अगली सुबह उसने सोचा था कि सब कुछ भूलकर आगे बढ़ूँगा. अब तक जितने भी इरादे उसने खुद से किए थे, सब निभाए थे. उम्मीद थी कि अगली सुबह एक नई सुबह होगी. गमले में लगे गुलहड़ के पेड़ पर एक नया फूल उगेगा. मैं उसे खूब ध्यान से निहारूँगा. उसमें खो जाऊँगा, पिछला सब कुछ भूलकर. उठा तो सुबह के दस बज रहे थे. श्याम ने उठना चाहा, लेकिन आँखें थीं कि बंद हो जा रही थीं. किसी तरह आधे घंटे बाद उठा तो देखा कि फूल खिलने वाला है—हो सकता है कि शाम तक उसकी कली खिलकर फूल बन जाए. श्याम उठा और तब सचमुच यह एक नई सुबह थी, जैसा उसने सोचा था.
श्याम उठकर नाश्ते के लिए पोहा बना रहा था. बगल में रखे मोबाइल से कोई सूफ़ी गीत “उसे होश नहीं” बज रहा था. तभी मोबाइल में कंपन शुरू हुआ, तो पता चल गया कि कोई कॉल कर रहा है. उसने पिछली बातें भूलकर—जब श्याम किसी का कॉल नहीं उठाता था—उसे भूलकर एक नई सुबह में पहली ही कॉल उठाई. उधर से कोई शुभचिंतक थे, जो उसे लेकर बहुत चिंतित थे. उन्होंने कॉल उठाते ही कहा, “आप सभी को अपना दुश्मन क्यों बना रहे हैं?”
सभी को अपना दुश्मन मैं क्यों बनाऊँगा? क्या मैं इतना बेवकूफ़ हूँ? उसने उन्हें जवाब दिया. उन्होंने जवाब में कहा कि, “हाँ, हैं तो आप बेवकूफ़. बिना किसी बात के बतंगड़ बना रहे हैं. क्या ज़रूरत है किसी की व्यक्तिगत बातचीत को सार्वजनिक करने की? आपको तमीज़ भी नहीं है. आपको तो सिर्फ़ कमेंटबाज़ी करनी है. मज़ा आता है न आपको. आपको नहीं पता कि आप ख़त्म हो गए हैं. ”
श्याम भौंचक्का रह गया कि यह क्या—इस आदमी से तो उसने यह उम्मीद नहीं की थी. उसने एक बार भी नहीं पूछा कि उस व्यक्तिगत बातचीत में उसे गाली देना कितना उचित था. उसने कॉल काट दी. मेरी निगाहें पिता की तस्वीर की तरफ़ गईं और दिमाग़ उस बात पर अटक गया—“तुम सबको अपना दुश्मन क्यों बना रहे हो?” आँखों में पहले पानी का एक ढुलका उभरा और पिता की आदतें अचानक ही उसे याद आने लगीं. वह बहुत ज़िद्दी क़िस्म के इंसान थे. कभी किसी की नहीं सुनी. किसी काम में मन नहीं लगा तो उसे छोड़कर दूसरा करने लगे. भावनाओं का ज्वार तो बहता ही रहता था. बात-बात पर माँ को खरी-खोटी सुना देते थे. आख़िर मैं उन्हीं का बेटा हूँ, तो बहुत बचाने-बचाने के बाद भी कुछ न कुछ पिता मुझमें समाया हुआ था. उनका डीएनए मेरे डीएनए में था.
बार-बार सोचता कि जब चेहरा माँ का दिया तो दिल भी माँ का दे देना था—इसमें पिता का दिल मिलाने की क्या ज़रूरत थी. अब मिल गया तो मैं क्या करूँ. बचपन में उनकी ही तरह पढ़ाई छोड़कर कमाने चला गया. फिर दिमाग़ की बत्ती जली तो वापस पढ़ने आ गया. जब पढ़ने लगा तो यह नहीं पता था कि कभी मैं कुछ करूँगा. बस यूँ ही कोई छोटी-मोटी नौकरी मिल जाए—यही सोचकर पढ़ने आ गया इलाहाबाद. इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए कभी पढ़ा नहीं; सिर्फ़ परीक्षा के दिनों में कुछ दिन रट्टा मारकर परीक्षा पास कर ली. ठीक ऐसे ही एम.ए. भी कर लिया. लेकिन कहाँ पता था कि कुलपति का एक निर्णय उसकी ज़िंदगी बदलने जा रहा है. कुलपति ने पहली बार यह व्यवस्था की कि परास्नातक के विद्यार्थी पुस्तकालय से दो किताबें एक साथ ले सकते हैं, जिन्हें उन्हें पंद्रह दिन में वापस करना है या फिर से स्वीकृत कराना होगा. यह जीवन का एक ऐसा मोड़ था कि ज़िंदगी ही मुड़ जाएगी—उसे इसका ज़रा भी अंदेशा नहीं था.
इसके बाद पुस्तकालय से पुस्तकें लेकर पढ़ने का मौका मिला तो उसने इसे गँवाना नहीं चाहा. एक दिन इतिहास वाली किताबों की पंक्तियाँ छोड़कर श्याम हिंदी साहित्य की तरफ़ बढ़ गया. वैसे उसने अपने दो साल हिंदी साहित्य पढ़कर बिताए थे, लेकिन फिर भी उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था. तभी उसकी नज़र चार मोटी-सी किताबों पर गई, जिनका रंग धूसर-लाल था. उसने उन्हें शेल्फ़ से निकाला और देखा तो वे राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा ‘मेरी जीवन यात्रा’ की प्रतियाँ थीं. बारहवीं के दौरान राहुल सांकृत्यायन का एक निबंध ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ श्याम पढ़ चुका था. दूसरा यह कि श्याम इतना जानता था कि राहुल सांकृत्यायन आज़मगढ़—यानी उसके ज़िले—के हैं. उसने दो खंड स्वीकृत कराए और उन्हें लेकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल के सामने वाले मैदान में बैठ गया. जनवरी की हल्की ठंड में धूप की गरम किरणें एक खिलते हुए फूल की तरह लग रही थीं. श्याम उन किरणों के आगोश में बैठा और पहला पृष्ठ खोला, तो फिर कब रात गहराने लगी—उसे पता ही नहीं चला.
इसके बाद श्याम विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल की सीढ़ियों पर बैठा उसे पढ़ता रहा. तब विश्वविद्यालय में रात में प्रवेश की पाबंदी नहीं थी. फिर ख़याल आया कि रात के दस बज गए हैं और उसे अब हॉस्टल जाना चाहिए. रात में केपीयूसी हॉस्टल की तरफ़ का गेट बंद हो जाता था, लेकिन उसके पास वहाँ से निकलने की वह तरकीब मालूम थी, जिसे विभिन्न छात्रावासों के अंतःवासी जानते थे. दरअसल गेट में लोहे का फूल बना था और गलती से फूल की पत्तियों में वेल्डिंग करने वाला मध्य रेखा बनाना भूल गया था. वह उसी से झुककर निकल जाया करता था. पहले लटककर दोनों पैर आगे करता, फिर सर्कस के बच्चों की भाँति कमर की लोच को झुकाते हुए बाहर आ जाता था. वह हॉस्टल पहुँचा तो उसके दिमाग़ में वही किताब नाचती रही.
श्याम अगली सुबह फिर उसी जगह किताब लेकर बैठा और पढ़ता रहा. राहुल सांकृत्यायन के जीवन को पढ़कर उसमें सराबोर होता रहा. उनके साथ-साथ लगता कि श्याम भी यात्रा कर रहा है. धीरे-धीरे उसने चारों खंड पढ़कर समाप्त कर दिए. इसके बाद उसमें बदलाव आने शुरू हो गए. श्याम अब साहित्यिक किताबें लेकर पढ़ने लगा. इसी दौरान प्रेमचंद, श्रीलाल शुक्ल की ‘रागदरबारी’, धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’ पढ़ी. बाद में उसे एक दिन ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ कहानी मिली, जो फणीश्वरनाथ रेणु की है. इस कहानी के बाद रेणु को उसने खोज-खोजकर पढ़ा, तो लगा कि यह तो मेरे पास-पड़ोस की बातें हैं, जिन्हें रेणु ने अपनी क़लम से कमाल का बना दिया है. फिर श्याम इसमें और धँसता गया.
यह धँसना उसके लिए महत्वपूर्ण था. श्याम अब उन सभी से थोड़ा अलग हो रहा था, जिनके साथ उसकी यारी-दोस्ती थी. लेकिन मेरे पढ़ने से किसी को दिक्कत क्यों ही होती. उसने परास्नातक करने के बाद एम.फिल. करने का निर्णय लिया और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय चला गया. वहाँ उसे मल्लाह के जीवन पर एक लघु शोध-प्रबंध लिखना था. श्याम रोज़ घाटों पर फील्डवर्क के लिए भटकता—कभी निराश होता, तो कभी खुश. उसे कोर्सवर्क के दौरान सिखाया गया था कि फील्ड में अपनी पहचान पूरी नहीं बतानी है, क्योंकि इससे आँकड़ों में गड़बड़ी हो सकती है. उसने अपनी मल्लाह पहचान को छिपाकर उनके बीच घूमना शुरू किया. श्याम उनसे अपनी पहचान छिपा सकता था, लेकिन खुद से नहीं. आख़िर खुद को कब तक डिटैच करता.
एक दिन श्याम निषादराज घाट पर सीढ़ियों पर बैठा गंगा के विस्तार को निहार रहा था. गंगा पर पर्यटकों और श्रद्धालुओं को लेकर जाती नावें देख रहा था. चूँकि उसने गंगा से इतर जो छोटी नदियाँ हैं, उन्हें भी देखा था. इलाहाबाद में रहते हुए कितनी बार यमुना और टोंस को देखा—उनमें मछली मारते, बालू निकालते, सब्ज़ी उगाते मल्लाहों को देखा था. आज जब अचानक उसकी निगाह एक बड़े से क्रूज़ पर गई, तो उसकी उँगलियाँ पेन और किताब ढूँढने लगीं. उसने बैग से डायरी निकाली और यूँ ही जो मन में आया, लिख दिया—और यही उसका पहला साहित्यिक प्रस्फुटन था. इसके बाद मेरी यूँ ही कलम चलती रही और कुल चार के क़रीब उसने कुछ कविता-सा लिखा. उसे यूँ ही फ़ेसबुक पर साझा कर दिया. फिर किसी ने कहा कि तुम्हारी कविताएँ अच्छी हैं, यहाँ भेज दो. उसे ज़्यादा पता नहीं था. उसने उनके बताए मेल पर वे कविताएँ भेज दीं और कुछ दिन बाद वे प्रकाशित हो गईं. इस तरह अनचाहे ही श्याम इस दुनिया में आ गया.
बाद में एक विश्वविद्यालय-स्तरीय कविता प्रतियोगिता में उसे प्रथम पुरस्कार मिला, तो लगा कि वह कुछ तो अच्छा लिख रहा है—नहीं तो इतिहास के छात्र को कविता के लिए पुरस्कार क्यों मिलता. उसने यहाँ से पीछे मुड़कर नहीं देखा. श्याम लिखता गया. धीरे-धीरे यह सिलसिला चलता ही रहा कि इलाहाबाद में यमुना नदी में बालू खनन को लेकर मल्लाहों और पुलिस-प्रशासन के बीच भिड़ंत हो गई और पुलिस ने कई नावें तोड़ डालीं. धीरे-धीरे यह मुद्दा राजनीतिक मुद्दा बन गया. श्याम बनारस में बैठा उस दिन चाय पी रहा था, जब किसी ने उसे एक स्क्रीनशॉट भेजा, जिसमें विपक्षी दल की एक बड़ी नेता ने उसकी कविता की पंक्तियाँ लिखकर सत्ता पर प्रहार किया था. सभी अख़बारों में उसकी कविता की पंक्तियाँ छपी थीं. श्याम रातों-रात एक जाना-पहचाना कविता लिखने वाला शख़्स बन गया. अब उसका परिचय यही हो गया कि—“अरे, आप वही हैं न, जिन्होंने नदी पर कविता लिखी थी?”
धीरे-धीरे उसने वह सब पाना शुरू किया, जिसका सपना भी उसने नहीं देखा था. विश्वविद्यालय की एक देश-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में उसे शीर्ष दस में स्थान मिला, तो श्याम खुशी से फूलकर कुप्पा हो गया. धीरे-धीरे उस पर लोगों की निगाहें पड़ने लगीं और कविता-पाठ के लिए उसे आमंत्रित किया जाने लगा. श्याम अब गद्य लिखने लगा. धीरे-धीरे यह कहानी-लेखन में बदल गया. इतिहास में तो श्याम पहले से ही ठीक-ठाक था, वहाँ भी उसने कुछ महत्वपूर्ण काम किए. इस तरह श्याम अनचाहे ही साहित्य की दुनिया में आ गया. एक लेखक-संगठन का सदस्य भी बन गया.
लेकिन उसे नहीं पता था कि उसने अपने पाँव एक दलदल में रख दिए हैं—जहाँ श्याम लोट तो सकता था, लेकिन लौट नहीं सकता था, क्योंकि जितना ही श्याम निकलने की कोशिश करता, उतना ही धँसता जाता. यहाँ आने पर उसे पता चला कि यहाँ सब खोखलेपन के शिकार हैं. यह भी एक बाज़ार है, जहाँ हर कोई अपना उत्पाद बेच रहा है—ठीक वैसे ही जैसे कोई दुकानदार सामान बेचता है. कोई यहाँ सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के लिए नहीं आया है. सबकी अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग है.
उसने देखा कि जो लोग मंचों से प्रगतिशीलता और फ़ासीवाद का विरोध करते हैं, वे व्यक्तिगत रूप से उतने ही रूढ़िवादी और फ़ासीवादी हैं. वे अपनी-अपनी सत्ता के भीतर वैसे ही हैं. जिस चरण-वंदना की वे मंचों से मुखालफ़त करते हैं, व्यक्तिगत जीवन में वही चाहते हैं कि जो चरण-वंदना करेगा, वही चुना जाएगा—फिर वह कैसा भी हो: गालीबाज़, स्त्रीद्वेषी, छल-कपट से भरा हुआ, गुटबाज़ी को हवा देने वाला, जाति, जन्म, क्षेत्र और नस्ल के आधार पर श्रेष्ठता का दंभ भरने वाला. उसका शहर भी इससे अछूता नहीं है. उसके सारे अवलोकन लगभग एक ही शहर के हैं. यहाँ लेखक बनाए जाते थे और लेखक बनने की क्षमता को हतोत्साहित किया जाता था. यह सब शक्ति-संबंध और चरण-वंदना के आधार पर होता था. जो जिस भूमिका में नहीं था, वह वही कर रहा था.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ये सब देश में लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं, लेकिन नहीं चाहते कि पहले स्वयं लोकतांत्रिक हों. वे फ़ासीवादी होकर भी देश में लोकतंत्र को बचाने की गुहार लगा सकते हैं. जाति से डीकास्ट होने का दावा करते हुए भी अपने जातीय संबंधों पर खेलते हैं. यह समस्या केवल हिंदी साहित्य में है या सभी भाषाओं के लेखन में—उसे नहीं पता. लेकिन यह तय है कि अब लेखन एक बाज़ार बन चुका है. कोई सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के लिए नहीं लड़ रहा है. सब अपनी-अपनी दुकान चला रहे हैं.
ख़ैर, श्याम को उनसे कोई दिक्कत नहीं थी. वे अपना काम कर रहे थे. लेकिन उसकी इस यात्रा में जो सबसे बड़ी परिघटना हुई, वह यह थी कि जिन्हें श्याम सबसे अच्छा और अपना हितैषी मानता था, वही उससे दूर होने लगे. उसने एक साल में इतने काम किए कि किसी को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह इतना सब कैसे कर सकता है. उसे ‘थ्री इडियट्स’ फ़िल्म का एक संवाद याद आता है—जब परीक्षाफल आता है और फरहान व राजू कहते हैं कि दोस्त फ़ेल हो जाए तो दुख होता है, लेकिन टॉप कर जाए तो ज़्यादा दुख होता है. उसके सबसे अच्छे दोस्त मेरी तरक्की से सबसे ज़्यादा दुखी थे.
कुछ लोग यह मानने लगे थे कि अगर ‘मैं’ नहीं होता, तो यह आज जो कुछ भी है, वह नहीं होता. यह जो कुछ भी है, मेरे कारण है—क्योंकि मैंने इसकी मदद की, इसे बनाया, मंच दिया, तो इसकी सफलता पर मेरा हक़ है. दोस्त इस बात से जले हुए थे कि जो एक साल पहले तक उनके साथ बदमाशियाँ करता था, आज इतना कुछ कैसे कर पा रहा है. उनके साथ बैठकर शराब पीता था, एक-दूसरे को गालियाँ देता था, और आज यह विद्वान बनने चला है. कहते—“इसकी औक़ात क्या है, ******* को सबक सिखाना पड़ेगा. ”
उधर कुछ लोगों को यही समस्या थी कि अब एक मल्लाह से भी कविता और कहानी सुननी पड़ेगी. यह तो हिंदी साहित्य का घोर कलियुग है. क्या ज़माना आ गया है—मछली मारकर खाने वाले भी कविता लिखेंगे. ख़ैर, वे तो उसका कुछ नहीं कर सकते थे, लेकिन दोस्त—वे जब चाहें उसे सबक सिखा सकते थे. सबक सिखाने के लिए पहला काम उन्होंने यह किया कि उसे शाम की चाय-पार्टी में बुलाना बंद कर दिया. उसके ख़िलाफ़ लोगों को भड़काने लगे. जहाँ भी कोई उसकी तारीफ़ करता, वहाँ वे टूट पड़ते—“क्या जानते हो तुम उसके बारे में? वह एक नंबर का धोखेबाज़ है. थोड़ा-सा लिखने क्या लगा, अपने आप को कालिदास समझने लगा है. तुम लोग उसकी तारीफ़ क्यों करते हो? चाहो तो तुम भी लिख दो. मैं तो उससे भी अच्छा लिख सकता हूँ, लेकिन लिखता नहीं. ”
धीरे-धीरे यह विरोध संगठित रूप लेने लगा और इसका सरगना वही आदमी बना, जिसने मेरी सबसे ज़्यादा मदद की थी और जिसे श्याम सबसे अच्छा इंसान मानता था. उसका यह भ्रम तब टूटा, जब उसने उन्हें कॉल किया और उन्होंने कहा—“हाँ, कौन बोल रहे हैं?” तब उसे समझ आया कि वे मेरे व्हाट्सऐप संदेशों का जवाब क्यों नहीं देते थे. वे चाहते थे कि श्याम वहीं जाये, वहीं बैठे, जहाँ वे चाहते हैं लेकिन उसने ऐसा नहीं किया. जहाँ मन किया, वहाँ बैठा, जिससे मन किया, मिला. इसे उन्होंने अपनी अवमानना समझा और श्याम को सबक सिखाने का निश्चय कर लिया.
पहले दोस्तों और अग्रजों से उसका सामाजिक बहिष्कार करवाया. उसे ट्रोल करवाया. गालियाँ दिलवाईं. लेकिन श्याम अड़ा रहा कि इस बार मैंने कोई गलती नहीं की है, तो माफ़ी नहीं माँगूँगा. इस सबका नेतृत्व कर रहा था एक कवि, जिसे यह भ्रम था कि उसने ब्रह्मांड की सर्वश्रेष्ठ कविताएँ लिखी हैं—और यह भ्रम उसे उसके आसपास रहने वालों ने दिया था.
उसने देखा कि मेरे संगठन के कर्ता-धर्ता, जो हमेशा लोकतंत्र, स्त्री-सशक्तिकरण और जाति-विरोध की बातें करते हैं, वही ऐसे लोगों को प्रश्रय दे रहे हैं. उसका बना-बनाया भ्रम टूट गया. उन्होंने श्याम के सामने उसे गाली देने वाले अपने स्वजातीय से कहा—“ठीक है, पवन. कुछ नहीं होगा. ” फिर श्याम से बस नमस्कार का उत्तर देकर चलते बने. दूसरा व्यक्ति, जो मासूम लड़कियों को अपना शिकार बनाता था, उनका प्रिय था—जबकि उन्हें सब कुछ पता था. फिर भी वे उसे ही दुश्मन समझते रहे.
जिस दुकान पर श्याम बैठता था, उस दुकान-मालिक की संगठन-प्रमुख से बनती थी, इसलिए वह भी कुछ नहीं कर सकीं—सिवाय यह कहने के कि “उसने उसे बुलाया है, मेरा काम है. ” मेरा माथा ठनका. श्याम एक अंधेरी गुफ़ा में गिर गया, जहाँ चारों तरफ़ साँप ही साँप फुँफकार रहे थे. धीरे-धीरे एक-एक साँप उसकी आँख, नाक और मुँह में घुसने लगा. तभी एक बड़ा-सा अजगर आया और उसने श्याम का गला ज़ोर से कसकर दबाया. एक खट्ट की आवाज़ हुई—और सब ख़त्म हो गया.
-गोविंद निषाद
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परिचय
गोविंद निषाद
शोध छात्र, जी बी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, संस्मरण, लेख प्रकाशित हैं, समालोचन, समय के साखी, बनास जन, तद्भव, नया पथ पर कहानियाँ प्रकाशित हैं।


