1.वे जानते हैं
वे जानते हैं
अनजान नहीं हैं
या जानना नहीं चाहते
हमारी मानवीय गरिमा के हनन की पीड़ा
जब अबोध बच्चे इन्द्रजीत मेघवाल को
पीटा जाता है
अछूत जाति के कारण
जान चली जाती है उसकी
सवर्ण टीचर के घड़ा छूने भर से
वह नहीं जानता था
जाति क्या होती है?
क्या वह अबोध बच्चा
दलित विक्टिम कार्ड खेल रहा था?
क्या उसके माता-पिता के आँसू
रोना-धोना भर थे?
यदि उनके बच्चों के साथ भी ऐसा ही हो
तब भी वे यही कहेंगे
हम विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं?
या रो धो रहे हैं?
जब किसी गाँव में आज़ादी के बाद भी
आज तक
दलित प्रशिक्षु डॉक्टर रतन मेघवाल
कभी पायल तड़वी या
कभी रोहित बेमुला को
आत्महत्या के लिए उकसाया जाए
जातिगत अपमान किया जाए
होते रहे अनेक डॉक्टर-इंजीनियर
जातिगत उलाहनों से उलझे
कटते रहे हैं उनके इंटरनल नंबर
होता रहे उनका करियर बर्वाद
किसी ने नहीं सुनी थी
उनकी गुहार
तप गये थे वे जातिगत अपमान की भट्टी में
ख़ुशी से कोई नहीं बढ़ाया था
ऐसा कदम
वे पढ़े- लिखे, सोचे- समझे बच्चे
देख-समझ रहे थे
मौलिक अधिकारों का होता हनन
परन्तु वे विवश थे
नहीं थे उनके आगे-पीछे
मज़बूत बैकग्राउंड
सिर्फ़ उनकी मेहनत
यहाँ तक लाई थी
परिवार ने सपने देखने शुरू किये थे
जैसे सपनों के बीच में नींद उड़ गयी हो
उनके होश ही उड़ गये थे उस वक़्त
अपने होनहार बच्चों को खोकर
क्या ये बच्चे भी जान देकर
विक्टिम कार्ड खेल रहे थे?
क्या इनके माता-पिता के आँसू
घड़ियाली थे?
यदि यही सब उनके बच्चों के साथ होता
तब भी वे यही कहते
हम विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं?
हमारे आँसू घड़ियाली हैं?
एक नहीं दो नहीं
हज़ारों वर्षों तक
हज़ारों जातिगत उत्पीड़न की घटनाएँ
हमें सोने नहीं देतीं
और वे कहते हैं
हम विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं ।
जब हमें अपनी ख़ुशियों को
मनाने का हक़ न मिले
तब वे क्या कहेंगे?
जब आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी
दलित दूल्हे घोड़े पर चढ़ कर
अपनी बारात में नहीं जा सकते
या पुलिस के संरक्षण में बारात निकालनी पड़े
क्या तब भी वे दलित विक्टिम कार्ड
खेल रहे होते हैं ?
यदि उनके साथ भी ऐसा हो
तब भी वे यही कहेंगे
हम विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं?
या यह हमारे घड़ियाली आँसू हैं?
जब स्कूलों में दलित भोजन माताओं के
हाथ का बना भोजन खाने से
छात्र और शिक्षक मना कर दें
तब भी वे यही कहेंगे
अछूत भोजन माताएं विक्टिम कार्ड खेल रही हैं?
या उसका दर्द, उसका मान-सम्मान
रोना -धोना भर है?
यदि उनके साथ भी
ऐसा ही हो
तब भी वे यही कहते रहेंगे
हम विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं ?
हमारे आँसू घड़ियाली हैं ?
ये दलित का जीवन नहीं
सिर्फ़ कुछ नमूने हैं
असली दर्द तो
उनका अव्यक्त है
मगर अदृश्य नहीं है
हम सब देख सकते हैं
मगर देखना नहीं चाहते,
हम उनका जीवन बदल सकते हैं
उन्हें न्याय दे सकते हैं
बर्शते मन न्याय प्रिय और संवैधानिक हों।।
2.युद्ध और बच्चा
डर से सहमा हुआ
बच्चा देख रहा है
कनकी से
स्कूल की झरझराती दीवारों और छतों को
किताबें खोलता है
कॉपी में लिखना चाहता है
कल का पाठ
पूरा करना चाहता है होमवर्क
मगर-
उसकी आँखों के समक्ष
धुआँ-धुआँ फैलता है
कानों में गोलियों की
गूँजती हैं आवाज़ें,
बच्चा सहम जाता है
पढ़ना चाहता है
सिर्फ़ किताबें नहीं
पूरा संसार और विकास
इंसानियत का पाठ
मगर-
बच्चा डर से
सहमा हुआ है
घर लौटता है
किताबें उठाता है
पढ़ता है कंबल में मुँह छिपा कर
डर भुलाना चाहता है,
बिखेरता है चेहरे पर मुस्कान
माँ-पिता देखकर उसे
मुस्करा देते हैं
बच्चे की उम्मीद से,
फिर दूर से आती
सुनाई देती है
मशीनगनों की आवाज़ें
बच्चा फिर से
डर से सहम जाता है
डर पर क़ाबू करना चाहता है
लड़ता है स्वयं से
अपने हौसलों से
भूख से
प्यास से
आसपास के भयावह वातावरण से
मगर-
वह युद्ध से
लड़ना नहीं चाहता
डर से सहमा हुआ बच्चा ।।कुछ युद्ध मशीनगनों
और बारूदों से नहीं होते हैं
कुछ युद्ध शब्दों से भी
होते हैं
मनोविज्ञान से भी होते हैं
शूद्र- अछूतों ने देखे हैं
शब्दों और मनोविज्ञान से होते युद्ध
और उनके परिणाम भी।।
3.दलित साहित्य
दलित साहित्य की
रचनाएं दिखाती हैं
समाज का चेहरा
जिसमें दिखतें हैं
अनेक जातिगत
असमानता के गड्ढे
ये रचनाएँ
अपील करती हैं
उन गड्ढों को
दुरुस्त करने की
जिससे देश के विकास की
गाड़ी दौड़ सके
बिना किसी
झटकों के,
दलित साहित्य की
रचनाएं दिखाती हैं
दलितों के
संघर्षों का इतिहास
मनुष्यता के लिए जूझते
अस्तित्व को बचाते
अस्मिता को तलाशते
उनकी बहादुरी
हमें शिक्षित करती हैं
हमें सुधरने का
संकेत करती हैं
ये रचनाएँ बताती हैं
हमारी सोच को
समाज रूपी
असमानता के कुरूप चेहरे को
दिखाती हैं
अवसर देती हैं
गोरों की तरह
कालों के प्रति किए जुल्मों की
माफ़ी माँगी जाए
ये रचनाएँ सिर्फ़
चेहरा नहीं दिखातीं
भाईचारा, बराबरी
मानवीयता के पाठ का
संदेश देती हैं
दलित साहित्य की
रचनाएं हमें सिखाती हैं
राष्ट्र की संपद्दा पर
बराबर का हक है
समान विकास
समान योगदान करने का
उन्नति का
भाईचारे का
देश प्रेम का
पाठ पढ़ाती हैं
दलित साहित्य की रचनाएं
–रजत रानी मीनू
______________________________________________________________________________________
परिचय
रजत रानी मीनू
प्राध्यापिका, हिंदी विभाग, कमला नेहरू महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
प्रख्यात चिंतक कवि व लेखक


