने के हस्ताक्षर हैं।
वह हर सुबह खुद को ‘मैं’ से अलग करता है, और एक अजनबी शख्सियत को अपनी रूह में पनाह देता है। झोले में कुछ पुरानी तस्वीरें और नई उम्मीदें लिए, वह शहर की बेपरवाह भीड़ में कहीं गुम हो जाता है।
मेट्रो की धक्कम-पेल में, वह अजनबी चेहरे पढ़ता है, हर सहयात्री की आँखों में, एक नई कहानी गढ़ता है। वह एक मासूम चोर है, जो बटुए नहीं, जज़्बात चुराता है, ताकि कैमरे के सामने, वह असली दर्द दिखा सके।
लोग दफ्तर जाते हैं फाइलों का बोझ उठाकर, वह अपनी रूह को हथेली पर रखकर ऑडिशन देने जाता है। रास्ते भर वह बुदबुदाता है, जैसे कोई पवित्र मंत्र पढ़ रहा हो, दुनिया उसे पागल समझती है, पर वह रिहर्सल कर रहा है।
उस दो मिनट के मौके के लिए, जो शायद तकदीर बदल दे, वह जलती दोपहर में भी छाँव का सुकून भूल जाता है। कतार में खड़ा है वह, नंबर ‘एक सौ तीन’ बनकर, कास्टिंग डायरेक्टर उसे सर से पाँव तक एक वस्तु की तरह तौलता है।
वह कमरा, जहाँ एसी की ठंडक भी पसीना नहीं सुखा पाती, वहाँ हर शख्स एक ही उम्मीद लिए खड़ा है, पर नज़रें चुराता है। “थोड़ा और इमोशन लाओ,” अचानक एक आवाज़ आती है, और वह अपना कलेजा निकालकर रख देता है, एक अनजानी मेज़ पर।
“प्रोफाइल छोड़ दीजिये, हम बताएंगे…” यह वह झूठ है, जिसे वह हर रोज़ सच मानकर सुनता है। यह वाक्य एक हथौड़े की तरह कानों के पर्दों पर बजता है, फिर भी वह मुस्कुराकर कहता है— “थैंक यू सर।”
सीढ़ियां उतरते वक़्त, उसके कंधे ज़रा और झुक जाते हैं, मोबाइल की खाली स्क्रीन उसे वक़्त की बेरहम रफ़्तार दिखाती है। मगर वह फिर खड़ा होता है, अगली कतार में लगने के लिए, क्योंकि उसका जुनून, उसकी थकान से कहीं बड़ा है।
समाज पूछता है— “बेटा, असली काम क्या करते हो? यह नाटक-वाटक तो ठीक है, पर घर कैसे चलाते हो?” पड़ोसी की नज़रों में वह महज़ एक आवारा मुसाफिर है, जो दिन भर भटकता है और देर रात घर लौटता है।
वह खामोश रहता है, क्योंकि सफलता की भाषा सब समझते हैं, मगर संघर्ष की लिपि, इन सुरक्षित दीवारों में कोई नहीं पढ़ पाता। उन्हें कैसे समझाए कि मंच पर जब सुनहरी रोशनी गिरती है, तो पेट की भूख और जेब की खालीपन, दोनों ही छुप जाते हैं।
वह विंग्स के अंधेरे में खड़ा होकर ‘स्पॉटलाइट’ का इंतज़ार करता है, जैसे तपता रेगिस्तान, सावन की पहली बूंद का इंतज़ार करे। जब पर्दा उठता है, तो वह फटे जूतों वाला लड़का नहीं रहता, वह एक शहंशाह बन जाता है, जिसकी सल्तनत उन ढाई घंटों की है।
वह दिन भर में दस बार मरता है और दस बार जीता है, कभी राजा, कभी भिखारी, कभी सिपाही बन जाता है। हंसने का दृश्य करते-करते, अंदर से वह कभी रो पड़ता है, और रोते-रोते, वह अपनी असली हँसी का पता भूल जाता है।
यह कैसा नशा है, जहाँ खुद को खोकर ही सब कुछ मिलता है? महज़ चंद तालियों के शोर के लिए, वह पूरी ज़िन्दगी का जुआ लगाता है। वे तालियां, जो कुछ पलों के लिए थियेटर में गूँजती हैं, उसे लगता है कि पूरी कायनात उसके लिए ही गा रही है।
उस पल, वह भूल जाता है कि अगले महीने का किराया बाकी है, उस पल, उसे लगता है कि उसका जन्म सिर्फ़ इसी के लिए हुआ था। फिर फोन की घंटी बजती है, घर से माँ का नंबर चमकता है, वह अपनी आवाज़ को सँभालता है, चेहरे पर झूठी मुस्कान लाता है।
“हाँ माँ, बहुत बड़ा रोल मिलने वाला है, खाना खा लिया मैंने,” जबकि ज़ुबान पर झूठ का स्वाद और पेट में भूख की आग होती है। वह नहीं बता सकता कि यह शहर उसे निगलने को तैयार खड़ा है, वह नहीं बता सकता कि उसके हौसलों और हालातों में कैसी जंग छिड़ी है।
रात को जब मेकअप उतरता है और चेहरे से रंग हटता है, तो आईने में फिर वही थका हुआ इंसान मिलता है। आंखों के नीचे के काले घेरे, अब चीख-चीख कर गवाही देते हैं, चेहरे की झुर्रियां, जो रोशनी में दबी थीं, अब उभर आती हैं।
वह अपनी ही आँखों की गहराई में झाँकता है और पूछता है— “क्या यह पागलपन, यह जुनून… वाकई सब ठीक है?” आईना कोई जवाब नहीं देता, उसकी परछाई खामोश रहती है। कमरे की बत्ती बुझाकर वह पुराने गद्दे पर लेटता है, और छत के पंखे की घरघराहट में, वह दर्शकों का शोर ढूंढता है।
डर लगता है कि कहीं वह भीड़ में महज़ एक ‘स्ट्रगलर’ न रह जाए, मगर फिर वह उम्मीद की स्याही से, अपना नया मुकद्दर लिखता है। जो दुनिया के लिए सिर्फ़ एक ‘नौटंकी’ या तमाशा है, वही है जो इस झूठी दुनिया में सबसे बड़ा ‘सच’ बोलता है।
किरदार बदलते रहेंगे, कहानियाँ बदलती रहेंगी, मगर जब तक सीने में वह आग है, यह खेल चलता रहेगा। किराया तो हर महीने देना पड़ेगा— मकान का भी, और वजूद का भी, मगर वह अपने भीतर के ‘किरदार’ को कभी मरने नहीं देगा।
क्योंकि अंत में, कोई शो हिट हो या फ्लॉप, सिर्फ़ उसका अभिनय ही है, जो इस अनंत अंधेरे में चमकेगा। यह उसका अंतहीन ऑडिशन है… और वह हार मानने को तैयार नहीं।
-साक्षी झा
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परिचय
साक्षी झा पिछले 8 वर्षों से रंगमंच (Theatre) की दुनिया को जी रही हैं । दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कॉलेज से हिंदी ऑनर्स और पत्रकारिता की शिक्षा ग्रहण की । यही कारण है कि इनके काम में मोहन राकेश, धर्मवीर भारती और हबीब तनवीर जैसे महान नाटककारों के दर्शन की झलक मिलती है।
पेशेवर सफर में भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के साथ प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर के रूप में कार्य करना रहा है ।
वर्तमान में, मैं जी.डी. गोयनका पब्लिक स्कूल में नाट्य शिक्षक (Theatre Teacher) के पद पर कार्यरत हैं और साथ ही एक पेशेवर वॉयस आर्टिस्ट के रूप में अपनी आवाज़ को नया विस्तार दे रही हैं ।
Email-sakshi.jha.knc@gmail.com


