कहानीसंस्मरण

सर्कस की शेरनी

सांय-सांय करती हवा…. फड़फड़ करता पांडाल और सरकस के अन्तिम शो का अन्तिम सीन… (शायद नहीं… यह तो शुरुआत थी) लोहे की ऊँची-ऊँची ग्रिलों से घिरे सर्किल के भीतर स्टूलों पर गुर्राते हुए चार विशालकाय शेर और एक नाजुक कमर कमसिन युवा शेरनी….रिंग मैन के हंटर से निकलती हुई सड़ाक सड़ाक की आवाजें और विरोध के रूप में फूटता ‘गुर्राहट’ का स्वर… शेरनी बेचारी क्या करे? जब शेर भी ‘हंटर’ के वश में हो?

दर्शकों के रोंगटे खड़े होने लगे। सहमे हुए बच्चे अपनी माँओं की गोद में दुबक कर सिर छुपाने लगे। स्त्रियों के चेहरों पर भय के आसार स्पष्ट झलकने लगे। धीमी धीमी बहने वाली हवा सांय-सांय करने लगी और तभी जल उठा आग का गोला। जिसके भीतर से छलांग लगाते हुए शेरों और शेरनी को फिर से अपने-अपने पिंजरों में कैद होना था।

दर्शकगण अपनी सीटों से उठने लगे। चलते-चलते भी शेरों की छलांग देखने का लोभ संवरण नहीं कर सके। सो, मुड़-मुड़कर देखते रहे। एक-एक कर सभी अपने करतब दिखाकर पिंजरों में फिर से चले गए।

तभी…..।

हवा आँधी बनने लगी। गोले की आग ऊँची-ऊँची लपटें बनकर कथक करने लगी। हंटर चीखा ‘सड़ाक’ और *गुर्राहट’ बनी दहाड़….. भयानक दहाड़। बादल गर्जा गड़ड़-गड़ड़। शेरनी ने गोले के भीतर से छलांग लगाने से साफ इन्कार कर दिया। रिंग मास्टर बार-बार निर्देश दे रहा था। मगर कौन किसका आदेश मानता? वहाँ तो अंधड़ का साम्राज्य था।

नन्ही-नन्ही बूंदें टप-टप-टप करती हुई पंडाल की छत पर शोर करने लगी और तभी लाइट का गुल हो जाना और भयानक दहाड़ के साथ शेरनी असंतुलित होकर, जाने कैसे पांडाल में कूदना.. भगदड़, दहाड़.. चीख-पुकार.. आर्तनाद… रोंगटे खड़े कर देने वाला वातावरण… हाथों में कुर्सियाँ ऊँची उठाए लोग जगह-जगह जलती हुई टार्चे, माचिस की तीलियाँ या फिर कागजों को जलाए हुए लोग। खून जमा देने वाले इस वातावरण  में भी निरन्तर फूटते वाक्य।

भागो-भागो।

अपनी-अपनी कुर्सियां उठा लो।

आग जलाओ…. आग….

नहीं आग से भड़क उठेगी।

नहीं, दूर भाग जाएगी।

पांडाल में जैसे जगह-जगह अंगारे सुलगे हों। मगर आँधी उस नन्ही- सी रोशनी को कैसे जिन्दा रहने देती? अंधड़, उखड़ता हुआ पांडाल और भागते लोग….. जलती आग…..। देखकर रोशनी बौखला उठी। भीड़ के बीच जहाँ उसे रास्ता मिला, निकल भागी। कइयों को घायल करती कुर्सियाँ लांघती जाने कहाँ गुम हो गई।

शेरनी कहाँ गई? कोई नहीं जानता। गनीमत थी कि उसने किसी की जान नहीं ली। वास्तव में दोनों एक-दूसरे से भयभीत थे। लोग भयभीत थे कि जाने कहाँ दुबकी है? कब और किस पर झपट पड़े? भीड़ कहाँ जाए? शेरनी कहाँ जाए?

दोनों एक-दूसरे से भयभीत हैं। अपनी-अपनी जान बचाने के लिये भाग रहे हैं। सर्कस के लोग ‘शेरनी’ को घेरने के लिये भाग रहे हैं। सरकारी अमला भी सचेत हो चुका है। भीड़ को अपनी जान प्यारी है। ‘सिर पर पांव’ रखकर भागने लगी है। जिसको जो सवारी मिली, चढ़ बैठा। कार वाले सुरक्षित हैं। अपनी कारों के शीशे चढ़ाकर, हैडलाईट की रोशनी से भागती भीड़ को चीरकर निकल गए हैं। कोई अपने बच्चों को लेकर खाली रिक्शा में लपक कर बैठ गया है, बिना भाव-तौल किए।

बस, जैसे भी हो, घर पहुँचा दो। मुँह-माँगा दाम देंगे।

जान हमें भी प्यारी है साहब! दाम तो तब देंगे जब सही-सलामत पहुँचेंगे?

और वह उन्हें उतारकर अपनी जान लिए भागा चला जा रहा है। जिसके हाथ, जिसकी भी साइकिल लगी, सवार होकर घण्टी टनटनाता हुआ भागा चला जा रहा है। कौन जाने, भागी हुई शेरनी कब उनका रास्ता रोक ले या झपट पड़े?

सारा वातावरण शेरनीमय हो उठा। पैदल भागने वालों को लगा कि ‘अब आई कि तब आई।’ बस, वह हमारा ही पीछा कर रही है। वे लोग भीगते, अंधड़ से लड़ते-झगड़ते, सिर पर पाँव रखे भागे चले जा रहे थे।

सरकस के साथ-साथ सरकारी अमला भी पूरी तरह सचेत और सक्रिय हो उठा था। गनीमत यह है कि सरकस शहर के बाहर ठहरी थी और उसके पीछे था खाली मैदान…….! मैदान में झाड़ियां और झाड़ियों के पीछे दलदल…. दलदल पार जंगल और जंगल पार गहरा जंगल।

अंधड़ जैसे आया था वैसे ही चला भी गया। पीछे छोड़ गया खाली, उजड़ा हुआ पांडाल और टूटी कुर्सियाँ….जला हुआ फर्नीचर…. उजड़ा आशियाना।

लाइट आ चुकी थी। भागने वालों ने राहत की साँस ली। मगर शेरनी का कहीं आस-पास भी अता-पता नहीं था। बरसात ने उसके पद-चिन्हों को भी मिटा डाला था। शेरनी को ना मिलना था, ना ही मिली। रात भर तलाश जारी रही।

जैसे-तैसे रात बीत गई। अनुमान था कि शेरनी झाड़ियों के पीछे जा छुपी होगी। किन्तु वहाँ से निकलकर कब, कौनसा हादसा कर दे, इसका अनुमान किसी को भी नहीं था। वह शहर में भी प्रवेश कर सकती है। किसी बच्चे को उठा सकती है। किसी को भी खा सकती है। शेरनी बिगड़ गई है। वह विद्रोहिणी हो चुकी है इसलिए अगर वह पकड़ में ना आ सके तो उसे गोली मार देना ही बेहतर होगा। इसलिए शिकारी भी बुला लिए गए हैं।

‘शेरनी भाग गई है। बन्धन को ठोकर मार गई है। रिंग मास्टर के अत्याचारों से बौखला कर उसने विद्रोह कर दिया।’ यह चर्चा घर-घर का विषय बन गई है। रात, फिर दिन, एक…. दो….. तीन दिन हुए शेरनी पकड़ में नहीं आई। घरों के दरवाजे बहुत कम खुलते। जाने कब शेरनी आ धमके। क्योंकि उन लोगों ने ही उसे आग की लपटें दिखाई थी।

लोग भयभीत है। सरकस गमगीन है। रिंग मास्टर डरा हुआ है। शिकारी सचेत हैं। सरकार सक्रिय है।

जंगल का घेराव किया गया। आस-पास का चप्पा- चप्पा छान डाला गया। मगर उसे धरती निगल गई या आकाश? फिर भी वह जहाँ थी, जैसी भी थी, आतंकित जरूर थी। जाने कब, कौन शिकारी उसका घेराव कर ले? बन्दुक की कौन सी गोली उसके मस्तक को बेध डाले? या फिर वे ही लोग उसे पकड़ कर फिर से पिंजरे में बंद कर दें। वह जानती है कि अगर उसे फिर से पकड़ लिया गया तो पहले उसे हंटरों की मार सहनी पड़ेगी फिर कई-कई दिनों की भूख-प्यास… पिंजरा और अत्याचारों की अधिकता भी सहनी होगी। जिन अत्याचारों का विद्रोह कर वह भाग आई है, उन्हीं के बोझ तले फिर से दबना होगा। उसने पिंजरा छोड़कर अच्छा किया या बुरा? वह कमसिन-सी शेरनी, कुछ नहीं समझ पाई। वैसे जब से उसने जन्म लिया है पिंजरा ही देखा है। सरकस की चार-दीवारी ही उसकी पूरी दुनिया है। जहाँ उसे अपने करतब दायरे के भीतर ही दिखाने होंगे।

झाड़ियों में छुपे हुए उसे तीन दिन हो चुके थे। भूखी-प्यासी दुबली-सी शेरनी और भी दुबली हो गई है। फिर भी उसे सकून मिला है। कितना विचित्र अनुभव है यह भी। दूर-दूर तक फैली हरियाली, वृक्षों की छाँव…. चहकते हुए पक्षी…. उसने तो ऐसी दुनिया कभी देखी नहीं थी। आँख खुलने के साथ ही पिंजरा दिखाई दिया था। उसने अपनी माँ को भी पिंजरे में देखा था। माँ ने उसे बताया था कि उसका जन्म भी पिंजरे में हुआ था जब वह बड़ी हो गई, उसके लिए अलग से पिंजरा बन गया था और जब वह भी बड़ी हो जाएगी तो उसको अलग पिंजरा मिलेगा।हुआ भी ऐसा ही था।अचानक उसे मां की याद आई।काश! वह भी मेरे साथ चली आई होती। भला उसने सारा जीवन पिंजरे में कैसे बिताया? लेकिन आज वह हिम्मत ना करती तो…. तौबा! तौबा!तौबा! कैसे तो थे वो लोग जिन्होंने उसके चारों तरफ आग लगा दी थी। पिंजरा, जलता हुआ आग का गोला, ऊँचे-ऊँचे जंगले…. रिंग मास्टर और सड़ाक-सड़ाक करता हुआ उसका हंटर….. बस। इतनी सीमाएँ तो थी उसकी जिन्दगी की।

शेरनी को भूख लगी है,लेकिन भोजन की तलाश उसकी मौत का कारण बन सकती है। कहने के लिये वह शेरनी है। उसके आतंक से लोग भयभीत है। मगर वह स्वयं भी तो कितनी आतंकित है और सरकस?

वे जानते हैं कि वह उनकी रोजी-रोटी का साधन है। भाग गई तो जरूर पगला गई है। ना जाने कौनसा कदम उठा ले? इससे तो भला है कि उसे गोली मार दी जाए। मगर कहाँ? कम से कम एक बार दिखाई तो दे जाए? घर-घर की चर्चा है, ‘शेरनी निकल भागी।’ क्यों भागी? कैसे भागी? भूखी प्यासी थी? या फिर हंटर के आतंक से? इस बात की चर्चा भी दबी-दबी जुबान में चलती।

आग का गोला भड़क उठा था। उसे उस आग में कूदने के लिए कहा गया। दो-दो रिंग मैन उसे घेर कर खड़े थे….. चारों तरफ सुलगती हुई आग….हवा उसे भड़का रही थी। तभी लाइट गुल हो गई, आँधी आ गई। आग ने ही उसके कानों में कहा, “भाग जाओ। यही मौका है।…. वरना इस आग के गोले के भीतर ही फंसकर जल मरोगी…. कोई जानेगा भी नहीं…। चलो। हिम्मत करो….हम तुम्हें रास्ता दिखाएँगे। तुम्हारा साथ देंगे…. इनके चंगुल से छूट जाओ…. पीछे जंगल है, गहरा जंगल…. वहाँ तुम्हें सब कुछ मिलेगा। एक पल भी गंवाए बिना दौड़ो। अपने अस्तित्व की अलग पहचान बनाओ।”

शेरनी को पुरानी बातें याद आ रही है। शहर-शहर घूमती हुई सरकस…… जंगल के बीच से होकर गुजरती हुई सरकस, उसका मन कितना ललचाया करता। काश वह भी कभी जंगल देख सकती! एक बार उसकी माँ ने बताया था कि ‘मैंने अपनी नानी से जंगल की कहानियाँ सुनी हैं।’ माँ की नानी शायद जंगल से आई थी। पिंजरे में बंद होकर उसकी सारी दुनिया पिंजरे तक ही सीमित हो गई थी। वे कौन है? शेरनी या गीदड़ी? यह बात भी शायद वे भूल गई हो। बस उन्हें याद है सरकस का अन्तिम सीन जो उन्हीं से पूरा होता था। उन्हें देखने के लिए ही तो इतनी भीड़ जुटा करती। अगर सरकस में वे ना हों तो अन्तिम रोमांचक सीन का क्या होगा रिंग मैन सदा हंटर लिए खड़ा रहता है। वे सिर्फ गुर्रा सकती है। इससे अधिक और कुछ नहीं। नानी ने एक बार बताया था कि, ‘शेर ने उस लड़की की गर्दन को अपने मुँह में दबोच लिया था जो अपना सिर शेर के मुँह में डालकर करतब दिखाया करती। क्योंकि वह लड़की थी और रिंगमैन-शेर मेल….. शायद इसलिए उसने लड़की को सताया। फिर भी रिंग-मैन का हंटर सड़ाक सड़ाक करता रहा और खून से लथपथ लड़की का शरीर देर तक छटपटाता रहा। हाथ-पांव पटकती हुई लड़की निष्प्राण होकर सिर-विहीन धड़ के साथ धरती पर गिर गई थी, तब भी सरकस में ऐसे ही भगदड़ मची थी। लेकिन वह तो शेरनी है, क्या रिंगमैन उसे छोड़ेगा? सर्कस के लोग उसे यूं ही छोड़कर चले जाएँगे? फिर भी उसे सब की नजरों से बचना है। मगर इस भूख का क्या करें? जो उसे लगातार सता रही है। और वह भोजन की तलाश में दलदल को पार कर जंगल के दूसरी तरफ निकल गई थी। उसी दिन एक चरवाहा उधर से निकला। जो सरकस और शेरनी की बात से बिलकुल अनजान था। अचानक उसने झाड़ियों से निकल कर एक झपट्टा मारा और चरवाहे को खींच कर ले गई।अगले दिन जंगल के आर-पार ऐलान हुआ। शेरनी आदमखोर हो चुकी है इसलिए कोई भी उस जंगल के आस-पास नहीं निकलेगा।

जंगल का घेराव हुआ। मचान बनाए गए। बकरी बांधी गई। झाड़ियों को आग लगा दी गई। शेरनी भयभीत होकर झाड़ी से निकल भागी। वह पागल-सी हो उठी, ‘आग…. आग…. चारों तरफ आग।’ यह तो वही आग है जिससे बचकर वह भागी थी। लेकिन यहाँ तो सारा जंगल धू-धू करके जल उठा था। कहाँ जाए? निकलने का कोई रास्ता नहीं। इससे अच्छा तो वह पिंजरा, सरकस और रिंग मैन ही था। यहाँ तो चारों तरफ शिकारी और आग है।

पल-भर के लिए शेरनी घबरा उठी। बौखला गई। चीत्कार करने लगी।फिर दहाड़ने लगी। सारा जंगल उसी दहाड़ से काँपने लगा। वह जिस रास्ते से निकल कर भागना चाहती थी वहीं बन्दूकें ‘धांव-धाय’ करने लगी। सौभाग्य से उसे गोली नहीं लगी। बौखला कर वह जोर-जोर से दहाड़ने लगी। अबकी बार जंगल दूर-दूर तक थरथराने लगा। बकरी ‘में… में…’ करने लगी।

‘तुम शेरनी हो।’ ‘कोई भीतर से बोला, ‘तुम कायर नहीं…. आत्मबल वाली हो…. शेरनी हो… शेरनी हो……सामना करो…. डरो नहीं।’

और अचानक वह झाड़ियों से निकल कर मचान पर छलांग लगा गई। चीख-पुकार और मचान का चरमरा कर लटक जाना। बन्दूकों का गिरना और शिकारियों का घायल शरीर छोड़कर उसने एक बार बड़े गर्व से अभयदान की मुद्रा में उन दयनीय शिकारियों की तरफ देखा जो दया की भीख चाहते थे और फिर बड़े ही आत्मविश्वास के साथ घने जंगल में खो गई जहाँ खुली-ठंडी हवा, घनी छांव, कलकल करती नदियाँ, सिर पर खुला आकाश….. संगीत पैदा करती हुई हवा, झरने और वृक्ष, चहकते पक्षी और ऊँचे पहाड़….. उसने सिर उठाकर देखा। एक पगडंडी सीधी पहाड़ के शिखर की ओर चली जा रही थी। उसने प्रसन्नता से भरपूर एक हल्की-सी गुर्राहट छोड़ी और उस पगडंडी पर अपने कदम बढ़ा दिए।

वह धीरे से बुद‌बुदाई माँ। मैंन उस पगडंडी को खोज लिया है जिसका सपना तुमने देखा था।

और उसने शिखर की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं।

नीलप्रभा भारद्वाज

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टिप्पणी

प्रस्तावित रचना के बारे में लेखिका एवं कवियत्री प्रियंका भरद्वाज की टिप्पणी:

नीलप्रभा भारद्वाज का जीवन और साहित्य एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही संघर्षशील चेतना के दो स्वरूप हैं। विभाजन के बाद के दौर, सामाजिक रूढ़ियों और सीमित अवसरों के बीच उन्होंने जिस साहस और आत्मविश्वास के साथ अपनी पहचान बनाई, वह अपने आप में एक प्रेरक यात्रा है। श्रीगंगानगर जैसे अपेक्षाकृत छोटे शहर में उस समय एक स्त्री का लेखन की दुनिया में सक्रिय होकर अपनी स्वतंत्र आवाज़ स्थापित करना आसान नहीं था, फिर भी उन्होंने हर विपरीत परिस्थिति से जूझते हुए साहित्य को अपना जीवन-सत्य बनाया। यही कारण है कि वे केवल श्रीगंगानगर की पहली महिला साहित्यकार ही नहीं बनीं, बल्कि अपने लेखन से उन्होंने स्त्री-अनुभव, संघर्ष, संवेदना और आत्मसम्मान को एक नई अभिव्यक्ति दी।

उनकी कहानियों में जीवन की तपिश, समाज की विसंगतियाँ और भीतर से टूटते हुए भी हार न मानने वाली स्त्री की अदम्य शक्ति दिखाई देती है। “सर्कस की शेरनी” जैसी कहानी दरअसल उनके अपने जीवन-संघर्षों की प्रतीकात्मक प्रतिध्वनि लगती है, जहाँ पिंजरे से बाहर निकलती शेरनी केवल एक पात्र नहीं, बल्कि उस स्त्री-चेतना का रूप है जो भय, नियंत्रण और बंधनों के विरुद्ध अपनी राह स्वयं बनाना चाहती है।

मेरे लिए यह गर्व और प्रेरणा दोनों का विषय है कि वे मेरी दादी जी हैं। उनका संघर्षपूर्ण जीवन, कठिन परिस्थितियों में भी लेखन के प्रति उनकी अटूट निष्ठा, और अपनी संवेदनाओं को शब्द देने का साहस मुझे निरंतर प्रेरित करता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि भीतर जिजीविषा और सृजन की लौ जीवित हो तो व्यक्ति अपनी अलग पहचान बना सकता है।

उनकी साहित्यिक शक्ति का प्रभाव इतना गहरा था कि हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित कथाकार राजेन्द्र यादव भी उनकी कहानियों की विशेष सराहना करते थे। यह केवल उनकी लेखकीय प्रतिभा का सम्मान नहीं, बल्कि उस स्त्री-संघर्ष की स्वीकृति भी है जिसे उन्होंने अपने जीवन और साहित्य दोनों में जिया।

नीलप्रभा भारद्वाज का जीवन हमें यह सिखाता है कि साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि साहस, प्रतिरोध, संवेदना और आत्ममुक्ति की सतत यात्रा है।

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परिचय

नीलप्रभा भारद्वाज

जन्म: 10 अप्रैल, 1940 (पंजाब)

एम.ए., बी.एड.

कहानी, उपन्यास, लघुकथा, कविता, बालकथा, नाटक एवं पटकथा लेखन।

प्रकाशित साहित्य: 1. जड़ों की तलाश, 2. बड़े सपने छोटे सपने, 3. सड़क, 4. बोल मेरी मछली, 5. नीलप्रभा भारद्वाज की चर्चित कहानियाँ (कहानी संग्रह), 1. आंधियाँ, 2. चट्टान, 3. कोयला भई ना राख (उपन्यास), 1. आधा आकाश (कविता संग्रह), 1. जीना यहाँ मरना यहाँ (लघुकथा संग्रह), बंगाली, पंजाबी, मराठी, संस्कृत एवं राजस्थानी में अनेक कहानियों का अनुवाद (अनुवाद)।

पुरस्कार एवं सम्मान :

1. राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर का रांगेय राघव कथा पुरस्कार (सड़क पर) 2001, 2. साहित्यालंकार अखिल भारतीय हिंदी साहित्य कला परिषद द्वारा (बरेली-1988), 3. साहित्य मार्तण्ड स्वर्ण जयंती समारोह राष्ट्र भाषा हिंदी प्रचार समिति, श्रीडूंगरगढ़, 4. वाग्मणि सम्मान (राजस्थान लेखिका संस्थान, जयपुर), 5. कला गुरु, संस्कार भारती, श्रीगंगानगर, 6. शब्द निष्ठा सम्मान, अजमेर, 7. साहित्य समर्था, जयपुर से सम्मान, 8. राजस्थान शिक्षक संघ (शेखावत) से सम्मान, 9. सृजन सेवा संस्थान, श्रीगंगानगर का सृजन सम्मान, 10. नागरिक सम्मान, श्रीगंगानगर (शहर की 16 संस्थाओं ने मिलकर किया।), 11. जिला प्रशासन की ओर से सम्मानित, 12. लॉयन्स क्लब, रोटरी क्लब, लियो क्लब, गंगानगर कला मंच सहित विभिन्न संस्थाओं से सम्मानित ।

विशेष: 1. श्रीगंगानगर जिले की प्रथम महिला साहित्याकार, 2. रांगेय राघव कथा पुरस्कार पाने वाली प्रथम महिला रचनाकार, 3. नागरिक सम्मान पाने वाली श्रीगंगानगर की प्रथम महिला साहित्यकार, 4. कहानियों एवं समग्र साहित्य पर अब तक दस लघुशोध एवं चार पीएच.डी.।

सम्प्रति: सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका

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