…एक तो महामारी ऊपर से कमबख्त लॉकडाउन ! जहां दुनिया-भर की हालत पतली हो गई थी, वहीं उपजी परिस्थियों ने अम्बा को भीतर से तोड़कर रख दिया था। शुरुआत में ही वह टी॰वी॰ में देख रहा था…लॉकडाउन की अनिश्चितता में घबराकर उस जैसे सैकड़ों प्रवासी मजदूर शहर छोड़कर चल पड़े अपने गाँव-देहात की ओर…पैदल-पैदल…उन्हें रास्ते की मुश्किलों के साथ पुलिस भी निर्ममता से पीट रही थी…ये सब देख कर वह कांप गया, बुरी तरह खौफ खा गया। उससे आगे देखा नहीं गया, टी॰वी॰ बंद कर दिया फिर कभी नहीं खोला। वैसे भी वह कैद था एक छोटी-सी चार-दीवारी में ! उदासी भरे समय में वह उन दिनों को याद कर रहा था जब उसका रिक्शा ताबड़-तोड़ चलता था…वह मैट्रो-स्टेशन से सवारियाँ उठाता और निकल पड़ता शहर को नापने…गली-कूचों में, बाज़ारों में और दिन भर सड़कों के बिछे जाल पर फिरकनी-सा घूमता था।…क्या शाही दिन थे वे ! जम के मेहनत करते, खूब पसीना बहाते और कमाते, कभी-कभार शाम ढले पव्वा भी मार लेते !…अब न कोई बात करने को रहा। यारों-दोस्तों की शक्ल देखे भी हफ्तों हो जाते हैं। न कोई काम रहा, सारे धंधे चौपट हो गये…दो जून रोटी भी मय्य्सर नहीं…बहुत बुरे दिन आ गये हैं…उसने सोचते-सोचते आँखें बंद कर ली…
साथ की चारपाई पर रुक्की बैठी हुई थी, साँवली, मोहनी-सी ! कद-काठी, नैन-नक्श…पुछो मत ! मुफ़लिसी की कहीं कोई छाप नहीं थी उसके चेहरे पर !…बस नूर था ! वह लॉक-डाउन से पहले आई एक्सपोर्ट की कमीजों पर बटन टांक रही थी, तीन दिन से इसी काम में जुटी हुई थी। वहीं बैठे-बैठे नीचे देखते हुए धीमे से बोली, “ पैसे-धेले तो सब बराबर हो गये हैं। ये कमीजें…कैसे करेंगे ? ”
अम्बा ने बुझी निगाहों से रुक्की की ओर देखा लेकिन कहा कुछ नहीं। एक चुप्पी, उदासी और अशुभ की आशंका दोनों के बीच खिंच गई।
“ फैक्ट्री की तीन पर्चियाँ इकट्ठी हो गई हैं…कुल जमा डेढ़ हज़ार तो होंगे ही ! ” रुक्की फुसफुसाई, “ लेकिन जाओगे कैसे…मुआ लॉकडाउन चल रहा है…बीमारी से तो लड़ लेंगे मगर…सामान सारा खत्म हो गया है, ये देखो सब डिब्बे खाली हैं…”
उसी जरा-सी जगह के कोने में सिमटा था सामान…गैस का सिलेंडर, चूल्हा, पतीली, दीवार से सटे दो-चार बर्तन और कुछ प्लास्टिक के खाली डिब्बे…यही थी रसोई।
“ सब खाली ! ” यह सुनकर अम्बा के अन्दर एक अजीब सी सनसनी भर गई, भीतर उदासी और घनीभूत हो गई। वह सोचने लगा…घर में सब खत्म ! रूपये-पैसे… उसने एक लंबी सांस खींची और ताकत जुटाकर बोला, “ मैं जाऊंगा, पर्चीयाँ दे देना। ”
“ मुझे डर लग रहा है !…हर तरफ तो पुलिस लगी हुई है…कैसे जाओगे ? ” रुक्की की आवाज कांप रही थी, वह सहमी हुई थी।
“ डरने से क्या होगा ! ” उसने सिर हिलाया और फुसफुसाया, “ पटरी-पटरी चला जाऊंगा…कल तक हो जाएंगी सारी कमीजें ?…और हाँ, लाला से भी बात कर लेना फोन से…”
“ हाँ, हाँ मैं कर लूँगी। ” डर अभी भी रुक्की के दिलो-दिमाग पर काबिज था, वह अब अम्बा के बारे में सोच रही थी…कैसे जायेंगे ? हाय राम !
पूरा दिन बोझिल, हताश और चिंता में बीता। रात भी पहले जैसी नहीं रही कि दिनभर के थके-मांदे शरीर को पड़ते ही नींद आ जाती थी लेकिन अब जागी आँखों में बुरे-बुरे ख्याल पीछा ही नहीं छोड़ते और अगर जरा देर आँखें बंद हो भी जाएँ तो सपनों में डर, छटपटहट और बैचेनी इस कदर बढ़ जाती है कि घबरा के नींद खुल जाती है। अनिद्रा और अवसाद दिमाग में जमता रहता।
वे जैसे तैसे लेट तो गए, बत्ती बुझा दी मगर आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था।…वे लगातार करवटें बदल रहे थे। अम्बा नीचे लेटी रुक्की की ओर देखने लगा, वह दुबकी हुई थी। वह सोचने लगा…पहले हम कितना प्यार करते थे, कैसे कहती थी रुक्की…तुमसे तो बस रात-दिन यही करवा लो !…फिर हंस देती थी…अब कहाँ गई वो हंसी, वो प्यार…आलिंगन ! देर तक अम्बा की आँखों में विगत स्मृतियाँ उभरती रहीं। उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो ये सब गए जमाने की बातें हो।
अम्बा सुबह-सुबह घर से निकल पड़ा, उसके मुंह पर मास्क और एक कंधे पर झोला लटक रहा था। फैक्ट्री मालिक के हाथों की बनी तीन पर्चीयां तथा उसका पता उसकी जेब में था। वह बस्ती के सँकरे रास्तों के जाल से गुजरता हुआ बाहर निकल आया। नजरें चौकन्नी और सावधान थी, चारों ओर देखते हुए उसने सामने के फ्लैटों की गलियाँ से जाना बेहतर समझा। दबे कदमों से बीचों-बीच आगे बढ़ता जा रहा था। फ्लैट पार हो गए तो कोठियाँ की कतारें शुरू हो गई। चारों तरफ सुनसान था। वह सड़कों पर आने से बच रहा था क्योंकि वहाँ पुलिस का पहरा होने की संभावना ज्यादा थी। कोठियाँ से बीच से गुजरता वह मेन सड़क तक पहुँच गया, जो मजबूरी थी, उसी को पार करने पर वह पटरी-पटरी जा पाता। उसने आड़ लेकर पहले सड़क के दोनों तरफ देखा।…हर ओर गहरी खामोशी फैली हुई थी। कहीं कोई ट्रैफिक नहीं था। दूर-दूर तक आदमी न आदमी की जात !…एक तीखी सिहरन-सी उसके भीतर दौड़ गई। डर नई शक्ल अख़्तियार कर उसकी धड़कनों को बढ़ा रहा था। वह अपने घर से जितना दूर आ गया था, परेशानी और उलझनें उसी अनुपात में बढ़ती जा रही था। उसने एक बार फिर दोनों ओर देखा और दौड़ कर सड़क पार कर ली। सामने घने पेड़ों का छोटा-सा जंगल था वह पेड़ों के बीच से रास्ता बनाता रेल के ट्रैक पर पहुँच गया। पटरी की ऊँचाई चढ़ते हुए उसने दोनों ओर देखा, वहाँ सब खाली पड़ा था। उसने दाहिने से पटरी पकड़ ली और नाक की सीध में किनारे-किनारे चलने लगा। घनी झाड़ियाँ के बीच से कभी सड़क का एक हिस्सा दिखाई दे जाता तो वह वहाँ पर अपनी चाल बढ़ा देता। अचानक ही सड़क की ओर से शोर सुनाई दिया, उसने झड़ियों के बीच से देखा सड़क पर पच्चीस-तीस की संख्या में पुलिस बल मोटर-साइकिलों पर सवार एक साथ निकल रहे थे।…मानो पूरी धरती पर उनका शासन चलता हो। अचानक अम्बा के मुंह से निकला, “ पुलिस राज ! ” उसने डर से अपने मुंह पर हाथ रख लिया और उनके गुजरने तक सांस रोके झड़ियों की ओट में खड़ा रहा। कुछ और आगे जाकर अम्बा ने पटरी छोड़ दी। उसे एक्सपोर्ट फैक्ट्री के मालिक का घर ढूँढने में अधिक परेशानी नहीं उठानी पड़ी। किस्मत अच्छी थी कि बिना किसी हील-हुज्जत के पर्चियाँ दी और पेमेंट मिल गई। बहुत दिनों बाद खुशी अम्बा के अंतरमन तक पहुंची थी। वह लौट गया, उसकी चाल में उमंग थी, फिर पटरी-पटरी हो लिया। वह अविराम चलता रहा। उसने बीच के फाटक से पहले झड़ियों के मध्य जगह बना कर सड़क की ओर देखा, वहाँ बस-स्टैंड का पिछला हिस्सा दिखाई दे रहा था, जहां कोई नहीं था। अपने पक्ष में परिस्थिति को पाकर वह सोचने लगा…रास्ता बदल लूँ…बस-स्टैंड के साथ के सब-वे से सड़क पार कर लूँगा…और आगे की बिल्डिंगों के बीचों-बीच से सीधा घर ! आसान हो जाएगा…
पक्का निश्चय करने के लिए अम्बा ने फिर एक बार झाड़ियों से बस-स्टैंड की ओर देखा और हिम्मत जुटाते हुए उस ओर कदम बढ़ा दिये। बस स्टैंड के सामने पहुंचा तो हक्का-बक्का रह गया, उसकी घिग्घी बांध गई। तीन पुलिस वालों ने एक लड़के को स्टैंड के भीतर मुर्गा बना रखा था। उसे देखते ही वे उस पर झपटे और घेरा बनाकर छप्पर के नीचे ले आये।
अम्बा को टी॰वी॰ पर देखे मजदूरों की पिटाई के सीन याद आने लगे…
“ कहाँ जा रहा है ? ” एक सिपाही ने पूछा और दूर से दो डंडे उसकी टांगों पर जड़ दिये। वह तिलमिला गया और दर्द से चीख उठा।
दूसरा सिपाही डंडे से इशारा करते हुए बोला, “ स्साले सारे देश में लॉकडाउन चल रहा है और तू…चल मुर्गा बन जा। ”
वह चुप खड़ा रहा।
“ अबे मुर्गा क्यों नहीं बनता ! ” सभी सिपाही उससे दूरी बनाए हाथों में डंडे लिए खड़े थे।
“ नहीं बनूँगा…” अम्बा अभी भी अपनी दर्द वाली जगह को मसल रहा था।
वे तीनों इस तरह साफ-साफ हुक्म की अवेहलना पर लाल-पीले हो गए। गुस्से में एक ने अम्बा की दूसरी टांग पर लठियाँ चला दी।
“ चल स्साले जेबें उलटी कर…” दूसरा सिपाई लाठी से उसे ठेलते हुए बोला।
वह चुप खड़ा रहा।
तीसरा सिपाही जो अब तक खामोश खड़ा था, अंधाधुंध उस पर लाठियाँ मारने लगा, “ स्साले समझता क्या है अपने आप को ! ”
अंबा भीषण दर्द से चिल्लाता रहा और सिर को बाजुओं में छिपा कर बचाने की कोशिश करता रहा।
“ चल, जेबें उलट। ”
उसने पतलून की दोनों जेबें उलट दी, वे खाली थी।
“ ऊपरवाली तेरा बाप दिखाएगा। ”
वे तीनों महामारी के डर से दूर खड़े थे।
उसने ऊपर वाली जेब भी दिखा दी, वो भी खाली थी।
“ कंगला साला ! अकड़ ऐसे रहा है जैसे लाखों रुपए लेकर चलता हो। ” वह सिपाही चिढ़ कर बोला, “ चल मुर्गा बन। ”
स्टैंड के किनारे जो लड़का मुर्गा बना हुआ था उसने कानों पर से पकड़ ढीली छोड़ दी थी। वह सिपाहियों की गतिविधियों पर नज़र रखे हुए था।
उन तीनों ने अम्बा पर घेरा डाल लिया था। उनमें से एक सिपाही बोला, “ अंदर की जेब दिखा…”
पहले वह चुप खड़ा रहा फिर धीरे से बोला, “ अंदर कोई जेब नहीं है। ”
“ मैं सब जानता हूँ स्सालों तुम्हें ! रहता कहाँ है तू ? ”
“ बी-ब्लॉक की झुग्गियों में…”
“ झुग्गियों में ! फिर यहाँ कहाँ मर रहा है ? ”
वह चुप रहा।
“ तुम स्साले झुग्गी वाले महामारी फैला रहे हो…अब तो तू मुर्गा बन जा बस। ”
अचानक ही एक अजीब-सी अफरा- तफरी मच गई। स्टैंड के कोने में मुर्गा बना हुआ लड़का सब-वे की तरफ भाग खड़ा हुआ। तीनों सिपाहियों ने आव देखा न ताव उसको पकड़ने पीछे भाग पड़े।
अम्बा के लिए गोल्डन चांस था।…उसने देर नहीं की, भाग पड़ा विपरीत दिशा में रेल की पटरी की ओर…
वह पटरी-पटरी कुछ दूर तक तेजी से भागा फिर चलने लगा। वह अभी भी बार-बार पीछे देख रहा था कि कहीं कोई आ तो नहीं रहा। धीरे-धीरे वह आश्वस्त होता चला गया। अब उसकी चाल में जीत का गर्व और दो हज़ार के नोट की गर्मी थी। दर्द के बावजूद एक उमंग उसके भीतर करवटें ले रही थी…वह चलता जा रहा था और सोच रहा था…रुक्की को बताएगा…पुलिस को चकमा दिया…दो हज़ार का नोट उसके जूते में है…वे तीनों के तीनों फुददू, साले भाग लिए लड़के के पीछे ! वह मन ही मन हँसा। एक ऊर्जा और विश्वास उसके भीतर जागने लगा। उसने आकाश की ओर देखा, सूरज सिर पर था। उसे याद आया अभी सड़क भी पार करनी है और रुक्की को बहुत सारी बातें बतानी हैं…डेढ़ हज़ार के बदले दो हज़ार दे दिये हैं, अच्छा आदमी है लाला…और हाँ सबसे जरूरी बात, अगर उड़न छू का चांस नहीं मिला होता, मैं तो फंस गया था, भला हो उस लड़के का…
…और उसने तेजी पकड़ ली।
–गजेन्द्र रावत
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गजेन्द्र रावत
विज्ञान स्नातक
प्रकाशन –
1. बारिश ठंड और वह (कहानी संग्रह)
2. धुआँ-धुआँ तथा अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह)
3. लकीर (कहानी संग्रह)
4. मुँह और कान (कविता संग्रह)
5. मेरी चयनित कहानियाँ
6. झूठ के पाँव (कहानी संग्रह)
7. छोटी कहानियाँ
बड़े कथानक
8. पच्चीस कहानियाँ (अंतिका प्रकाशन की श्रंखला)
9. चाँदनी तथा अन्य कहानियाँ (शीघ्र प्रकाश्य)
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संप्रति – स्वतन्त्र लेखन
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