शब्द बिरादरी वार्षिक सम्मान २०२५-२६ में श्री विनोद शाही को उनकी रचना कहानी की दुनिया और निर्मल वर्मा पर मिले सम्मान के उपरांत समारोह में दिया गया उनका वक्तव्य
हिंदी आलोचना की पहली परंपरा का केंद्रीय बीज शब्द आचार्य रामचंद्र शुक्ल के लोकमंगल के रूप में हमारे सामने आता है। लोकमंगल की उनकी अवधारणा का संबंध वर्णवाद के उदार और मानवीय पक्ष के साथ है। इसका मूर्त रूप शील, शक्ति और सौंदर्य की त्रिवेणी के रूप में हमारे सामने आता है। नामवर सिंह ‘दूसरी परंपरा की खोज’ करते हुए जिस सौंदर्यशास्त्र तक पहुंचते हैं, उसका संबंध लोक के श्रमजीवी व्यक्तित्व से है। वे ‘पसीने के सौंदर्य’ को दूसरी परंपरा की आधारभूमि की तरह हमारे सामने रखने की कोशिश करते हैं। तो एक तरफ हमारी वर्चस्वी मुख्यधारा है और दूसरी ओर सामान्य जन से ताल्लुक रखने वाले लोक का संसार है। हजारी प्रसाद द्विवेदी इन दोनों के बीच संवाद की बात करते हैं। जबकि नामवर सिंह लोक के श्रमजीवी पक्ष की ओर अधिक झुकने का आग्रह करते हैं। साहित्य की रचनाशीलता के संदर्भ में उनकी मार्क्सवादी दृष्टि उन्हें इस तरह के चुनाव की ओर ले जाती है।
परंतु हम देख सकते हैं की रचनाशीलता का क्षेत्र कहीं अधिक व्यापक है। तो सवाल उठता है कि हमारी आलोचना हजारी प्रसाद द्विवेदी और नाम व सिंह की आलोचना से आगे कैसे बढ़ सकती है।? श्रमजीवी समाज और पसीने के सौंदर्यबोध तक पहुंचती हुई हमारी आलोचना ने अपने विकास का एक मरहला जरूर तय किया है; परंतु फिर उससे आगे के आलोचना के विकास की बात जैसे किसी गतिरोध का शिकार हो गई मालूम पड़ती है।
निम्न वर्ग की चेतना और लोक के पक्ष को केंद्र में रखते हुए साहित्य की व्याख्या करने की दृष्टि आलोचना कर्म का एक पक्ष भर है। तो आलोचना के जो दूसरे पक्ष है, उन्हें भी साथ-साथ समेटने वाली दृष्टि का विकास कैसे होगा?
इस बारे में समकालीन युगबोध का विवेचन हमारी कुछ मदद कर सकता है। पिछले दौर के ध्रुवों में विभाजित यथार्थ पर एक निगाह डालें, तो पाएंगे कि उसके भीतर से हम ‘विरुद्धों के सामंजस्य’ वाली आलोचनात्मक शब्दावली तक पहुंचे थे। अब उसे पीछे छोड़ने का वक्त आ गया है। वहां से समकाल में प्रवेश करते हुए अब हम ‘सह-अस्तित्व’ वाली शब्दावली को ग्रहण करने की स्थिति तक आ सकते हैं।
समाज की मुख्यधारा और गौण धारा के बीच या वर्चस्वी समाज की चेतना और हाशिये के समाज के बीच के संघर्ष को देखते रहने से ताल्लुक रखने वाली दृष्टि हमें एक हद तक ही रचनाशीलता के मर्म को पकड़ने में मदद करती है।
पिछले दौर में मार्क्सवाद के प्रभाव के तहत वर्ग संघर्ष की बात रचनाशीलता की व्याख्या के लिए मुख्य प्रस्थान हो गई थी। आजकल देरिदायी विखंडन वादी पद्धति का अनुसरण करते हुए वर्चस्वी पक्ष को हटाकर गौण पक्ष को सामने ले आने की बात अधिक चलन में दिखाई देती है। परंतु जब हम गौण पक्ष के साथ खड़े होने की कोशिश करते हैं, तब भी भाषा तो वर्चस्व की ही होती है; भले ही वह एक तरह का प्रति-वर्चस्प ही क्यों ना हो।
एक के पक्ष में दूसरे को हटाने से वास्तविक समन्वय संभव नहीं है। इसके लिए हमारे यहां एक अन्य दृष्टि विकसित हुई, जिसे हम ‘विविधताओं के सह-अस्तित्व’ के रूप में देखते हैं। सह-अस्तित्व की बात हमारे राजनीतिक सरोकारों के रूप में एक अरसे से अर्थपूर्ण बनी हुई है। परंतु साहित्य को समझने में मदद करने वाले आलोचनात्मक औजार के रूप में इस दृष्टि का अंतर्विकास होना अभी बाकी है। तो पहले इस अवधारणा को ठीक से समझना ज़रूरी लगता है।
ऐसा नहीं है कि सह-अस्तित्व की बात भारतीय संदर्भ में प्रकट हुई कोई मौलिक धारणा है। हालांकि वह काफी समय से हमारी विदेश नीति का मूलमंत्र बनी हुई है। वस्तुस्थिति यह है कि उत्तर-औपनिवेशिक दुनिया में सह-अस्तित्व एक ज़रूरी सरोकार के रूप में पूरी दुनिया के लिए अचानक पहले से कहीं अधिक अर्थपूर्ण होता चला गया है।
‘वर्चस्व’ औपनिवेशिक दुनिया का मूल मंत्र रहा है। पश्चिम के लोग बाकी दुनिया को अपना उपनिवेश बनाने के लिए आक्रांता के रूप में अपना साम्राज्य विस्तार करते दिखाई देते रहे हैं। साहित्य की आलोचना ने उसे नायक केंद्रित मूल संवेदना और प्रतिनिधित्व मूलक पद्धति के रूप में अपनाया था। परंतु उत्तर-औपनिवेशिक हालात में सह-अस्तित्व की जरूरत पूरी दुनिया को अपने-अपने तरीके से महसूस होने लग पड़ी है। हालांकि पश्चिम में उसका स्वरूप हमारे जैसे पूर्व-उपनिवेशों की तुलना में बहुत अलग तरह का है। वहां औपनिवेशिक दौर में जो लोग मेहनत मजदूरी करने या बेहतर रोजगार की तलाश में उस समाज का हिस्सा होने के लिए प्रवासी के रूप में उधर गए, उन्हें पश्चिम ने ‘सबाल्टर्न’ की तरह आत्मसात करने की कोशिश की। इससे वहां मुख्यधारा का समाज वर्चस्व में बना रहता है, परंतु वह दूसरों के लिए भी थोड़ी जगह खाली करने लगता है। हालांकि पश्चिम प्रजातंत्र की बात जोर-शोर से करता है परंतु सामाजिक यथार्थ के तल पर वहां ‘सामानता-धर्मी सह-अस्तित्व’ अभी तक ठीक से विकसित नहीं हुआ है। मूल निवासी, काले और ब्राउन लोग तथा प्रवासी उन समाजों में एक हद तक ही बराबरी के हकदार हो पाते हैं।
हमारे यहां स्थितियां अलग तरह की रहीं। हजारों वर्षों से विविध संस्कृतियों की भारत में आवाज आई लगातार दिखाई देती रही है। बहुत सी जातियां अपनी धर्म-संस्कृति के साथ आक्रांता की शक्ल में भी हमारे यहां आई और कुछ समय के लिए उन्होंने हमें गुलाम तक बनाया। वह सब होते हुए भी हमने अपनी मूल संस्कृति को खोया नहीं। कुछ ऐसा हुआ कि हमारा मूल व्यक्तित्व हमारी अपनी सांस्कृतिक चेतना के साथ किसी न किसी रूप में बना और बचा रह गया। जिसे देखकर इकबाल ने लक्ष्य किया था कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। तो इसकी वजह यह लगती है कि हमने विविध संस्कृतियों के साथ सह-अस्तित्व में रहने की कला का बड़े मौलिक रूप में विकास किया। एक हद तक यह हमारी मजबूरी भी रही, परंतु यह अपनी चेतना की गहराई में हमारी आस्था का परिणाम भी था। हमने इसे सीखा। इस आधार पर खुद को एक हद तक बदलने को भी राजी हुए और ऐसा करते हुए हमने सामने वाले को वी थोड़ा-बहुत बदलने के लिए एक वजह दी। हमने दूसरों से उतना ग्रहण किया, जिससे हमारा मूल व्यक्तित्व बचा रहता और ऐसा बहुत कुछ छोड़ा भी, जो हमारे अपने अंतर्विरोध की तरह हमारे रूपांतरण में बाधक था।
हमारे बहुत से समाजशास्त्रीय चिंतक और आलोचक इस बात को लेकर अफसोस जाहिर करते हैं कि हमारे यहां जाति व्यवस्था जैसी जो कुरीतियां रही, उस वजह से हमारा सामाजिक विकास रुक गया। उसने हमें एक जड़ समाज में बदल दिया। निम्न जातियों के प्रति घृणा और दमन को बहुत से लोगों ने हमारी गुलामी की वजह तक माना। अपने सामाजिक यथार्थ को देखने-समझने का यह एक तरीका ज़रूर है, परंतु वह आधी बात की तरह हमारे सामाजिक अंतर्विकास की सामर्थ्य को झुठलाने से ताल्लुक रखने वाला एक नकारात्मक पहलू भी है। इसका दूसरा पहलू यह है कि हमारी मुख्यधारा की संस्कृति कितना बदली। उदाहरण के लिए मुसलमानों के भारत में आने के बाद, सभी धर्मों से ऊपर उठी हुई किसी तात्विक या बुनियादी चेतना की बात हमारे यहां प्रकट हुई। गोरखनाथ ने मंदिर और मस्जिद, मुसलमान और हिंदू दोनों ध्रुवों को नकारते हुए सबको योगी होने का रास्ता दिखाया। इससे हमारे समाज में मुसलमान जोगियों की भी एक लंबी कतार दिखाई देने लगी।
सह-अस्तित्व को इतनी गहरी चेतना और उच्चतर संस्कृति का विमर्श प्रदान करने के लिए हमारे यहां जो जमीन खुली, वह संभव है, पूरे विश्व में अद्वितीय है। मार्क्सवादी चिंतन के असर में हमारे आधुनिक और उत्तराधुनिक चिंतन में मुख्यधारा और अन्यों के बीच संघर्ष की बात को अधिक महत्व दिया गया। दो पक्षों के बीच संवाद की स्थिति तथा उनके सह-समांतर अस्तित्व वाले यथार्थ की मौजूदगी को अक्सर नजरअंदाज किया गया। पर आप भारत के सामान्य व्यक्ति को देखिए, उसके मन में शैव और वैष्णव के बीच ही नहीं, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और यहां तक की गिरजाघर में जाने को लेकर भी कोई गहरा द्वंद दिखाई नहीं देता। उपासना पद्धतियों के भेद हमारे सामान्य समाज को बाहरी भेद लगते हैं। जबकि मनुष्य के तल पर सबके साथ संबंध बनाने और संवाद में हो सकने की बात उनकी चेतना को अधिक संवेदित करती है। यह सब यहां मुमकिन हुआ। इसलिए अगर कोई मुसलमान या अंग्रेज हमारा शासक हो गया, तो भी वह सामान्यतया कभी हमारी चेतना का या हमारे मूल व्यक्तित्व का शासक नहीं हो सका। दूसरों से प्रताड़ित होने के बावजूद हमारे बहुत से लोग उन्हीं के साथ उच्चतर चेतना के धरातल पर संवाद स्थापित करने से कभी पीछे नहीं हटे। अपनी सह-अस्तित्व मूलक संवाद-धर्मिता पर हमारी इस आस्था ने हमें बचाया।
हिंदी आलोचना के तहत साहित्य के विवेचन-विश्लेषण के लिए सह-अस्तित्व को एक कारगर औजार की तरह इस्तेमाल करने के विचार तक मैं लीलाधर मंडलोई की एक लंबी कविता ‘प्रेम ध्रुपद’ के बहाने से पहुंचा। उसकी मूल संवेदना के पीछे पंडित जसराज की जुगलबंदी का प्रयोग है। जसरंगी का यह प्रयोग अपने आप में बहुत मौलिक है। मुझे लगता है कि वह भारत में ही संभव हो सकने वाली वस्तु है। इसलिए वह स्वरूपतः पश्चिम में प्रकट होने वाले संगीत के ‘फ्यूजन’ से बहुत अलग है। इस पद्धति में दो राग या गायन के दो तरीके एक दूसरे के साथ ‘फ्यूज’ होकर एक अन्य राग या पद्धति का निर्माण नहीं करते। वह रास्ता विविधताओं के समन्वय का रास्ता है, जिसकी बात पश्चिम बड़े फख्र के साथ करता है। हमारे यहां वह बात कुछ अलग तरह से आई थी – दुई को परे हटाकर अद्वैत में चलांग लगाने की तरह। वह हमारी मध्यकालीन विश्व-दृष्टि के भीतर से प्रकट हुआ प्रयोग था। तथापि अब उत्तर औपनिवेशिक हालात में हमारे यहां जो यह जसरंगी जैसे नए प्रयोग हो रहे हैं, वे मुझे सांस्कृतिक चेतना और अंतर्दृष्टि के लिहाज से अतीत के मुकाबले बहुत आगे की चीज लगते हैं। यह प्रक्रिया ऐसी है कि इसमें आखिरकार जो ‘एक’ नहीं दोनों साथ-साथ बचते हैं। वह किसी एक तरफ झुकी हुई चीज नहीं है। ऐसा होता है कि दोनों का अस्तित्व बराबरी के धरातल पर बचा रह जाता है।
जबकि पश्चिमी ‘फ्यूजन’ में वह जो ‘दो’ को ‘तीसरे’ में विलय करने की बात है, वह आखिरकार तीसरे के वर्चस्व से संबंधित लगती है। जबकि जसरंगी में एक अलग प्रयोग किया गया। यहां स्त्री और पुरुष दो अलग रागों को एक साथ गाते हुए अपने अस्तित्व को पूरी तरह महफूज रखते हुए आखिरकार एक ऐसी जगह पहुंचते हैं, जहां दोनों के बीच संवाद घटित होता है। किसी का दूसरे के पक्ष में विलय नहीं होता।
इस तरह के सह-अस्तित्व में कोई अन्य नहीं है। दोनों बराबर है। वे वर्चस्व की भाषा ना बोलते हुए समान-धर्मी संवाद की भाषा बोल रहे होते हैं। यह ‘फ्यूजन’ से एकदम अलग और विरल घटना है। इसी तरह का एक और शब्द ‘इंक्लूजन’ भी है। पश्चिम में इसकी भी काफी चर्चा होती है। नई तरह की पारिभाषिक शब्दावली को गढ़ने की प्रक्रिया में पश्चिम अब ‘समायोजन’ और ‘सहयोजन’ जैसे जिन शब्दों की खोज कर रहा है, उनमें चीजों या व्यक्तियों के मूल व्यक्तित्व को किसी अन्य सांचे में ढालने की बात ही अधिक है। जबकि सह-अस्तित्व का हमारा जो विचार है वह विविधताओं को उनके मूल रूप में स्वीकार करने की बात करता है। जैसे एक बगिया है वहां हजार तरह के फूल हो सकते हैं। छोटे भी बड़े भी। सबका सौंदर्य अद्वितीय है। किसी को भी किसी अन्य के पक्ष में कमतर सिद्ध करना या खारिज करना सही नहीं है। सब में आपको कुदरत की अपरिसीम कारीगरी दिखाई दे सकती है। तो सभी जैसे हैं, उनको इस रूप में स्वीकार करते हुए हम अगर बगिया के समूचे रूप की परिकल्पना करते हैं, तो वह सह-अस्तित्व है।
परंतु हमारे समाज और संस्कृतियों कभी इस तरह की आपसदारी या जुगलबंदी को हकीकत बनाने की हद तक आमतौर पर नहीं जाती हैं। वर्चस्व की भाषा हमारे भीतर इतने गहरे में उतर गई है कि ‘अन्य’ के साथ हमारे रिश्ते बराबरी के धरातल पर कहने भर के लिए ही घटित होते हैं।
यहां सवाल यह है कि जिसे हमने अपने सामाजिक राजनीतिक और सांस्कृतिक यथार्थ के तल पर सह-अस्तित्व की तरह खोजा है उसे हमारी आलोचना अपनी एक जरूरी अवधारणा के रूप में विकसित क्यों नहीं कर पाई है? गौरतलब है कि रामचंद्र शुक्ल मुख्य तौर पर पहली परंपरा की बात करते हैं। साहित्य के धरातल पर उनके महानायक तुलसीदास ‘नानापुराण निगमगम सम्मत’ समझ के विकास को कसौटी बनाते हैं। बकौल नामवर सिंह, हजारी प्रसाद द्विवेदी दूसरी परंपरा के आलोचक हैं। ‘अशोक के फूल’ में हजारी प्रसाद द्विवेदी स्पष्ट करते हैं कि यह दूसरी परंपरा अवैधिक है और वही हमारे साहित्य की बुनियादी सौंदर्य चेतना का आधार है। तो एक वैदिक परंपरा है और दूसरी अवैदिक। भरत मुनि का ‘नाट्यशास्त्र’ चार वेदों वाली परंपरा के सार को पांचवें वेद की तरह सामने लाने की कोशिश करता है। पांचवें वेद के सौंदर्य विधान को वह लोक से ग्रहण करता है। भरत मुनि साफ कहते हैं कि अभिनय देवों के बस की बात नहीं है। नामवर सिंह इन दोनों परंपराओं को आमने-सामने रखते हैं। परंतु उनका विवेचन दूसरी परंपरा के पक्ष की ओर अधिक झुक जाता है। वहां इन दोनों परंपराओं के बीच संवाद के लिए गुंजाइश तो है, परंतु वह सह-अस्तित्व वाली स्थिति तक नहीं पहुंचती। तो चाहे रामचंद्र शुक्ल का लोक मंगलवाद हो, या हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामबर सिंह का जन अथवा श्रमिक केंद्रित लोकवाद हो, दोनों किसी न किसी तरफ अधिक झुकते हुए साफ दिखाई दे जाएंगे। जबकि हमारा जो वास्तविक लोक है और लोक ही नहीं, सामान्य रूप में पूरे समाज की जो सांस्कृतिक चेतना है, उसमें किसी एक और अधिक झुकाव की बात उतनी नुमाया होती दिखाई नहीं देती। आप भारत के पूरे सांस्कृतिक इतिहास को उठा लीजिए। शुरुआत वेदों से ही करते हैं। हम उन्हें धार्मिक ग्रंथ से अधिक सांस्कृतिक चेतना के स्रोत काव्य की तरह देखेंगे, तो उनके साथ अधिक न्याय होगा। वेदों की एक संहिता के रूप में जो मूल संरचना है, वह क्या है? वहां आप देखिए कि बहुत से सूक्त एक साथ उपस्थित हैं। हर एक सूक्त का एक देवता है। जब आप किसी सूक्त को पढ़ते हैं, तो लगता है, उसका अधिष्ठाता देवता सर्वोपरि है। फिर वह चाहे अग्नि हो, इंद्र हो, वरुण हो, बृहस्पति हो या विष्णु हो, या कोई और, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अपने-अपने क्षेत्र और अपनी-अपनी जमीन के धरातल पर उनके बराबर कोई दूसरा नहीं। परंतु उनके बीच सामान्यतया किसी तरह का संघर्ष नहीं है। वे अपनी श्रेष्ठता को अन्यों पर वर्चस्व की तरह स्थापित करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते। वे सभी अपने-अपने तौर पर स्वीकार्य भी है और श्रेष्ठ भी। वेदों की खूबसूरती यह है कि वे सब अगल-बगल उपस्थित हैं। वे सभी एक ही संहिता के हिस्से हो गए हैं। यह बात अगर आज की दुनिया के किसी विमर्श के संदर्भ में होती, तो बड़ी अटपटी मालूम होती। लेकिन भारतीय चित्त ने सब की श्रेष्ठता के सह-अस्तित्व को सहज रूप में कबूल किया है। तो यह जो सबको बराबर की अहमियत देने से जुड़ी हमारी दृष्टि है, उसे हम भारत की बुनियादी चेतना का पर्याय मान सकते हैं। सही मानों में भारत की आत्मा इसी चेतना में निवास करती है।
फिर बारी आती है, आलोचनाशास्त्र की रचना की। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र इसकी भूमिका बनाता है। उसमें चारों वेदों का सार भी है और लोक का सौंदर्य भी। देवों की बेहतरीन बातें भी है और असुरों की कलाएं भी। किसी का निषेध नहीं है।
भले ही आज हम हिंदू परंपराओं को एक दूसरे के विरोध में देखने लग पड़े हों, पर भरत मुनि के लिए दोनों उनके ‘नाट्य शास्त्र’ में सह-अस्तित्व में हैं।
अब हम भारतीय काव्यशास्त्र तक आ सकते हैं। रस, अलंकार, वक्रोक्ति, ध्वनि, औचित्य आदि के विवेचन को आधार बनाते हुए हमने हिंदी के अपने काव्यशास्त्र की जो व्याख्याएं की हैं, वे काफी अपर्याप्त हैं। बुनियादी सवाल यह है कि वे अपने इन सिद्धांतों के आधार पर साहित्य के मर्म तक पहुंचने के लिए कौन सा रास्ता निकाल रहे थे?
साहित्यिकता (लिटरेरीनेस) की व्याख्या एक कठिन कार्य है। जब हम यह कहते हैं कि वह भाषा केंद्रित है या रस केंद्रित है, तो हम अपनी रचनाशीलता के प्रश्न के भीतर प्रवेश करने की बजाय, उसका सरलीकरण ही अधिक कर रहे होते हैं। रचनाशीलता का अर्थ है यथार्थ का भाषा में रूपांतरण, आत्मसातन और नव विकास। यह खुद को और दुनिया को नया बनाने के तरीके खोजने जैसी बात है।
अब चूंकि साहित्य कर्म ही भाषा केंद्रित है, तो इसे हम यहां भाषा की व्याख्या के जरिए ही करते हुए दिखाई देते हैं। तो बुनियादी सवाल यह है कि भाषा में हम जब रस, सौंदर्य या व्यंजना को रचनाशीलता के पर्याय के रूप में देखते हैं, तो दरअसल हम यह खोज रहे होते हैं कि भाषा के जरिए भाषा के पार कैसे उतरा जा सकता है। वह जो भाषा में बंध गया है, वह हमारे सामने है। पर उसकी व्याख्या करने भर से हमारा काम नहीं चलता। साहित्य उसकी भी बात करता है, जो भाषा में बंधता-बंधता रह गया है – वह जो भाषा में उतरा है, पर भीतर के किसी अबूझ क्षेत्र से। जैसे आप शरीर के भीतर गहरे में उतरते हैं, कई दफा ध्यान गहरे में डूबता है, तो रस की अनुभूति होती है। इसलिए कुछ लोग रस को आत्ममानुभूति के साथ जोड़ते भी दिखाई दिए। अभिनव गुप्त, मम्मट और जगन्नाथ जैसे लोग इस दिशा में आगे बढ़े, परंतु उससे काव्य रहस्य हो गया और अमूर्त का खिलवाड़ भर बनकर रह गया। जबकि रास्ता दूसरा था। वैदिक साहित्य की व्याख्या के संदर्भमें इस रास्ते की बात सामने आई थी। वहां जो उक्त है, उसे ठीक से समझने के लिए निरुक्त का सहारा लेने की बात कही गई थी। इसका मतलब यह है कि हर शब्द में कुछ उक्त होता है और कुछ निरुक्त उसके साथ जुड़ा हुआ वहीं मौजूद हो सकता है।
भाषा उक्त और निरुक्त के सह-अस्तित्व का नाम है। साहित्य उक्ति या अभिव्यक्ति को इस रूप में हमारे सामने पेश करता है कि निरुक्त भी उघड़ आता है।
इसका मतलब यह है कि आलोचना शास्त्र और भाषा दर्शन के तल पर हमारे यहां विवेचन के सह-अस्तित्व मूलक औजार आरंभ से ही उपस्थित रहे हैं। यह हमारी बदकिस्मती है कि हमने पश्चिम के नजरिये से अपने शास्त्र की जो व्याख्या की है उसके असर के कारण हम अपनी चीजों की ही सही-सही व्याख्या करने से चूकते रहे हैं। इस संदर्भ में हम वेदों के उस सूक्त की ओर देख सकते हैं, जिसे वाग्देवी का सूक्त कहा जाता है। वाक् की देवी कहती है कि भाषा के चार चरण होते हैं, परंतु मनुष्य एक ही चरण की भाषा बोलते हैं। तीन उसके बोलने में नहीं आते। हमने साहित्य की प्रतिमा तो वाग्देवी या सरस्वती के रूप में गढ़ और रच ली है, परंतु वह क्या कहती है इस तरफ हमारा ध्यान करीब-करीब नहीं जाता। भाषा के जो तीन चरण अव्यक्त रह जाते हैं, उन तक पहुंचने का रास्ता वाक् है। साहित्य इस वाक् की साधना है। वाक् के तल पर जब व्यक्त और अव्यक्त का सह-अस्तित्व होता है, तो समझिए कि सही माने में साहित्य की रचना हुई।
वाग्देवी ने अव्यक्त के जो तीन चरण बताए थे उन्हें भरतृहरि केवल एक परा-वाक् के रूप में देख पाए, क्योंकि उनका भाषा में सम्यक विवेचन संभव ही नहीं था। भाषा क वह जो अव्यक्त रूप है, वह चराचर की भाषा की तरह सर्व व्याप्त है। सृष्टि का हर कण बोल रहा है। ऊर्जा की एक-एक तरंग और खाली आकाश तक किसी रहस्य में ध्वनि से भरा हुआ है। वाक् से कुछ भी खाली नहीं। पर यदि हम भाषा का ठीक-ठीक इस्तेमाल कर पाए तो भाषा के उन अव्यक्त रूपों के साथ भी हमारा रिश्ता जुड़ सकता है। वह जुड़ सकता है, क्योंकि वह हमारे द्वारा बोली गई भाषा से अलग चरण नहीं है। वह उसी के साथ सह-अस्तित्व में है।
पर अब हम लोग अपने साहित्य के वाक् पर केंद्रित होने की बजाय पश्चिम से आए हुए भाषा दर्शन और आलोचना-शास्त्र के अधिक प्रभाव में दिखाई देते हैं। हम ऐसे साहित्य की रचना कर रहे हैं, जो शायद हमें विश्व कवि तो बना सकता है, परंतु हमें दृश्य जगत या ज्ञात संसार के परिदृश्य के भीतर ही सीमित रखने का काम भी करता है। दृश्य और ज्ञात की भाषा अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है, परंतु जिसे हम अपने संस्कारों के भीतर पड़ी हुई भाषा के वाक् की तरह देख सकते हैं, वह उसके मुकाबले में कहीं अधिक व्यापक और गहन है। हमारे पास वाक् और बोलचाल की सामान्य भाषा के सह-अस्तित्व वाले आलोचना शास्त्र की समृद्ध जमीन मौजूद है, परंतु उसका अंतर्विकास करना होगा। सवाल यह है कि क्या हम इसके लिए प्रस्तुत हैं?
-डॉ विनोद शाही

परिचय
आलोचना व विमर्श : साहित्य के नए प्रतिमान, भारतीय सभ्यता का आत्म-संघर्ष, भारतीय भाषा दर्शन, मार्क्सवाद और भारतीय यथार्थवाद, प्राच्यवाद और प्राच्य भारत, हिंदी साहित्य का इतिहास, हिंदी आलोचना की सैद्धांतिकी, कथा की सैद्धांतिकी, संस्कृति और राजनीति, रामकथा, आलोचना की जमीन, जयशंकर प्रसाद, बुल्लेशाह, समय के बीज आख्यान, वारिसशाह पतंजलि योग दर्शन, कालजयी उपन्यास, नव इतिहास दर्शन, नव काल विभाजन, नव लोक संस्कृति विमर्श, भाषा दर्शन और हिंदी, डी डी कोसंबी।
संपादन: जगदीश चंद्र रचनावली ( चार खंड ), तमस, गांधी और हिंद स्वराज, भगत सिंह : इन्कलाबी चिंतन, प्रतिनिधि कहानियां: एस आर हरनोट, भालचंद्र जोशी और राजकुमार राकेश।
उपन्यास: ईश्वर के बीज और निर्बीज
कहानी संग्रह: इतिहास चोर, अचानक अजनबी, ब्लैक आउट, श्रवणकुमार की खोपड़ी
नाटक: पंचम वेद, झूठ पुराण, जुआघर
काव्य: नये आदमी का जन्म , कवि के मन से (संपादन प्रताप सहगल)
सम्मान व पुरस्कार: रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान, शिरोमणि साहित्यकार सम्मान,वनमाली कथा आलोचना सम्मान , राजस्थान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति का समय माजरा आलोचना सम्मान, ‘पंचम वेद’ के लिये अवितोको नाटक लेखन प्रेरणा पुरस्कार, आकाशवाणी पुरस्कार तथा आकाशवाणी पुरस्कार , जुआघर (एक हत्या की हत्या) और ‘झूठ पुराण’ के लिये साहित्य कला परिषद पुरस्कार
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