संस्मरण

शकुंतला दी– एक संस्मरण

वर्ष 1969, जुलाई के दिन थे। बारिश के बाद के उमस भरे दिन। क्यूंकि स्कूलों/कॉलेजों  की गर्मियों की छुट्टियाँ चल रहीं थी, हम सभी भाई-बहन घर पर ही थे- मैं, मेरा छोटा भाई हरीश और मेरी तीनों बहनें, आदर्श, रेनू और मधु, जो सब मुझसे बड़ी थीं। पिताजी ऑफिस जा चुके थे, वे सुबह 9 बजे तक घर से निकल ही जाते थे। मेरी माँ अपने सुबह के सब काम, जैसे कि पिताजी को चाय-नाश्ता करवाना, ऑफिस के लिए उनका टिफिन पैक करना, हम सबको नाश्ता करवाना और खुद नाश्ता करना इत्यादि, निपटा कर फ्री हो चुकी थी और अब अपने आगे की दिनचर्या में लगने की तैयारी कर रही थी। पिताजी के ऑफिस जाने के बाद उनका प्रमुख काम होता था कपड़ों की सिलाई करना जिसे वे आंशिक रूप से घर की आमदनी बढ़ाने के लिए करती थीं। 

दोनों बड़ी बहनें आदर्श और रेनू भी रसोई तथा घर के कुछ अन्य कामों में माँ का हाथ बटाने के पश्चात्, अपनी-अपनी पढ़ाई में लगी हुईं थीं। आदर्श कॉलेज में द्वितीय वर्ष की छात्रा थी और रेनू शायद दसवीं या ग्यारवीं कक्षा की छात्रा थी। मैं, मेरा छोटा भाई हरीश और हमारी बहन मधु, घर के सबसे छोटे बच्चे, लूडो खेलने में व्यस्त थे, यद्यपि बीच-बीच में माँ दो-तीन बार आकर हमें टोक चुकी थी कि खेल तो बाद में भी हो सकता है, पहले अपना होम-वर्क पूरा कर लो। आज 9 तारीख़ हो चुकी है और 15 को स्कूल खुल जाएंगे। होम वर्क पूरा नहीं हुआ तो स्कूल में डांट पड़ेगी। पर हम हर बार उन्हें यह आश्वासन दे कर टाल रहे थे कि बस यह आख़िरी गेम है। गर्मियों की छुट्टियों में दोपहर के समय तक अक्सर ऐसा ही माहौल रहता था घर में!

आज धूप काफ़ी तीखी और चुभने वाली थी। माँ अक्सर धूप में बाहर जाने के लिए मना करती थी। ऐसे में हम दोनों भाई, मैं और हरीश, जो अपनी सभी बहनों से छोटे थे, मन मारकर, घर में ही कोई न कोई खेल खेलकर, जैसे कि लूडो, कैरम बोर्ड वगैरह, अपना समय बिताते थे और इसमें हमारे साथ अक्सर शामिल हो जाती थी बहनों में सबसे छोटी, पर मुझ से बड़ी बहन मधु। आज का दिन भी गर्मियों की छुट्टियों के किसी सामान्य दिन जैसा ही था, कुछ अलग नहीं, कुछ नया नहीं। हमारे खेल में हम में से किसी के पासे पर अंक 6 आ जाने पर उसकी  ख़ुशी की किलकारी, किसी की गोटी कट जाने पर उसका गुस्से में बिदक कर गोटी काटने वाले पर बेईमानी करने के आरोपों की बौछार, और बाक़ी दोनों का उसकी मान-मुनव्वल करने के प्रयासों से उठने वाले शोर का घर में हर कोई आदी  था। और माँ की सिलाई मशीन के चलने की लयबद्ध आवाज़ के तो हम सभी आदी थे ही। माँ केवल महिलाओं के ही कपड़े सिलती थीं और उनकी ग्राहक थीं आसपास के मोहल्लों में रहने वाली गृहणियां। जब कभी उनमें से कोई कपड़े देने-लेने के लिए हमारे घर आतीं तो उनकी आपसी बात-चीत, सलाह-मशवरे की बातें तथा हंसी-ठट्ठे की आवाज़ें भी हमारे घर के माहौल का अभिन्न अंग थीं। उस दिन भी सब कुछ ऐसा ही चल रहा था, यथावत! पर वह दिन दरअसल हर रोज़ जैसा बिल्कुल नहीं था; वह दिन, 9 जुलाई 1969, बुद्धवार, हमारे परिवार के लिए क्या लेकर आने वाला था, हम में से किसी ने कभी सोचा भी न था!

उस समय सुबह 10-10.30 का वक़्त रहा होगा कि अचानक किसी ने हमारे घर का दरवाज़ा खटखटाया और इतनी ज़ोर से खटखटाया कि हम सभी चोंक गए। “कौन है”, मेरी माँ ने कमरे से ही आवाज़ दी, हम सब भी खेल छोड़कर खड़े हो गए। ‘ये कौन है जो इतनी ज़ोर से दरवाज़ा खटखटा रहा है’ यह कहते हुए मेरी बड़ी बहन आदर्श कमरे से बाहर आई और उसके पीछे-पीछे रेनू भी! पर दरवाज़े पर दस्तक देने वाला लगातार पूरी ताक़त से दस्तक दिए जा रहा था। यह सब हैरान करने वाला भी था और डराने वाला भी! आदर्श को आँगन पार करके दरवाज़े तक पहुँचने में मुश्किल से एक मिनट ही लगा होगा, तब तक माँ समेत घर के सभी सदस्य आँगन में आ चुके थे। आदर्श ने अपना संयम बनाए रखा और ये कहते हुए ‘कौन है भाई’, दरवाज़ा खोल दिया। दरवाज़ा खुला तो हैरत और बढ़ गई! दरवाज़े पर मेरी सबसे बड़ी बहन नरेश और उनके पति लेखराज जी थे!!

इस से पहले कि कोई उनसे कुछ पूछता, वे दोनों बदहवास से अन्दर आ गए और जीजा जी तो आँगन में रखी चारपाई पर लगभग गिर ही पड़े और दहाड़ें मारकर रोने लगे! कुछ ऐसा ही हाल नरेश दीदी का भी था। वे भी माँ से लिपट कर बेतहाशा रोने लगीं। वे दोनों ही रोते-रोते कुछ बताने की कोशिश कर रहे थे, पर हम में से किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। बड़ी मुश्किल से, लगभग 5-10 मिनट के बाद, जब दोनों की हालत थोड़ी सामान्य हुई तो नरेश दीदी सुबकते हुए बोली ‘गुड्डी नहीं रही’। लेखराज जीजा जी भी अपने ऊपर थोड़ा नियंत्रण करते हुए बोले कि गुड्डी हम सब को छोड़ कर, हमेशा-हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गई। यह सुनते ही हम सब सकते में आ गए। ‘क्या कह रहे हो’ माँ, अविश्वासपूर्वक बोली, ‘ये कैसे हो सकता है, अभी दो हफ्ते पहले ही तो वो यहाँ आई थी और हम सब से मिल के गई थी। तब तो बिल्कुल ठीक-ठाक थी, ये कैसे हुआ?’ जीजा जी ने रेनू को इशारे से, मुझे और मेरे छोटे भाई हरीश को अन्दर कमरे में ले जाने को कहा। उस समय मेरी उम्र लगभग 11 वर्ष थी और हरीश मुझसे 2 वर्ष छोटा था। दीदी और जीजा जी ने हमारे जाने के बाद बाकी सबको जो बताया वह बहुत भयानक था! और वाकई अविश्वसनीय भी!! माँ और मेरी सभी बहनें फूट-फूट कर रोने लगीं और उन्हें रोते देखकर हम दोनों भाई भी रोने लगे, यद्यपि हमें अभी पूरी बात समझ में नहीं आई थी।

गुड्डी हमारी बड़ी बहन का नाम था जो नरेश दीदी से तो छोटी थीं, पर हम शेष भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। पाँच बहनों और दो भाईयों के परिवार मेँ हम दोनों भाई सबसे छोटे थे। सबसे बड़ी दोनों बहनों नरेश और शकुंतला का विवाह हो चुका था। संयोग से उन दोनों ही का विवाह दिल्ली के करीब ही हरियाणा के एक शहर फरीदाबाद में हुआ था। शेष हम सभी भाई-बहन अभी स्कूल/कॉलेज में ही पढ़ते थे। शकुंतला का ही घर का नाम गुड्डी था। उनके विवाह को अभी दो वर्ष भी पूरे नहीं हुए थे और उनकी एक नन्ही सी बिटिया थी, जो शायद उस समय पाँच-छह महीने की ही रही होगी। शकुंतला दी की मृत्यु का समाचार वाकई बहुत बड़ा सदमा था पूरे परिवार के लिए। और जो कारण उनकी मृत्यु का सामने आया था वो बहुत ही भयावह था।

पता चला कि उनकी मृत्यु एक ट्रेन से टकराने से हुई थी। ट्रेन से टकरा कर? कोई ट्रेन से कैसे टकरा सकता है भला! साइकिल, स्कूटर, कार, बस इत्यादि से टकराने की बात तो समझ आती है क्यूंकि ये सब वाहन तो सड़क पर चलते हैं और कोई व्यक्ति सड़क पर चलते हुए या उसे पार करते हुए, अपनी या वाहन चलाने वाले की गलती से उन से टकरा सकता है। पर ट्रेन! ट्रेन तो अपनी पटरी पर चलती है! उससे तो कोई तभी टकराएगा न जब वह ट्रेन की पटरी पर जाएगा! तो फिर वह ट्रेन से कैसे टकरा गई। यह सवाल सब के दिमाग में घूम रहा था, पर जवाब किसी के पास नहीं था।

नरेश दीदी और उनके पति, हमारे जीजा लेखराज जी दोनों ही दिल्ली में नौकरी करते थे तथा प्रतिदिन ट्रेन से अप-डाउन करते थे। उस दिन भी वे प्रात: लगभग आठ बजे घर से निकल कर लगभग 9-9:30 बजे तक अपने-अपने ऑफिस पहुंचे ही थे कि जीजा जी को फरीदाबाद से किसी रिश्तेदार ने फोन कर के इस दु:खद घटना के बारे में बतलाया। उन दिनों मोबाइल फोन की तो शायद कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था, घर में लैंड-लाइन फोन की सुविधा भी किसी विरले के पास ही होती थी! हाँ, दफ्तरों मे एक आध लैंड-लाइन फोन हुआ करता था । जीजा जी ने तुरंत नरेश दीदी को फोन किया। दोनों के ऑफिस पास-पास ही थे और हमारे घर से भी बहुत दूर नहीं थे। अत:, दोनों शीघ्र ही, लगभग आधे-पौने घंटे में कोई वाहन पकड़ के हमारे घर पहुँच गए थे। पूरी घटना की उन्हें जानकारी नहीं थी, उन्हें बस उतना ही पता था जितना फोन करने वाले ने उन्हें बताया था।

हृदय-विदारक करुण-विलाप की आवाज़ें पड़ोस में रहने वालों ने सुनीं तो वे भी वहाँ आ गए और देखते ही देखते यह दुखद समाचार हमारी गली के हर घर तक पहुँच गया, और शीघ्र ही यह ख़बर आस-पास के मोहल्लों में भी फैल गई जिसके फलस्वरूप, हमारे घर में संवेदना प्रकट करने वाले लोगों का एक तांता सा लग गया। तभी पिताजी भी आ गए। दरअसल नरेश दीदी ने ऑफिस से निकलते वक़्त, पिताजी के ऑफिस में भी फोन कर दिया था और उनके ऑफिस का एक साथी उन्हें अपनी साइकिल पर बिठाकर घर ले आया था, साथ ही उनके ऑफिस के कुछ अन्य साथी भी किसी न किसी तरह हमारे घर पहुँच गए।

पिताजी के आते ही घर में मानो, कोहराम ही मच गया! करुण विलाप के आर्त-स्वर हम बच्चों के दिलों को दहला रहे थे। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह सब कैसे हो गया? सवाल सबके दिमाग़ में थे, जवाब किसी के पास नहीं थे। कुछ समय के पश्चात् घर के बड़े लोग मेरी माँ और पिताजी, नरेश दीदी और जीजा जी, ये सभी फरीदाबाद के लिए निकल गए और मेरी बड़ी बहन आदर्श को बोल गए कि ये ख़बर किसी तरह सभी रिश्तेदारों और अन्य पहचान वाले लोगों तक भी पहुंचा दे। साथ में हिदायत भी दे दी गई कि कहीं अकेली मत जाना, जगमोहन को साथ ले जाना।

हम लोग ओल्ड राजिन्दर नगर में रहते थे। आदर्श की एक मित्र के घर में एक लैंड-लाइन फ़ोन था। उसने उसी के घर जाकर सभी को फ़ोन करने का निर्णय लिया। वह न्यू राजिन्दर नगर में रहती थी, पर उसका घर हमारे घर से बहुत दूर नहीं था। दरअसल ओल्ड राजिन्दर नगर और न्यू राजिन्दर नगर को केवल एक सड़क ही अलग करती थी, शंकर रोड। आदर्श ने रेनू और मधु को हरीश का ध्यान रखने के लिए कहा, और हम घर से निकल पड़े। घर में जो आस-पड़ोस की  महिलाएं उपस्थित थीं, उन्होंने आदर्श को आश्वासन दिया कि चिंता मत करना, जब तक तुम लोग लौट कर नहीं आओगे, कोई न कोई इनके पास रहेगा।

जब हम घर से निकले तो आते-जाते सारे रास्ते, आदर्श मुझे बातों में लगाकर कोशिश करती रही कि मेरा ध्यान इस दु:खद घटना से हटाया जा सके। पर ऐसा हो नहीं पाया। मेरे अंदर जो चल रहा था उस से मैं बार-बार रूआँसा हो आता था। क्या अब मैं कभी गुड्डी दीदी को नहीं देख पाऊँगा? उनकी टक्कर रेलगाड़ी से कैसे हो गई … वो कितनी अच्छी थीं … मुझे कितना प्यार करती थीं … जब मैं छोटा था, तो वो अक्सर मुझे नहलाती थीं … गुसलखाने में कभी कोई कॉकरोच दिख जाता या किसी दीवार पर कोई छिपकली दिख जाती, तो वे कितना डर जाती थीं और मुझे उनके इस प्रकार डरने पर कितनी हंसी आती थी।

कभी-कभी वो मुझे पढ़ाती भी थीं। जब उनकी शादी हुई तो वो मुझे भी साथ ले गईं, शायद किसी प्रथा के तहत! ऐसा नरेश दीदी के विवाह पर भी हुआ था, जब उनकी विदाई हुई थी, तब भी मैं उनके साथ गया था और फिर अपने पगफेरे पर जब नरेश दीदी, जीजा जी के साथ हमारे घर आईं थीं तो मैं उनके साथ ही घर वापस आया था।

इसी तरह के ख्याल मेरे दिमाग में चलते रहे। आदर्श दी ने मुझे क्या कहा, क्या समझाया, मुझे कुछ ध्यान नहीं था, मानो मैं नींद में या बेहोशी में चल रहा था। मेरी तंद्रा तब टूटी जब हम वापस अपने घर पहुंचे। यद्यपि जिस घर में हम फ़ोन करने गए थे, वह हमारे घर से मात्र 10-15 मिनट की दूरी पर था, तो भी हमें वहां जाने में और फ़ोन से रिश्ते-नातेदारों को फ़ोन करने में, काफ़ी वक़्त लग गया था। घर पहुंचे तो देखा कि मेरी बहनें रेनु और मधु तथा छोटा भाई हरीश तीनों उदास बैठे थे। उनकी आँखों और चेहरे से साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि वे काफ़ी देर तक रोते रहे हैं। उनके साथ अभी भी पास-पड़ोस की कुछ महिलायें बैठी थीं और उन्हें सहज करने की कोशिश कर रही थीं। जिन परिचितों को और रिश्तेदारों तक ख़बर पहुंच चुकी थी, उनमें से भी कुछ जो नज़दीक ही रहते थे, हमारे घर पहुँच चुके थे। हम पहुंचे तो सब का ध्यान स्वाभाविक रूप से हमारी ओर हो गया और आदर्श से वो कई प्रश्न पूछने लगे। क्या हुआ, कैसे हुआ, कुछ पता चला; किस-किस को ख़बर हो गई इत्यादि। दुर्घटना कैसे घटी, इसकी तो कोई जानकारी हमें अभी तक थी नहीं, आदर्श ने यह अवश्य बताया दिया कि किस-किस को सूचना दे दी गई है और यह भी कि उनमें से कई लोग गुड्डी दीदी के घर फ़रीदाबाद जाने के लिए निकल गए हैं। अड़ोस-पड़ोस के कुछ लोग जो काफ़ी देर से बैठे थे यह कह कर अपने-अपने घर चले गए कि जब हमारी माँ, पिताजी इत्यादि वापस आ जाएंगे तो वे उनसे मिलने पुन: आ जाएंगे।

कुछ लोग उठ कर गए तो कुछ और लोग, जिन्हें इस दु:खद घटना की सूचना अभी-अभी मिली थी, आ गए। इनमें नरेश, गुड्डी और आदर्श दी की वो सहेलियां जो राजिंदर नगर में रहती थीं वो तो थी हीं, माँ से परिचित अन्य महिलायें और पिताजी के कुछ जानकार भी शामिल थे। उनके बीच इस घटना से संबधित विषयों पर तथा गुड्डी दी के बारे में बातें तो चल ही रही थीं, पर बीच-बीच में कोई न कोई अपने साथ या अपने किसी पहचान वाले के साथ घटे किसी हादसे का ज़िक्र भी कर देता। इसी सब में धूप ढल गई और शाम हो गई। लगभग 6-7 बजे का समय होगा जब माँ, पिताजी, नरेश दीदी, लेखराज जीजाजी और अन्य रिश्तेदार जो फ़रीदाबाद गए थे, वे सब एक साथ ही वापस आ गए। उनकी दशा उस वक़्त से भी अधिक ख़राब थी जब वे फ़रीदाबाद के लिए रवाना हुए थे।

शायद उन की पीड़ा और बढ गई थी! वे अभी भी बेतहाशा रो रहे थे और उनके आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। इधर घर पर उनके लौटने का इंतजार  कर रहे लोग भी बेचैन थे। सभी के मन में कई सवाल कुलबुला रहे थे जिनके जवाब वे जानना चाहते थे। क्या हुआ था, ट्रेन से टक्कर कैसे हो गई। गुड्डी दी क्या अकेली गई थीं रेलवे स्टेशन, या कोई साथ था? स्टेशन पर गई थीं तो कहाँ जाने के लिए? और फिर प्लैटफॉर्म से उतर कर रेलवे ट्रैक पर क्योंकर पहुँच गई। जब हमारे मामा जी के एक बेटे ने, जो फ़रीदाबाद भी गए थे, पूरी घटना का ब्योरा दिया तो सभी हतप्रभ रह गए। जो उन्होंने बताया, वह दिल दहला देने वाला था! उन्होंने बताया कि गुड्डी दी ट्रेन से टकराई नहीं थी, वो ट्रेन के आगे कूदी थीं! उन्होंने स्वयं अपनी जान दी थी, ख़ुदकुशी की थी!! उनका यह वाक्य किसी वज्रपात से कम न था। सभी अवाक रह गए। ख़ुदकुशी! क्यूं? किसलिए? ऐसा क्या हो गया था कि गुड्डी दी ने अपनी जान दे दी? अभी दो हफ़्ते पहले ही तो वह यहाँ आई थी, तब तो उसने अपनी किसी तकलीफ़ के बारे में किसी को कुछ नहीं बताया! कोई तकलीफ़ होती तो ज़रूर बताती! एक पड़ोसन ने कहा कि वह तो हमसे भी मिल कर गई थी और अपनी नन्हीं सी बिटिया के साथ खुश भी नज़र आ रही थी। इस पर आस-पास की कुछ और पड़ोसनों ने भी उनकी हाँ में हाँ मिलाई कि मिलने तो वो हमसे भी आई थी। अचानक ऐसा क्या हो गया कि उसने अपनी जान दे दी? अब सवाल बदल गए थे परन्तु जवाब फिर भी किसी के पास नहीं थे!! यहाँ-वहाँ से, विभिन्न लोगों से मिली जानकारियों को जोड़कर जो पूरी घटना सामने आई, वो कुछ इस प्रकार थी:

फ़रीदाबाद उन दिनों एक छोटा सा शहर था। बहुत बड़ा शहर न होते हुए भी यह एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र था और आस-पास के प्रमुख शहरों जैसे दिल्ली, बदरपुर, पलवल, आगरा इत्यादि से सड़क मार्ग तथा रेलमार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ था। लम्बी दूरी की रेलगाड़ियों के अलावा आसपास के शहरों तक नौकरी, व्यापार तथा अन्य कामों से रेलमार्ग से जाने वाले यात्रियों के लिए फरीदाबाद रेलवे स्टेशन एक महत्वपूर्ण स्टेशन था। अगर उस समय आप पैदल, साइकिल अथवा रिक्शा द्वारा फरीदाबाद में घूमे हों तो आपको कहीं न कहीं खुले रेल-ट्रैक्स दिख जाते थे जिन को आप आसानी से पार कर के ट्रैक के दूसरी तरफ़ जा सकते थे। 9 जुलाई 1969 को वर्किंग डे था। शकुन्तला दी के पति, हमारे जीजा जी, हर रोज़ की तरह उस दिन सुबह भी 9-10 बजे के आस-पास अपने ऑफिस के लिए निकल गए  थे। उनका अपना निजी काम था। वे टाईपिंग और स्टेनोग्राफी का एक ट्रेनिंग सेंटर चलाते थे जहां पर टाईपिंग/स्टेनोग्राफी को अपना करियर बनाने के इच्छुक विद्यार्थी आकर प्रशिक्षण प्राप्त करते थे। उन के जाने के बाद, गुड्डी दी और उनकी सासु मां के बीच जाने क्या बात हुई, क्या कहा-सुनी हुई,  कि गुड्डी दी ने अपनी नन्ही सी बच्ची को गोद में उठाया और जिस हाल में थी, वैसे ही घर से निकल गयीं!!

उनके बीच क्या हुआ था इसकी ठीक-ठीक जानकारी तो किसी को नहीं थी, क्योंकि उस समय घर पर उन दोनों के और छोटी बच्ची के अलावा कोई था ही नहीं। पर हुआ तो कुछ ज़रूर था जो गुड्डी दी को बहुत भीतर तक आहत कर गया! बाद में एक पड़ोसी ने इतना तो बताया कि शकुंतला दी की सास की बहुत ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी परंतु आवाज़ इतनी स्पष्ट नहीं थी कि पूरी बात समझ आ सके। पर हाँ, बीच-बीच कुछ भद्दी गालियाँ भी सुनाई दे रहीं थीं जैसे वो किसी को और उसके परिवार को कोस रही हों। चूंकि उस समय घर में उनके अतिरिक्त गुड्डी दी और बच्ची के अलावा और कोई नहीं था, तो यह स्पष्ट था कि ये सब गुड्डी दी को ही सुनाया जा रहा था। और जब गुड्डी दी घर से निकलीं तो उनकी सास ने शायद उन्हें रोकने की कोशिश भी नहीं की होगी!! कुछ लोगों ने बाद में बताया कि गुड्डी अपनी बच्ची को उठाये बदहवास सी, लगभग भागती हुई ही, सड़क पर दौड़ती हुई बाज़ार की तरफ़ जा रही थी। एक-आध ने उन्हें आवाज़ भी लगाई तो भी वे रुकी नहीं।

बाद में पता चला कि वे अपने पति, हमारे जीजा जी के ऑफिस भी गई थीं, पर उस समय वे ऑफिस के ही किसी काम से थोड़ा बाहर गए हुए थे। शकुंतला दी  वहां थोड़ी देर रुकीं पर शायद उनके अंदर की पीड़ा ने उन्हें ज्यादा इंतजार करने नहीं दिया। वे शीघ्र ही बिना किसी को कुछ कहे तेज़ी से वहाँ से निकल गईं। उसी बदहवासी में वो चलते-चलते पास के एक रेलवे ट्रैक तक आ गयीं और चुपचाप रेल की पटरी के पास खड़ी हो गईं और शायद 5-7 मिनट तक उसी प्रकार खड़ी रहीं। यह एक बिज़ी ट्रैक था और ट्रेन्स का आना-जाना लगा ही रहता था, सो लगभग 5 मिनट में ही दूर से आती एक लोकल ट्रेन दिखाई दी जिसे देखते ही वे सतर्क हो गईं। अपनी बेटी को चूमा, उसे कस के सीने से लगाया, फिर ट्रैक से 5-7 मीटर की दूरी पर सड़क के किनारे मिटटी पर एक समतल जगह को थोड़ा साफ़ किया, और बच्ची को, जिस कंबल में वो लिपटी हुई थी, उसके समेत ही सलीके से सुला दिया और खुद भी उसके पास बैठ कर उसका सर सहलाने लगी।

रेलगाड़ी अपनी गति से चलती हुई, सीटी बजाती हुई आ रही थी। गुड्डी दी की नज़र उस ट्रेन पर टिकी हुई थीं। गाड़ी करीब और करीब आती रही । जब गाड़ी उनसे मात्र 15-20 मीटर की दूरी पर रह गई, तो गुड्डी दी अचानक खड़ी हुईं और तेज़ी से दौड़कर ट्रेन के आगे कूद गईं। गाड़ी की गति बहुत अधिक थी, इतनी अधिक की गाड़ी के ड्राइवर के पास गाड़ी को रोकने की कोई संभावना ही नहीं थी। वे गाड़ी के इंजन के बाएं हिस्से से टकरायीं और छिटक कर दूर जा गिरीं। ड्राइवर ने ब्रेक लगाने की कोशिश तो की, पर चूंकि ट्रेन की स्पीड काफ़ी ज़्यादा थी, वह लगभग 20-25 मीटर दूर जाकर रुकी। ट्रेन के रुकते ही ट्रेन के ड्राइवर और गार्ड दोनों नीचे उतर गए और तेज़ी से पीछे घटना-स्थल की तरफ़ भागे। उन्हें इस तरह भागते देख, कई पैसेंजर भी ट्रेन से नीचे उतर आए। उन्हें शायद किसी दुर्घटना के होने का अंदेशा हो गया था। शायद कुछ यात्रियों ने इस दुर्घटना को होते हुए देख भी लिया हो, पर यह बता पाना मुश्किल है। यह सब देखकर, वहीं सड़क किनारे खड़े कुछ और लोग भी तुरंत वहां पहुँच गए।

देखते ही देखते वहां बहुत से लोग इकट्ठे हो गए और उन्होंने जो नज़ारा देखा, वह रोंगटे खड़े कर देने वाला था। सड़क के किनारे एक साफ़-सुथरे तौलिये में लिपटी हुई, एक नन्हीं सी बच्ची लेटी हुई थी, जो बेतहाशा रो रही थी! पास ही खून में लथपथ एक युवती, झाड़ियों और पत्थरों पर शिथिल सी पड़ी थी। वह अचेत अवस्था में थी या निष्प्राण हो चुकी थी, इसका अन्दाज़ लगाना मुश्किल था। ड्राइवर और कुछ अन्य लोगों ने जो बताया उसके अनुसार घटना का जो वृत्तांत निकल कर सामने आया वह इस प्रकार था:

यह युवती गोद में एक बच्ची को लिए आई, उसने सड़क के किनारे मिट्टी वाली जगह को साफ़ किया और उस पर सोती हुई बच्ची को लिटा दिया, रेलवे ट्रैक के पास गई और फिर अचानक ही दायीं और से आती ट्रेन के सामने छलांग लगा दी। वह पटरी तक पहुँचने से पहले ही ट्रेन के इंजिन से टकरा गई और किसी फ़ुटबाल  की तरह उछल कर पास की झाड़ियों में गिर गई, बच्ची से कुछ ही दूरी पर!

तभी संयोग से मोटर साइकिल पर सवार दो फ़ोजी वहाँ सड़क से गुज़र रहे थे। भीड़ देखकर उन्होंने अपनी मोटर बाइक रोक दी और पूछा कि क्या हो गया, इतनी भीड़ क्यों लगा रखी है। उन्हें जैसे ही घटना के बारे में पता चला, वे  लोग बाइक से नीचे उतरे और झट से घटनास्थल तक गए। खून से लथपथ एक युवती को देखा तो क्षणभर के लिए स्तब्ध रह गए। परन्तु शीघ्र ही उन्होंने कुछ निर्णय लिया। बाइक चलाने वाला फ़ौजी शायद उन दोनों में सीनियर था। उसने वहां उपस्थित लोगों से पूछा कि यहाँ आस-पास कोई अस्पताल है क्या, किसी को पता हो तो बताओ। तुरंत कुछ लोग बोले कि हाँ है, पास में ही एक बड़ा अस्पताल है। उसने फिर पूछा किसी को ठीक से रास्ता मालूम है अस्पताल का? इस पर भी कई लोगों को ने हाँ में जवाब दिया।  उसने उनमें से एक युवा व्यक्ति को अपने पास बुलाया, और अपने साथी फ़ौजी को बाइक की चाबी पकड़ाते हुए कहा कि इनके साथ तुरंत अस्पताल जाओ और किसी एम्बुलेंस का इंतज़ाम करो। साथी फ़ौजी  ने तुरंत उस व्यक्ति को बाइक की पिछली सीट पर बिठाया और अस्पताल की तरफ़ तेज़ी से बाइक दौड़ा दी।

उसके जाने के बाद, फ़ौजी ऑफिसर ने सब को घटनास्थल से थोड़ी दूरी बना कर रखने को कहा और स्वयं एक बार फिर ट्रेन के ड्राइवर और गार्ड के साथ उस घायल युवती को नज़दीक जाकर देखा। वह अभी भी उसी अवस्था में ही थी, शरीर में किसी प्रकार की कोई हरकत नहीं थी। जिन झाड़ियों के पास वह ट्रेन से टकराने के बाद गिरी थी वहाँ एक बहुत बड़ा पत्थर था जो लगभग खून से लथपथ था। फ़ौजी अफसर ने देखते ही कहा शायद इस का सर बहुत ज़ोर से इस पत्थर से टकराया है और चोट बहुत गहरी लगती है। उसने तुरंत हिदायत दी कि जब तक हॉस्पिटल स्टाफ या पुलिस में से कोई नहीं आ जाता, कोई भी व्यक्ति न तो घायल युवती के करीब आए और न ही इसे छुए। एक और बात पर फ़ोजी अफ़सर का तुरंत ध्यान गया, जिस पर अभी तक शायद किसी और का ध्यान नहीं गया था। उस घायल स्त्री के एक हाथ में कुछ था शायद। शायद एक मुड़ा हुआ काग़ज़, जो उसने कस के मुट्ठी में पकड़ा हुआ था। होश में न होने के बावजूद भी! यद्यपि इतने बड़ी दुर्घटना के बाद उसकी मुट्ठी थोड़ी खुल गई थी, पर कागज़ अब भी उसके हाथ में ही था।

अस्पताल ज़्यादा दूर नहीं था। फ़ौजी ऑफिसर का साथी और जो व्यक्ति उसे हॉस्पिटल तक ले गया था, शीघ्र ही एक एम्बुलेंस को वहाँ लाने में सफ़ल हो गए। भीड़ को फ़ौरन वहां से हटने की ताक़ीद की गई। केवल ट्रेन का ड्राईवर, गार्ड, दोनों पुलिस ऑफिसर और डॉक्टर तथा अन्य मेडिकल स्टाफ़ ही उस घायल स्त्री के पास गए। डॉक्टर ने उसकी नब्ज़ देखी तो थोड़ा निराश हुआ, पर फिर भी उसने अपने स्टाफ़ को तुरंत उसे हॉस्पिटल ले चलने के लिए कहा और हिदायत दी कि घायल स्त्री को बहुत ध्यान से और सावधानी से उठाना होगा। फ़ौजी ने डॉक्टर सा’ब को उस काग़ज़ के बारे में भी बताया जो उस घायल महिला के पास मिला था। डॉक्टर ने उस काग़ज़ को खोल कर देखा, और पुलिस ऑफिसर को भी दिखाया, फिर दोनों ने कुछ मशवरा किया और डॉक्टर ने उसे सहेज कर अपनी शर्ट की पॉकेट रख लिया। पैरामेडिकल स्टाफ़ ने सावधानी से घायल महिला को एम्बुलेंस में शिफ्ट कर दिया। डॉक्टर के कहने पर, एक नर्स ने उस बच्ची को गोद में उठा लिया। सारा मेडिकल स्टाफ़ एम्बुलेंस में और दोनों पुलिस ऑफिसर अपनी बाइक पर सवार होकर एम्बुलेंस के पीछे चल पड़े। वहाँ पर खड़ी भीड़ में से भी कई लोग पैदल या साईकिल इत्यादि पर सवार हो कर अस्पताल की ओर चल पड़े।

अस्पताल में पहुँच कर डॉक्टर ने तुरंत अपने सीनियर डॉक्टर को सूचित किया। सीनियर डॉक्टर के आते ही मौके पर गए डॉक्टर ने वह काग़ज़ का पुर्ज़ा सीनियर डॉक्टर को थमा दिया। उस पर स्त्री का नाम और उस के घर का तथा उसके पति के ऑफिस का पता, दोनों लिखे थे। सीनियर डॉक्टर ने तुरंत उस काग़ज़ को हॉस्पिटल के एडमिनिस्ट्रेटर, प्रशासनिक अधिकारी के पास ज़रुरी कार्रवाई के लिए भिजवा दिया तथा दुर्घटना की गंभीरता को देखते हुए, स्वयं अपनी टीम के साथ उस घायल स्त्री की जांच करने में जुट गए।

प्रशासनिक अधिकारी ने काग़ज़ पर लिखे दोनों पते ध्यान से पढ़े, डॉक्टर से केस   के बारे में मोटी-मोटी जानकारी ली और तुरंत हॉस्पिटल स्टाफ़ के दो लोगों को उन दोनों पतों पर इस दुर्घटना की सूचना दे कर आने को कहा। और यह भी हिदायत दी कि यद्यपि ये दोनों स्थान बहुत दूर नहीं हैं तो भी अपनी या किसी साथी की साइकिल लेकर ही जाना। घर वालों को जल्द से जल्द इस दुर्घटना की सूचना मिलनी चाहिए ताकि वे शीघ्र से शीघ्र अस्पताल में पहुँच सकें। उन लोंगों  ने अपना काम अत्यंत तत्परता से किया। लगभग आधे घंटे में ही घायल स्त्री के पति, अपने एक-दो साथियों के साथ वहाँ पहुँच गए। उनके पति ने घायल स्त्री की शिनाख्त अपनी पत्नी शकुंतला के रूप में कर दी! आते-आते रास्ते में उन्होंने अपने कुछ करीबी परिवारों को भी इस घटना की सूचना करवा दी थी। नतीजतन, लगभग घंटे भर में अस्पताल में उनके परिवार के लोगों और अन्य परिचितों की अच्छी-खासी संख्या पहुँच गई थी !   

उधर डॉक्टरों की टीम घायल युवती की डूबती साँसों को बचाने की कोशिश में व्यस्त थी। खून बहुत अधिक बह चुका था। नब्ज़ और दिल की धड़कन दोनों ही लगभग बंद थे। एक लेडी डॉक्टर ने उसकी छाती पर दोनों हाथों से बार-बार दबाव डाल कर प्रयास किया कि शायद इससे हृदय की गति में कुछ तेज़ी आए, परंतु कुछ असर नहीं हुआ। सीनियर डॉक्टर ने दो डॉकटरों को उसकी हथेलियों और पाँवों के तलवों को तेज़ी से रगड़ने की हिदायत दी, ताकि घर्षण से उत्पन्न ऊर्जा से शायद शरीर को कुछ गर्मी मिले। परंतु उसके हाथ-पाँव यथावत ठंडे ही रहे। यह सब देखकर सीनियर डॉक्टर साहेब के चेहरे पर निराशा के भाव उभर आए। एक अंतिम कोशिश के रूप में उन्होंने मरीज़ को वेंटीलेटर पर डालने का निर्णय लिया और ऑक्सीजन सिलिन्डर की व्यवस्था करने का भी निर्देश दिया। परंतु उनके इन प्रयासों का कुछ लाभ नहीं हुआ। इससे पहले कि ऑक्सीजन सिलिन्डर लगाया जाता, सामने मॉनिटर पर आते सभी सिग्नल बंद हो गए थे। शायद उस युवती की नब्ज़, सांसें और दिल की धड़कन सब शांत हो चुके थे। उस का शरीर बिल्कुल ठंडा पड़ चुका था, और सर एक तरफ लुढ़क गया था। डॉक्टर्स टीम के लीडर ने घोर निराशा व्यक्त करते हुए, उसे मृत घोषित कर दिया!

इस की सूचना जैसे ही अस्पताल में आए सगे-सम्बंधियों और परिचितों को मिली, उन सब में दु:ख की एक लहर दौड़ गई। ऐसा कोई न होगा जिसकी आँखें नम न हो आई हों। यह कोई साधारण घटना नहीं थी। एक युवती की मृत्यु हो जाना और वो भी इस तरह से, अविश्वसनीय तो था ही, अत्यंत पीड़ादायक भी था ।

यह दिल दहला देने वाली घटना मेरे बाल-मन पर एक अजीब सा प्रभाव छोड़ गई। परिवार में ऐसा तो कोई नहीं होगा जो इस घटना को कभी भूल पाया हो परंतु मेरे मन-मस्तिष्क पर इसका कुछ ऐसा प्रभाव हुआ कि मेरा पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया। मैं अक्सर कुछ गुमसुम सा, कुछ ख़ामोश सा रहने लगा। मेरी चंचलता न जाने कहाँ खो गई। मेरे स्वभाव में ऐसा परिवर्तन देखकर कई बार मेरे माता पिता को चिंता हो जाती।

यद्यपि धीरे-धीरे, समय के साथ, मैं अपने सामान्य रूप में आ गया। परन्तु, फिर भी, मैं कभी गुड्डी दी को भूल नहीं पाया। उनका इस तरह चले जाना मुझे हमेशा सालता रहा। मुझे हैरानी होती थी कि वो शकुंतला दी, जो काक्रोच और छिपकली को देख कर ही बुरी तरह डर जाती थीं, चलती ट्रेन के आगे कैसे कूदी होंगी! उन्होंने इतनी हिम्मत कैसे जुटाई होगी। वो स्नेहमयी माँ अपनी नन्ही सी बच्ची को किसके सहारे छोड़ कर चली गई? वो कौन से शब्द थे जो उनके हृदय में शूल बन कर गढ़ गए? वो कैसे तीर थे जो उनको भीतर तक छलनी कर गए और उन्हें इतना दर्द दे गए जिसे सहन करना उनके लिए इस कदर मुश्किल हो गया कि वो अपने प्राण त्यागने का फ़ैसला कर बैठीं! उनकी नन्ही सी बच्ची का मोह भी उन्हें रोक नहीं सका।

बरसों बाद, लगभग 2006-07 में जब मैंने शेरो-शायरी और ग़ज़ल में पदार्पण ही किया, तो मैंने एक शेर कहा था:

शब्द बन कर शूल दिल में गढ़ गए

आज  पानी  में  दरारें  आ  गयीं।

मुझे अच्छे से याद है कि इस ग़ज़ल को कहते हुए, जाने किस बात पर मेरे ज़ेहन में गुड्डी दी घूम रहीं थी और मैं सोच रहा था कि क्या शब्दों की मार इतनी घातक हो सकती है कि किसी के प्राण ही ले ले?

आज भी मुझे जब कभी शकुंतला दी की याद आती है तो मेरे ज़ेहन में हमेशा यही विचार गूँजते हैं कि काश गुड्डी दी जब जीजा जी के ऑफिस गई थीं, तो वो उन्हें मिल जाते या दी उनके ऑफिस में थोड़ी देर और उनके आने का इंतज़ार कर लेतीं। अगर उनकी, अपने पति से थोड़ी बातचीत हो जाती और वो उन्हें अपनी मन की व्यथा सुना पातीं, तो शायद उन के अंदर चल रहा तूफ़ान शांत हो जाता, उनकी वेदना कुछ कम हो जाती और वो अपने प्राण त्यागने का विचार छोड़ देतीं!

जाने क्यूँ मुझे ऐसा लगता है कि जब शकुंतला दी घर से अपनी बच्ची को लेकर निकली होंगी, तो उनके मन में अपने प्राण त्यागने  का विचार शायद नहीं रहा होगा। अन्यथा, वो अपने पति के ऑफिस क्यूँ जाती? वो पहले ही यह कदम उठा लेतीं! मुझे तो उनके वहाँ जाने का कारण केवल यही समझ में आता है कि वे अपनी दर्द को, अपने अपमान को अपने पति से साझा करना चाहती होंगी। और जब उन्हें इसका अवसर नहीं मिला तो शायद उनके अंदर की पीड़ा और अधिक बढ़ गई होगी, बल्कि असहनीय हो गई होगी और उन्होंने अपनी जान देने जैसा बड़ा फैसला ले लिया होगा! तभी वहीं ऑफिस में उन्हें अपनी बच्ची की सुरक्षा का ख्याल आया होगा और उन्होंने अपने पति के ऑफिस में बैठ कर ही, एक कागज़ और पेन लेकर, अपना नाम और अपने घर का तथा अपने पति के ऑफिस का, दोनों के पते लिख दिए थे ताकि उनकी बच्ची सुरक्षित हाथों में पहुँच जाए!

मेरे मन में आज भी रह-रह कर ये सवाल उठता है कि शकुंतला दी की सास ने उन्हें जो कुछ भी कहा, जो भी ताने मारे, जो भी अपशब्द कहे, क्या दी के साथ ऐसी घटना केवल उसी दिन घटी थी या कभी पहले भी घटी होगी। शकुंतला दी मुझे इतनी कमज़ोर तो कभी नहीं लगीं कि पहली बार ही ऐसा हुआ हो और उन्होंने इतना बड़ा कदम उठा लिया हो। मुझे लगता है कि निश्चित रूप से यह सब पहले भी कई बार हुआ होगा। और यदि यह अक्सर होता रहता था तो क्या यह बात उनके पति को मालूम थी या नहीं? अगर उन्हें यह पता था तो उन्होंने इस मामले में क्या किया? अगर उन्हें यह नहीं पता था तो इसका सीधा-सीधा अर्थ यही है कि शायद ऐसी घटना उनके सामने कभी घटी ही न हो। शकुंतला दी की सास उन के साथ ऐसा दुर्व्यवहार, शायद जीजा जी की अनुपस्थिति में ही करती हों और दी ने कभी उन्हें इस के बारे में बताया ही न हो! परिवार में कलह न बढ़े, शायद इसलिए वो सारा दुःख-दर्द अपने अन्दर ही समेट कर रखती रहीं हों और उनके अन्दर दबा लावा उस दिन की घटना से ज्वालामुखी बनकर फट गया हो! काश, वो ऐसा न करतीं!!

जब शकुंतला दी आवेग में अपनी बच्ची को उठा कर घर से बाहर जा रहीं थीं, तो काश उनकी सास ने उनके हृदय में उठ रही वेदना के तूफ़ान को भांप लिया होता और उसे रोक लिया होता! पर इतनी संवेदनशीलता शायद उनमें थी ही नहीं! या फिर जो भी उनकी सास ने उन्हें कहा था, शकुंतला दी पलट कर उन्हें उसका कुछ समुचित जवाब दे देती तो भी शायद उसका मन कुछ हल्का हो जाता। पर शायद उनका सौम्य, मृदुल स्वभाव उनके आड़े आ गया! समाज में बहुओं द्वारा अपने ससुराल में बड़ों को पलट कर जवाब न देने की जो मर्यादा की सीमा थी, वे शायद उसी का शिकार हो गयीं। परंतु, मेरे विचार में अपने से बड़ों का सम्मान करना अलग बात है और उनके द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर चुप रह जाना; खुद पर होने वाले अत्याचार को चुपचाप सहना एक अलग बात! अगर वो इस गैर-ज़रुरी सीमा-रेखा से बाहर निकल कर उनका सामना कर लेतीं तो वो शायद इस दर्दनाक हादसे से बच जातीं! उनकी बच्ची जीवन भर के लिए अपनी माँ के प्यार से महरूम न हुई होती!! काश वो ऐसा कर पातीं!!!

-डॉ जगमोहन राय ‘सजल’

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परिचय

डॉ जगमोहन राय ‘सजल’

दिल्ली विश्वविद्यालय के पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज (सांध्य) से 31 जुलाई, 2023 को गणित के एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में सेवा-निवृत।

Email: drjagmohanrai@gmail.com

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