आलोचना

बारिश, स्मृति और मनुष्य के बीच : विजय राही की कविता का लोक-संसार— एक आलोचनात्मक पाठ

कविता जब अपने समय से संवाद करती है तो उसके सामने दो रास्ते होते हैं—या तो वह समय की बड़ी घटनाओं को सीधे अपनी विषय-वस्तु बनाए या फिर उन छोटी-छोटी जगहों तक पहुँचे जहाँ इतिहास और राजनीति मनुष्य के रोज़मर्रा के जीवन में अपना असर छोड़ते हैं। विजय राही की कविता दूसरे रास्ते को चुनती है। उनके यहाँ कोई बहुत बड़ा घोषणापत्र नहीं है, कोई ऊँची वैचारिक उद्घोषणा नहीं; इसके बजाय माँ है, बहन है, खेत है, बारिश है, आँधी है, प्रेम है, बिछड़ना है, स्मृतियाँ हैं और उन सबके बीच धीरे-धीरे बदलता हुआ मनुष्य है।

यही कारण है कि विजय राही को केवल ‘गाँव का कवि’ कहना उनकी कविता को सीमित करना होगा। उनका लोक राजस्थान से निकलता है, लेकिन उनकी कविता का अनुभव-क्षेत्र उससे कहीं बड़ा है। वे गाँव को किसी संग्रहालय में सुरक्षित पुरानी वस्तु की तरह नहीं देखते; गाँव उनके यहाँ वर्तमान में साँस लेता हुआ संसार है—अपने अभावों, अपनी आत्मीयताओं, अपने पितृसत्तात्मक संस्कारों, अपनी स्मृतियों और अपनी टूटती हुई सामुदायिकता के साथ।

 विजय राही की कविता : बिछड़ने से बची हुई मनुष्यता की तलाश

विजय राही की कविता को पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात महसूस होती है, वह यह कि यह कविता किसी बड़े वैचारिक उद्घोष से अपनी पहचान नहीं बनाती। वह जीवन के बहुत मामूली दृश्यों में उतरती है—चूल्हे पर बैठी दो बूढ़ी औरतों में, प्याज बेचते बाप-बेटे में, अरहर के खेतों की पगडंडी में, गणगौर के मेले की बालियों में, अमरूद लाने की छोटी-सी फरमाइश में, पिता की स्मृति में, खोई हुई एक कविता में, या किसी गाँव के खेत में अकेली खड़ी एक स्त्री में। लेकिन इन्हीं मामूली दृश्यों के भीतर राही मनुष्य के सबसे बड़े अनुभवों को पकड़ते हैं—बिछड़ना, स्मृति, प्रेम, मृत्यु, अकेलापन, स्त्री का दुख, रिश्तों की बदलती प्रकृति और मनुष्यता के भीतर बची हुई थोड़ी-सी नमी।

उनकी कविता का लोक कोई सजावटी लोक नहीं है। वह जीवन की जमीन है। ‘जुगाड़’, ‘रामझारा’, ‘मोरेल’, ‘लूगड़ी’, ‘ढाणी’, ‘कांकड़’, ‘कलेवा’, ‘गणगौर’, ‘आखातीज’, ‘अरहर के खेत’ जैसे शब्द कविता में आते ही एक पूरा भूगोल खड़ा कर देते हैं। यह वही संसार है जिसमें राही के मनुष्य रहते, प्रेम करते, झगड़ते, बूढ़े होते, बिछड़ते और फिर भी एक-दूसरे का सहारा बने रहते हैं।

लेकिन राही की कविता का असली भूगोल गाँव से भी भीतर है—मनुष्य का भीतर। और उस भीतर जाने वाली सबसे बड़ी पगडंडी है—बिछड़ना।

‘बिछड़ना’ की पहली ही पंक्ति—

“जीवन में जो भी शख़्स मिला मुझे

मिला कम और बिछड़ा बहुत”

—राही के पूरे काव्य-संसार को समझने की एक चाबी देती है। यह केवल प्रेम-वियोग की पंक्ति नहीं है। इसके भीतर पिता से बिछड़ना है, प्रेम से बिछड़ना है, मित्रों से बिछड़ना है और उस पूरे बचपन से बिछड़ना है जो लौटकर नहीं आता।

प्रेम भी राही के यहाँ स्थायित्व नहीं देता। और यही अतीत आगे चलकर वर्तमान को नियंत्रित करने लगता है। कवि बच्चे का स्कूल बदलना चाहता है, पर बदल नहीं पाता, क्योंकि उसे डर है कि उसके दोस्त उससे बिछड़ जाएँगे।

यहाँ राही की कविता की एक बड़ी विशेषता सामने आती है—व्यक्तिगत दुख अगली पीढ़ी के प्रति प्रेम में बदल जाता है। जिसने बिछड़ना झेला है, वह अपने बच्चे को बिछड़ने से बचाना चाहता है।

इसीलिए ‘बिछड़ना’ केवल एक कविता नहीं, राही की कई कविताओं में चलती हुई एक अंतर्धारा है।

खोई हुई कविता : स्मृति का दूसरा शोक

‘खोई हुई कविता’ में यह बिछड़ना और अधिक जटिल हो जाता है। पिता पर “बहुत हिम्मत करके” लिखी गई कविता खो जाती है—

“एक अरसा हो गया है

वह कविता खो गई है

उसके खोने का मुझे उतना ही दुख है

जितना पिता को खोने का है”

यहाँ कविता सिर्फ कविता नहीं है। वह पिता की स्मृति का एक बचा हुआ टुकड़ा है। पिता पहले जीवन से गए और फिर पिता पर लिखी कविता भी चली गई। इसलिए कवि कहता है—

“ऐसा लगता है

पिता को मैंने फिर से खो दिया है।”

यहाँ स्मृति और मृत्यु का संबंध अत्यंत मार्मिक हो जाता है। मनुष्य मरता है, फिर स्मृति में बचता है; लेकिन जब स्मृति को सँभालने वाली वस्तु भी खो जाए तो मृत्यु दूसरी बार घटित होती है।

भाई : मृत्यु से पहले ही शुरू हो जाने वाला बिछड़ना

‘भाई’ कविता में मृत्यु केवल किसी एक व्यक्ति के मरने की घटना नहीं है। कवि कल्पना करता है कि समय के साथ परिवार और संबंध धीरे-धीरे छूटते जाएँगे। बाप-दादा की राख पर उगती घास और उस घास को चूल्हा बनाने के लिए घर लाती औरतों का बिंब मृत्यु को जीवन के रोज़मर्रा के काम में मिला देता है।

यहाँ मृत्यु भयावह इसलिए नहीं कि वह अचानक आती है, बल्कि इसलिए कि समय धीरे-धीरे अपने लोगों को हमसे छीनता जाता है।

भीतर की नदी : दो घूँट पानी और मनुष्यता का सवाल

‘भीतर की नदी’ राही की सामाजिक संवेदना की सबसे प्रभावशाली कविताओं में है।

प्याज बेचने आए बाप-बेटे का दृश्य कितना साधारण है—जुगाड़ गली के मोड़ पर शीशम के नीचे खड़ा है, पिता आवाज़ लगाता है—

“प्याज ले लो प्याज, मोरेल का देशी प्याज…”

घर की औरतें, बच्चे, बूढ़े—सब अपनी जगह हैं। काकी कलेवे के लिए पूछती है और भाभी दो रोटियाँ और साग ले आती है। बनजारे पिता-पुत्र वहीं बैठकर खाते हैं।

फिर कवि उन्हें पानी पिलाता है।

बस इतना।

लेकिन उस “दो घूँट पानी” से बनजारे की आँखों में ऐसा भाव आता है कि वह कह उठता है—

“सात साल हो गए मुझे प्याज बेचते

दुनिया-भर में घर-घर डोलते

थारो जस्यो धरमी आदमी कोनी देख्यो…”

कवि चकित है—

“मैंने ऐसा क्या कर दिया है

दो घूँट पानी ही तो पिलाया है”

और यहीं कविता अपने निजी प्रसंग से बाहर निकलकर पूरे समाज पर प्रश्न बन जाती है—

“इन सात सालों में कितना मर गया है

हमारी आँख का पानी

कितनी शुष्क हो गई है

हमारे भीतर की नदी”

यही राही की कविता का महत्त्वपूर्ण बिंब-संसार है—पानी = मनुष्यता।

देवरानी-जेठानी

‘देवरानी-जेठानी’ में राही रिश्तों को किसी आदर्श पारिवारिक चित्र की तरह नहीं देखते। शुरुआत में दोनों के बीच कटुता है। वे लड़ती हैं, एक-दूसरे को बाप-दादा तक सुना देती हैं, पतियों के सामने रोती हैं, भाई-भाई के बीच भी बोलचाल बंद हो जाती है।

फिर बच्चे होते हैं।

“सात घड़ी बच्चों के संग से

थोड़ा हेत बढ़ा”

और उम्र के साथ शरीर टूटने लगते हैं—

“दोनों बुढ़िया

एक-दूसरे की लाठी बन गईं।”

यहीं कविता अपने सबसे सुंदर मानवीय बिंदु पर पहुँचती है। जो स्त्रियाँ कभी एक-दूसरे के विरुद्ध थीं, वही अब एक-दूसरे को नहलाती हैं, चोटी गूँथती हैं, बाँटकर खाती हैं और एक के बीमार पड़ने पर दूसरी की नींद उड़ जाती है।

और अंत में दोनों बूढ़े भी साथ बैठते हैं, हुक्का भरते हैं, पुरानी बातें याद करके हँसते हैं; चूल्हे पर बैठी दोनों बुढ़ियाएँ एक-दूसरे के कान में कुछ कहकर हँसती हैं।

राही यहाँ कोई निष्कर्ष नहीं लिखते। समय स्वयं निष्कर्ष बन जाता है।

रिश्ते जन्म से जितने नहीं बनते, उतने साथ रहने, दुख झेलने और बूढ़े होने से बनते हैं।

स्त्री : विद्रोह, अपमान और अकेलापन

‘चीलगाड़ी’ में स्त्री अपनी इच्छा का रास्ता खुद चुनती है। आँटे-साँटे में हुई सगाई के विरुद्ध वह प्रेमी को संदेश भेजती है और लगन की रात घर से निकल जाती है। “डर की धूल को हवा में उड़ाते हुए” वे दोनों पगडंडी पर दौड़ते हैं।

जुगनू रास्ता दिखाते हैं, टिटहरियाँ कुछ दूर साथ चलती हैं।

यह दृश्य लोककथा जैसा है, लेकिन इसका अर्थ बहुत आधुनिक है—एक लड़की अपनी जिंदगी पर अपना अधिकार वापस ले रही है।

और तभी पास की शादी से गीत सुनाई देता है—

“बना को दादो रेल चलाबे

बनो चलाबे चीलगाड़ी…”

लोकगीत और लड़की का वास्तविक भाग जाना एक-दूसरे में घुल जाते हैं। जिस इच्छा को सामाजिक व्यवस्था दबाती है, लोकगीत उसी इच्छा को किसी और रूप में पहले से गाता चला आ रहा है।

लेकिन ‘भँवरी देवी के लिए’ में स्त्री का दूसरा चेहरा सामने आता है—सामाजिक बहिष्कार और अकेलापन।

गाँव पहुँचने पर लोग उनका नाम सुनकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं, औरतें भीतर चली जाती हैं, एक पुरुष गाली तक देता है।

इसके विपरीत स्कूल से लौटती लड़कियाँ उनका रास्ता बताती हैं और उन्हें अपनी “प्यारी बुढ़िया” से मिलाने ले जाती हैं।

फिर खेत में—

“गर्मी की दोपहर में

बबूलों नीचे

उसका लाल लूगड़ा लहरा रहा था”

दोनों मिलते हैं और रोते हैं। वह माथे पर हाथ फेरती है, बाँहों में भर लेती है।

और अंत में—

“वह तब भी अकेली थी

जब रसूखदारों ने उसकी आत्मा पर हमला किया

आज से तक़रीबन पच्चीस साल पहले”

यह “अकेली” शब्द कविता का सबसे बड़ा आरोप है। अत्याचार करने वाले ही दोषी नहीं; वह समाज भी दोषी है जिसने पीड़िता को उसके बाद भी अकेला छोड़ दिया।

बहन : घर के भीतर का अदृश्य दुख

 ‘बहन’ कविता राही की स्त्री-दृष्टि को और तीखा करती है। वहाँ बहन एक घंटे लहसुन छीलती है तो भी छिलके रह जाते हैं, दो घंटे बर्तन माँजती है तो भी गंदे रह जाते हैं, रोटी बनाती है तो भी रोटियाँ जली-कच्ची-पक्की रह जाती हैं। कुएँ से पानी लाती है तो मटकी फोड़ आती है और ससुराल आते हुए हर बार दूसरी ढाणी का रास्ता पकड़ लेती है।

समाज इसे उसके “पागलपन” की तरह देखता है, लेकिन माँ समझती है कि उसकी बेटी के भीतर क्या टूट चुका है। कविता का अंतिम संवाद—

“म्हारी बेटी खूब मौज में है!”

—विडंबना को असह्य बना देता है। माँ सच जानती है, लेकिन सामाजिक व्यवस्था के सामने उसे भी झूठ बोलना पड़ता है।

राही यहाँ स्त्री के दुख को किसी घोषणापत्र की भाषा में नहीं कहते। वे दिखाते हैं कि दुख को सामान्य व्यवहार समझ लेने वाला घर किस तरह धीरे-धीरे एक स्त्री को भीतर से मार देता है।

शर्मिंदगी : पुरुष की निगाह भी कठघरे में

‘शर्मिंदगी’ में राही स्त्री की निगरानी करने वाले पुरुष-मन को कठघरे में खड़ा करते हैं। यहाँ समस्या केवल समाज नहीं, बल्कि पुरुष की अपनी कल्पना भी है—वह अपनी बहन के जीवन को लेकर शक करता है और अंततः अपनी ही आशंका के सामने शर्मिंदा होता है।

यह कविता महत्वपूर्ण इसलिए है कि राही स्त्री-विमर्श को केवल “स्त्री पर अत्याचार” कहकर समाप्त नहीं करते; वे पुरुष की निगाह, उसके संदेह और उसके नैतिक अहंकार को भी प्रश्नांकित करते हैं।

अगर तुम आओ : प्रेम की सबसे घरेलू भाषा

‘अगर तुम आओ’ में प्रेम किसी बड़े संवाद में नहीं, बल्कि रोजमर्रा की चीज़ों में छिपा है—

“सहजन की फलियाँ लेते आना

अगर तुम आओ”

फूलों की सब्जी से ऊब चुकी स्त्री मोरेल की ताज़ी भाजी चाहती है। गणगौर के मेले से ऐसी बालियाँ चाहती है जिनके लिए कानों में छेद न करना पड़े। आखातीज पर भाई का ब्याह है, इसलिए पीली लूगड़ी भी चाहिए।

लेकिन धीरे-धीरे पता चलता है कि असली माँग चीज़ों की नहीं, उस व्यक्ति की है जो ये चीज़ें लेकर आएगा।

“कितने कम रहते हो तुम मेरे पास”

और फिर—

“क्यों नहीं तुम लूगड़ी के फूल हो जाते

मैं तुमको ही माथे पर ओढ़ लेती”

यह राही के प्रेम-काव्य का अत्यंत सुंदर बिंब है।

और अंत में अमरूद—

“जब तुम परदेस चले जाओगे

तब मेरे लिए अमरूद कौन लाएगा”

यहीं कविता की पूरी मिठास अचानक विरह में बदल जाती है। अमरूद एक फल से स्मृति की वस्तु बन जाता है।

यादें- : प्रेम का भूगोल

‘यादें-’ में वही अमरूद फिर लौटता है—

“तुम कब आओगी

कब अपने हाथों से अमरूद खिलाओगी”

लेकिन अब वह प्रेम की वर्तमान वस्तु नहीं, स्मृति का हिस्सा है।

कवि पूछता है—

“मैं तुम्हारी याद था

अब कौन मुझे तुम्हारी जगह याद करे”

और फिर—

“मैं तुम्हारा प्यार था

अब कौन मुझे तुम्हारी जगह प्यार करे”

यहाँ बिछड़ना केवल प्रिय के खोने का दुख नहीं है। प्रिय के साथ अपना वह रूप भी चला गया है जो केवल उसकी आँखों में मौजूद था।

सबसे सुंदर बिंब अंत में आता है—

“कब तुम उस मोड़ पर

आकर मेरा हाथ थाम लोगी

जहाँ से एक रोज़ हम

अरहर के खेतों बीच की पगडंडियों से अलग हुए थे”

यह पगडंडी राही के काव्य में बार-बार आने वाले रास्तों से अलग नहीं है। लेकिन यहाँ रास्ता बिछड़ने का भूगोल बन गया है।

तुम्हारा आना : प्रेम और शून्य के बीच

‘तुम्हारा आना’ प्रेम-कविता के पारंपरिक मुहावरे को तोड़ती है। कोई व्यक्ति जीवन में आता है, लेकिन ऐसे समय जब भीतर पहले ही बहुत कुछ मर चुका है—

“तुम ऐसे समय आई

जैसे किसी मृतक की चिता को

आख़िरी लकड़ी देकर

भारी मन से लौट रहे हों प्रियजन…”

इसलिए—

“मैंने भी तुम्हें स्वीकारा

सिर झुकाया”

यहाँ प्रेम का स्वागत नहीं है। कोई उल्लास नहीं। सिर्फ स्वीकार है।

और फिर कविता का बेहद कठोर निष्कर्ष—

“जीवन में कुछ लोग हमें ऐसे समय मिलते हैं

कि उनके मिलने पर न ख़ुशी होती है

और न ही न मिलने पर मलाल”

यह प्रेम की अनुपस्थिति से अधिक मन की थकान की कविता है।

फूलों की तरह तुम : स्मृति में बची हुई खुशबू

‘फूलों की तरह तुम’ उसी प्रेम का दूसरा रूप है। प्रिय चली गई है, लेकिन—

“तुम्हारी ख़ुशबू मेरी आत्मा तक फैल गई”

और—

“मेरी आँखें फूलों की खोज करती तितलियाँ हैं”

यहाँ आँखें केवल अतीत को नहीं खोज रहीं; वे फिर से खिलने की संभावना भी खोज रही हैं—

“इन्हें उम्मीद है कि फिर खिलेंगे फूल

फिर बहार आएगी जीवन की बगिया में”

इसलिए अंतिम पंक्ति—

“तुम्हें याद करना फूलों को याद करना है”

स्मृति को दुख से उठाकर सौंदर्य में बदल देती है।

तुम्हारा प्यार : नष्ट होते घर में आखिरी जीवन

‘तुम्हारा प्यार-’ में प्रेम की भूमिका और भी निर्णायक हो जाती है—

“दिल बुझ चुका है

जख़्म सूख चुके हैं

सीने के

ख़ामोश है ज़बान

लेकिन आत्मा में घाव है अभी भी”

यहाँ बाहर सब कुछ समाप्त है, लेकिन आत्मा में घाव अभी जीवित है।

और फिर—

“इस घर के नष्ट होने से पहले

एकबारगी इसमें जीवन भर देगा

तुम्हारा प्यार”

‘घर’ यहाँ घर से कहीं अधिक है। यह मनुष्य का भीतर है, उसका जीवन है, उसका संबंध है। प्रेम किसी स्थायी समाधान की तरह नहीं, बल्कि नष्ट होने से पहले जीवन की आखिरी संभावना की तरह आता है।

फूल और उदासी

‘उदासी-’ में राही का प्रकृति-बिंब फिर उलट जाता है—

“फूलों के खिलने का एक मौसम होता है

और मुरझाने का भी”

लेकिन कुछ फूल ऐसे हैं—

“जिनके खिलने का कोई मौसम नहीं होता

जिनके मुरझाने का कोई सबब नहीं होता”

और वे तब भी मुरझा जाते हैं—

“जबकि बाग़ों में बहार आई हुई होती है।”

यह राही की उदासी की विशिष्टता है। हर दुख का कारण नहीं होता। हर मुरझाहट के पीछे कोई घटना नहीं होती। कभी-कभी बहार के बीच भी मनुष्य उदास होता है।

काश : जीवन से बाहर जाने की इच्छा

‘काश’ इसी अनाम उदासी को एक और दिशा देती है—

“काश जिन्दगी में भी कोई आपातकालीन खिड़की होती”

कवि उससे कूदकर घने जंगलों की ओर जाना चाहता है। लेकिन जंगल भी कोई रोमानी आश्रय नहीं है। वहाँ सूखे पत्ते चमकते हैं और हवा उनके कानों में कहती है—

“जिन्दगी इतनी भी खूबसूरत नहीं।”

यह पंक्ति राही के काव्य-संसार में बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह कविता को जबरन आशावादी बनाने से इनकार करती है। उनके यहाँ दुख का समाधान हमेशा सकारात्मक निष्कर्ष में नहीं होता।

मुक्ति : कवि की अपनी नैतिक परीक्षा

‘मुक्ति’ केवल दो पंक्तियों की कविता है—

“शहर के कवियों ने

उसकी मृत्यु पर कविताएँ लिखीं

और मुक्ति पाई।”

लेकिन यह दो पंक्तियाँ पूरी कविता की नैतिकता पर प्रश्न लगा देती हैं।

कविता लिख देना क्या किसी मृत्यु के प्रति हमारी जिम्मेदारी समाप्त कर देता है?

आँधी : अकेले पेड़ और अकेला कवि

‘आँधी’ राही के संबंध-बोध को एक बड़े प्राकृतिक रूपक में बदल देती है। जंगल के पेड़ आँधी में एक-दूसरे से चिपक जाते हैं, अपनी डालियों से एक-दूसरे को हिम्मत देते हैं और पौधों को अपनी बाँहों में छिपाते हैं। लेकिन कुछ पेड़ ऐसे हैं जिनका कोई करीबी नहीं—“कवियों की तरह”—और वे अकेले आँधी सहते-सहते टूट जाते हैं।

कविता अंततः निजी वियोग तक लौटती है—

“तुमसे बिछुड़ जाने के बाद

जैसे मेरी छाती टूटती है।”

यहाँ पेड़ और मनुष्य एक ही अस्तित्वगत सत्य में आ जाते हैं—अकेला होना टूटने की संभावना को बढ़ा देता है।

भाषा : लोक से उठती हुई आधुनिक संवेदना

राही की भाषा की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह लोकशब्दों को कविता में किसी बाहरी वस्तु की तरह नहीं रखती। ‘लूगड़ी’, ‘कांकड़’, ‘ढाणी’, ‘रामझारा’, ‘मोरेल’, ‘कलेवा’, ‘जुगाड़’ आदि शब्दों के साथ पूरा जीवन आता है।

लेकिन उनकी भाषा केवल लोक की भाषा नहीं है। उसमें आधुनिक मन की बेचैनी भी है—‘आपातकालीन खिड़की’, ‘शहर के कवि’, ‘स्कूल बदलने का डर’, ‘आत्मा में घाव’, ‘मुक्ति’ जैसे बिंब उसी कविता को समकालीन बनाते हैं।

यही उनका महत्त्व है—वे लोक को संग्रहालय से निकालकर वर्तमान मनुष्य के भीतर रख देते हैं।

निष्कर्ष : भीतर की नदी अभी पूरी तरह सूखी नहीं है

विजय राही की कविता में उदासी बहुत है। मृत्यु है। पिता का खोना है। प्रेम का जाना है। रिश्तों का छूटना है। स्त्री का अकेलापन है। मनुष्यता के सूखने की चिंता है। जीवन से भाग जाने की इच्छा भी है।

लेकिन उनकी कविता निराशा में समाप्त नहीं होती।

क्योंकि उसी संसार में कोई राहगीर दो घूँट पानी पीकर कहता है कि उसने सात वर्षों में ऐसा आदमी नहीं देखा।

उसी संसार में दो लड़ती हुई देवरानियाँ बुढ़ापे में एक-दूसरे की लाठी बन जाती हैं।

उसी संसार में एक लड़की रात के अँधेरे में अपनी इच्छा की ओर दौड़ती है और जुगनू उसका रास्ता दिखाते हैं।

उसी संसार में कोई स्त्री प्रिय से कहती है—

“क्यों नहीं तुम लूगड़ी के फूल हो जाते

मैं तुमको ही माथे पर ओढ़ लेती।”

उसी संसार में कोई बिछड़ा हुआ प्रेमी अरहर के खेतों की उस पगडंडी पर लौटने की प्रतीक्षा करता है जहाँ से दोनों अलग हुए थे।

उसी संसार में किसी नष्ट होते घर में प्यार आखिरी बार जीवन भर सकता है।

और उसी संसार में किसी की आँखें अब भी फूलों की खोज करती तितलियाँ हैं।

इसलिए राही की कविता का सबसे गहरा अर्थ शायद उसकी उदासी में नहीं, उदासी के बावजूद बची हुई मनुष्यता में है।

वे लिखते हैं—

“कितनी शुष्क हो गई है

हमारे भीतर की नदी।”

लेकिन उनकी अपनी कविता इस प्रश्न का एक मौन उत्तर भी देती है—यदि नदी पूरी तरह सूख गई होती, तो दो घूँट पानी किसी बनजारे की आँखों में इतनी रोशनी क्यों भरते? कोई बूढ़ी औरत दूसरी बूढ़ी औरत को नहलाने क्यों बैठती? कोई बेटी अपने पिता को फिर बच्चा क्यों बना देती? कोई स्मृति फूलों की खुशबू क्यों बनती? और कोई कवि अब भी उस मोड़ की ओर क्यों देखता जहाँ से कभी दो लोग अलग हुए थे?

राही की कविता उसी बची हुई नमी की कविता है।

उस नमी की, जो रिश्तों के टूट जाने के बाद भी कहीं बची रहती है।

उस नमी की, जो स्मृति के सूखते हुए पात्र में अंतिम बूँद की तरह चमकती है।

उस नमी की, जो मनुष्य को अब भी मनुष्य बनाए हुए है।

और शायद इसीलिए विजय राही की कविता का सबसे बड़ा प्रतिरोध किसी नारे में नहीं, बल्कि एक बहुत साधारण मानवीय कर्म में दिखाई देता है—

किसी प्यासे को पानी पिला देना।

–प्रियंका भारद्वाज


प्रियंका भारद्वाज
एम ए.
मधुमती, समर्था, कादम्बनी, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राजस्थान डायरी विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कविता, कहानी प्रकाशित !
रेडियो में कविताएं एवम् वार्ता प्रसारित।
हिंदी, राजस्थानी, पंजाबी, अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान।
पूर्व संपादक- अंजस (रेख़्ता)

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