बीतें दिनो की एक शाम थीं। हम चार दोस्त अपनी पसंदीदा जगहों में से एक किपलिंग बंगला के खंडहर में मिले। यहां मिलने का मतलब ही होता है कि हम अपने-अपने जीवन में परेशानियों से जूझ रहे हैं। इन परेशानियों को यह खंडहर एक फूल में बदल देता है—जिसकी मादकता से हम महकने लगते हैं। उस दिन भी हमारी परेशानियां फूल में बदल गई थी और हम मदहोश होते जा रहे थे। वैसे अक्सर मेरा एक दोस्त यहां आता है। वह यहां काम करके रात में ठहरने वाले मजदूरों से इस कदर घुल-मिल गया है कि वह उसके दोस्त हो गए हैं। हम अपने को रोज फूल में नहीं बदल सकते थे—मै तो कतई नहीं। इसलिए वह यहां अकेले आता है। फूल खिलाता है और वापस चला जाता है।
उस दिन हम चार अपने-अपने दुखों के साथ वहां हाजिर हुए तो शाम का धुंधलका बढ़ कर रात का आकार निर्मित कर रहा था। वैसे तो मैं परेशान कम ही होता हूं। मुझे परेशानियां तब अपनी आगोश में लेती हैं—जब किसी का मैंने दिल दुखा दिया हो या किसी ने मेरा या किसी असहाय की सहायता करने में मै असहाय हो जाता हूं। दूसरा दोस्त उसी उलझन में था—जिसे अक्सर प्रेमी महसूस करते रहते हैं। उसने प्यार को पाने के लिए जिस सहनशीलता और धैर्य का परिचय दिया था उसे जानकर ही आप दंग रह जाएंगे। वह रील्स के जमाने में सालों धैर्य के साथ उसके हां का इंतजार करता रहा जैसे कि परती पड़ी भूमि को उम्मीद हो कि एक दिन पानी जरूर बरसेगा और हम सराबोर होकर हरियाली की मखमली काया से भर जाएंगे। उसके जीवन में सावन तो आया था लेकिन बीच में ट्रक आ रहा था। आप समझे नहीं। मै समझाता हूं। दोनों ने एक-दूसरे को स्वीकार कर लिया। अब उन्हें स्वीकार करने की बारी परिवार की थी। उसके घर यह सूचना किसी परमाणु विस्फोट की तरह थी। सब तरफ कोलाहल मच गया। नाते-रिश्तेदारों के फोन आने लगे कि तुम क्या कर रहे हो। हां ट्र्क वाली बात बताना तो भूल ही गया। दरअसल किसी जमाने में उसके पिता ट्रक चलाया करते थे। हम अक्सर मजाक करते कि—“अरे उससे बोल दो दहेज में ट्रक दे दे। मामला सुलट जाएगा”
हां तो उसके जीवन में प्रेम को अपना घरवासी बना लेने की जद्दोजहद चल रही थी। दूसरा दोस्त इसलिए परेशान था कि उसके जीवन में लड़कियां तो कई आईं लेकिन प्रेम नहीं आया। हमेशा वह प्रेम के पेड़ से किसी फल की तरह बिना पके ही गिर जाता जैसे किसी ने ढेला मारकर गिरा दिया हो। वह प्रेम के अभाव का मारा हुआ था। मेरा क्या है। मेरा नाम ही काफ़ी है—गोविंद। एक दोस्त मुझे अब हमेशा चिढ़ाता है कि कृष्ण का पर्यायवाची ही तो गोविंद है। तुम्हारा क्या भरोसा। लेकिन मैं भी परेशान था। न मै प्रेमानुभूति की अनुभूति से परेशान था—न प्रेमाभाव से। मैं बस परेशान था कि मैंने ग़लती से एक दोस्त लड़की को कुछ सामान्य सा संदेश भेज दिया था—जिसे लेकर वह मुझपर बिफर पड़ी थी। अब आपको जरूर दिलचस्पी होगी कि वह सामान्य सा संदेश क्या था? तो मैं बता ही देता हूं। मैंने बस इतना लिखा था कि और कैसी हो? इतने में फ्यूजियामा का ज्वालामुखी फट चुका था और उसकी धुआं मेरी सांसों में भर गया।
चौथे का दुःख सबसे बड़ा था। आप मुझे नस्लवादी मान सकते हैं लेकिन मेरे पास कहने के लिए उपमानों की कमी है। हम कृष्ण और राम के श्याम रंग की उपासना करते हैं लेकिन असल में चाहिए सबकुछ गोरा-गोरा। तो नहीं था भाई वह गोरा इसलिए कई लड़कियों ने उसे अस्वीकार कर दिया। इसे इस तरह भी देखा जा सकता है कि लड़कियां अब इतनी सक्षम तो हो गई हैं कि वह अपनी पसंद-नापसंद को जाहिर कर रही हैं। यह अच्छी बात है लेकिन वह क्या करे? गोरा तो हो नहीं सकता है। हां तो उसे गठबंधन में बंधना है लेकिन विपक्ष दल का कोई तैयार ही नहीं उससे अपना गठबंधन करने के लिए। उन्हें डर है कि इससे पार्टी कमजोर हो जाएगी।
हम चारों फूलों की खुशबुओं से सराबोर थे कि अचानक एक दोस्त ने बहादुर शाह ज़फ़र की एक गजल की एक पंक्ति बोली। मैं थोड़ा सा और समय लूंगा आपका। हम इतिहास के छात्र हैं। हमें इतिहास का सबसे पीड़ित और दुःखी राजा या बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ही लगे। जब सिंहासन पर विराजमान हुए तो नाममात्र के मुगल शासक थे। उनकी हुकूमत जो कभी कंधार से बंगाल तक और दूर दक्षिण से कश्मीर तक फैलीं हुई थी—वह सिमटकर दिल्ली तक हो गई थी। उस पर भी वह नाममात्र के ही शासक थे—असली शासक ईस्ट इंडिया कंपनी थी। 1857 के विद्रोह के बाद उनकी वह नाममात्र की सत्ता भी चलीं गई। उनके बेटों को उनकी आंखों के सामने गोलियों से भून दिया गया। उन्हें निर्वासित करके रंगून भेज दिया गया। ऐसा बदनसीब बादशाह शायद कोई हुआ हो। उनका जो दर्द है—वह उनकी हर शायरी या ग़ज़ल में झलकता है। वहीं शायरियां पढ़कर हम अपने इतिहासबोध और परेशानियों से निजात पाने की कोशिश करते हुए उनके दुःख में शामिल हो जाते हैं जो न जाने अपने दुखों से निजात पाकर कब का निकल गए।
फूलों की मदहोशी जब हम पर तारी हो गई—तब बहादुर शाह ज़फ़र की ग़ज़लें अनायास ही हमारे गले से निकलने लगीं। मेरा एक दोस्त फूलों की खुसबू लेने के बाद शेर बहुत मन से पढ़ता है। उसने पढ़ा—
“अब की जो राह-ए-मोहब्बत में उठाई तकलीफ़
सख़्त होती हमें मंज़िल कभी ऐसी तो न थी।”
फिर क्या हम बहादुर शाह ज़फ़र की सभी ग़ज़लों को मदहोशी में गुनगुनाते रहे। जब हम यह पंक्तियां पढ़ रहे थे तब हमारी आंखें बरबस सावनाई होने को हो आईं —
“कितना है बद-नसीब ‘ज़फ़र’ दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में।”
हम अब लगभग कई ग़ज़लें पढ़ चुके थे। फूलों की मदहोशी बढ़ती जा रही थी। इसी मदहोशी में हमें याद आए अपने पुरखा शायर अकबर इलाहाबादी। फिर क्या हम एक साथ धुन में गाने लगे—
‘हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है।’
पढ़ते-गाते हमारे दुःख धुआं होकर उड़ गए। वह दूर आसमान में हवा के साथ ऐसे घुल-मिल गए जैसे पानी में बर्फ। हमारे मुरझाए चेहरे रंगीनियत में डूब चुके थे। तभी एक दोस्त जो नौटंकी पर अपना शोध कर रहा है। वह जानकी बाई उर्फ़ छप्पन छुरी की बातें करता हुआ कोई किस्सा सुनाने लगा। लेकिन कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा था।
परसों सावन का पहला सोमवार था। सरकार ने कांवड़ियों के लिए पुख्ता इंतजाम कर दिया था। शास्त्री पुल का एक हिस्सा कांवड़ियों को दे दिया गया था। हमें पता था कि कल से हिंदू महीने का सावन लगने वाला है। सभी अपने इष्टदेव को जल चढ़ाने विभिन्न मंदिरों में जाएंगे लेकिन हम क्या करेंगे। हम तो ठहरे फूल की मदहोशी के दीवाने। हमारा क्या काम इन तीर्थयात्राओं में। हमारी भी कोई तीर्थयात्रा हो सकती है क्या? मोमिन खां मोमिन का एक शेर याद आ रहा है-
“उम्र सारी तो कटी ‘इश्क़-ए-बुताँ में ‘मोमिन’
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे।”
छोड़ भाई उन चीजों पर इतना दिमाग़ न लगाओ। जिनकी आस्था है वह जाएंगे। हम कौन होते हैं तय करने वाले की कौन क्या है। मैंने कल ही आमिर खान की फिल्म ‘सितारें जमी पर’ देखी थी—जिसका थीम ही यही है कि, “सबका अपना-अपना नार्मल होता है।” फिर यह उनका नार्मल है। हमारा नार्मल क्या हो सकता है। हम इस पर सोचें।

अकबर इलाहाबादी
तभी मेरा दिमाग़ कौंधा। लगा कि आधी मदहोशी छिटककर दूर जा गिरी। मेरे पास है अपना नार्मल। क्या तुम लोग सुनना चाहोगे? बताओ फिर। हम भी तीर्थयात्रा पर जाएंगे। तीनों हंसने लगे और कहा कि पागल हो क्या तुम। हां हम सही में तीर्थ यात्रा पर चलेंगे। जहां कोई नहीं जाता। अरे ऐसी कौन सी तीर्थयात्रा तुमने ढूंढ ली कि वहां कोई नहीं जाता। और यह बता कि जब कोई नहीं जाता तो वह तीर्थयात्रा कैसे हुई। मैं बोला कि रूको मैं बताता हूं। बताते हुए मेरे आंखों में चांद उतर गया था—जिसकी रोशनी से पूरी समां रोशन होने जा रही थी। और बताओ भी भाई? भाई हम लोग अपनी तीर्थयात्रा पर चलेंगे। हम चलेंगे अकबर इलाहाबादी और जानकी बाई उर्फ़ छप्पन छुरी की कब्र पर और खोजने पर मिल गई तो मोहम्मद खलील की कब्र पर भी चला जायेगा। क्या हम वहां जाएंगे? यह बोलते हुए तीनो चौंक गए लेकिन यह हम सबका नार्मल था। हम सब सहमत हो गए कि सोमवार नहीं रविवार को ही चलेंगे हम अपनी तीर्थयात्रा पर।
घड़ी देखीं तो रात के दस बजने वाले थे। हमने अपने-अपने कमरे का रास्ता लिया जो तीन दिशाओं में होकर जाता था—इस वादे के साथ कि कल पक्का मिलते हैं और हमारी तीर्थयात्रा शुरू होगी यूनिवर्सिटी चौराहे से।
कल हम सबको यूनिवर्सिटी चौराहे पर मिलना था। मैं झूंसी से आ रहा था। आज से सड़क की एक तरफ की पूरी लेन सिर्फ कांवड़ियों के लिए आरक्षित हो गई थी। दूसरी लेन में दो लेन बना दी गई है। मुझे चुंगी पहुँचने में बीस मिनट ज्यादा लगा। जैसे-जैसे सावन बढ़ता जाएगा—यह समय भी बढ़ता जाएगा। मैं चुंगी से उतरा ही था सामने ही एक बैटरी रिक्शे वाले ने बैठा लिया। एक लड़की पहले से बैठी हुई थी। मैं भी बैठ गया। वहां वह दस मिनट खड़ा रहा। फिर वह बालसन वाली सड़क पर आया। वहां भी वह खड़ा करके सवारियों का इंतजार करने लगा। मुझे देरी हो रही थी। मैं उठकर दूसरे आटो में बैठ गया। रिक्शा ड्राइवर आया और मुझसे कहने लगा कि आप चलकर मेरे रिक्शे पर बैठिए। मैने मना कर दिया। उसने मेरा बैग छीनकर अपने रिक्शे पर रख दिया। मैंने तुरंत उसके सामने जब इमरजेंसी नंबर 112 डायल किया और बोला कि रूको मैं मोबाइल भी दे देता हूं लेकर इसे भी चले जाओ। फिर उसने वापस बैग लाकर मुझे दे दिया।
मैं हंसता और सोचता रहा कि तीर्थयात्रा शुरू नहीं हुई और संकट अभी से आने शुरू हो गए। कहीं अपशगुन तो नहीं हो गया। मैं मानूं या न मानूं लेकिन भारतीय संविधान के अनुसार मैं हिन्दू हूं। मेरे घर में कभी किसी देवी-देवता की न कभी तस्वीर लगी, न कोई अनुष्ठान हुआ। हां यह जरूर था कि माता-पिता दोनों ईश्वर में विश्वास करते थे। पिता तो नहाते हुए अक्सर यह पद दोहराते— ‘सबसे बड़ी अयोध्या नगरी जहां राम लिए अवतार’। तीर्थयात्रा करने के लिए वह बस अयोध्या गए और सरयू नदी में नहाकर आ गए। कोई प्रसाद या किसी भी तरह का कुछ सामान वह कभी नहीं लाते। मां हमेशा गंगा-यमुना के संगम पर माघ मेला, अर्धकुंभ और कुंभ मेले में आती रहती हैं। कहने का मतलब है कि उन्होंने किसी हिंदू की तरह जो कर्मकांड किए जाते हैं—उन्हें कभी नहीं अपनाया। दोनों नदियों को माता मानते हुए उन्हें पूजते रहे। इसलिए ऐसा कोई संस्कार मेरे भीतर भी विकसित नही हुआ कि मैं खुद को एक हिंदू के रूप में पहचाना-जाना जाऊं लेकिन संविधान कहता है कि जो मुसलमान, जैन, बौद्ध, या किसी धर्म से संबंधित नहीं है—वहीं हिन्दू है। मुझे अक्सर कुछ आवेदन करते समय धर्म के कालम में हिंदू धर्म भरना पड़ा। मां-पिता के संस्कार मुझमें आए। मैं भी प्रकृति पूजा में यकीन करने लगा। जब भी किसी नदी के पास से गुजरता हूं तो सिर झुका लेता हूं। इलाहाबाद में रहते हुए कितनी बार गंगा-यमुना माई के पास श्रद्धा से गया—याद भी नहीं, लेकिन मूर्ति को पूजने में संकोची ही रहा। इधर थोड़ा सा परिवर्तन मेरे भीतर आया है। मैं श्रद्धा से किसी भी धर्मस्थल से गुजरते हुए सिर झुका लेता हूं।
तो हम जिस तीर्थ यात्रा पर निकले थे। वह हमारे शहर के भीतर ही थी। हमें कब्रिस्तान जाना था। कब्रिस्तान में तीर्थ यात्रा कैसे संभव हो सकती है? हो सकती है। हम इसी तीर्थ-यात्रा पर निकले थे। कब्रिस्तान में हिंदू देवता तो हो नहीं सकते थे। हां हम एक मुसलमान के पास जा रहे थे जिसने कहा था—
“मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं
फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं।”
अब आप समझ गए होंगे कि हम किसके पास जा रहे हैं। हम जा रहे हैं अकबर इलाहाबादी के पास—जो काला डांडा कब्रिस्तान में आज भी सोए हुए हैं। हमने पहले ही तय किया था कि किसी दिन हम अकबर इलाहाबादी के पास चलेंगे लेकिन सावन की बिल्कुल शुरूआत में हम यह यात्रा करेंगे—पता नहीं था। वो हमने कल मदहोशी में तय कर लिया। सोमवार को शहर की एक भारी भीड़ भक्ति में गंगा से जल उठाकर काशी के लिए निकलेगी—हम बिना कोई जल चढ़ाएं, बिना किसी तामझाम के अपनी भक्ति में अपने तीर्थ पर निकले।
मैं कटरा चौराहे पर पहुंचा। दो दोस्त पहले ही वहां खड़े थे। मुझे भूख लगी थी। मैंने केला लिया और खाना शुरू किया। वह कुछ और मुंह में गुलगुलाए हुए थे। इस तरह मैं आराम से चार केले खा गया। दो बचा था। बाद में वहीं एक-एक दोनों को दे दिया। एक को सिविल लाइंस में हनुमान मंदिर के पास मिलना था। वह आया था बिना हेलमेट के। मैंने कहा कि—‘चालान कटवाने के लिए तुम ज्यादा उतावले हो’। वैसे एक का रिकार्ड इस मामले में सबसे ख़राब है। वह जब भी गाड़ी चलाता है तो कहीं न कहीं पुलिस पकड़ ही लेती है।
अभी कुछ दिन पहले ही हम जारी बाजार जो रीवा राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित बाजार हैं। हम वहां से गुजर रहे थे। शाम का समय था। हम चापे चले जा रहे थे। सामने पुलिस के सीधे गोद में हम जा गिरें। हम गिड़गिड़ाने लगे कि सर देख लीजिए न थोड़ा। हम छात्र हैं। हमारे पास पैसे नहीं हैं। पुलिस वाले ने तुरंत बोला कि छात्र तो तुम लोग लगते नहीं? मैंने तुरंत पर्स में हाथ डाला और आईकार्ड निकालकर उनके हाथ में रख दिया। पुलिस वाला चौंक गया। आप तो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे हैं। हां सर। बताइए अब पीएचडी के छात्रों को भी हमें समझाना पड़ेगा कि मोटरसाइकिल सिर्फ दो लोगों के लिए होती है। अरे सर थोड़ा इमरजेंसी थी इसलिए तीन लोग बैठ गए। पुलिस वाले से हमने विनती की तो उसने कहा कि भाई चौकी प्रभारी भी हैं नहीं तो मैं छोड़ देता। हमने गुजारिश की कि जो सबसे कम का चालान हो—वही काटे। उसने कहा ठीक है, मैं हेलमेट न पहनने का चालान काट देता हूं। हेलमेट उसने पहना हुआ था। तभी चौकी प्रभारी भी आ गए। मैं पता नहीं किस मूड में था। मैंने कहा कि—“इ सारेन के अभिए मिलय के रहा”। चौकी प्रभारी चौक गए। पूछने लगे कि क्या बोला तुमने। मैंने कहा कि सर कह रहा था कि सबसे कम वाला चालान काटिए। चौकी प्रभारी बोले कि यार पुलिस हैं हम—कुछ तो हमारी इज्जत करो। चापे चले आ रहे हो। एक लोग उतरकर चले जाते तो कोई गुनाह हो जाता क्या। मैंने कहा कि सर अंधेरा होने की वजह से दिखाई नहीं दिया। अच्छा ठीक है जाओ अब।
एक बार तो सीधे मेरी पीठ पर डंडा पड़ते-पड़ते रह गया। पता नहीं कहां से उस दिन हमें शौंक चर्राया था कि आज पत्रिका चौराहे के पास चाय पीएंगे। गाड़ी फिर वही चला रहा था। हम हिंदू हास्टल से आगे कंपनी बाग के गेट पर पहुंचे थे कि देखा पुलिस की चेकिंग चल रही है। उसने बिलकुल पुलिस के सामने से गाड़ी मोड़ी, तभी पुलिस वाले ने जोर से डंडा चलाकर मारा—जो मेरी पीठ पर लगते-लगते बचा। डंडा इतना तेज था कि लगता तो मेरी पीठ पर निशान जरूर पड़ जाते। वह जाकर पीछे की लाइट पर लगा। हम वहां से भाग निकले।
एक बार तो हद हो गई। एक दोस्त ने बिल्कुल नई-नई बाइक खरीदी। हम विश्वविद्यालय में लाइब्रेरी के पास निराला की मूर्ति के नीचे बैठे हुए थे। हमने कहा कि दोस्तों में तुम पहले हो जिसने बाइक खरीदी है। कुछ खिलाओ-पिलाओ यार। उसने कहा कि चलो पनीर चौराहा कर्नलगंज चलते हैं। दादा के छोटे वाले मशहूर समोसे खाया जाएगा। तीन लोग एक ही बाइक पर बैठे। जैसे ही हालैंड हाल और डीजे हॉस्टल के बीच से होकर आगे चौराहे पर पहुंचे कि पुलिस ने पकड़ लिया। हमने विनती कि सर हम छात्र हैं। नई-नई बाइक है। अभी एजेंसी से निकालकर ही ला रहे हैं । पार्टी करने जा रहे हैं। छोड़ दीजिए। उसने छोड़ तो दिया लेकिन उनका जवाब बड़ा अश्लील था। कहने लगे कि ये बताओ तुम्हारी नई-नई शादी होगी तो क्या उस पर तीन-तीन लोग बैठोगे। हमने कुछ नहीं कहा। उस समय हम अगर गलती नहीं किए होते तो पुलिस अंकिल को समझाते कि पुलिस अंकिल आप बकलोल हैं। समझते हैं कि उदाहरण देकर समझाऊं।
कोरोना का समय खत्म ही हुआ था। हम बहुत दिनों से साथ नहीं बैठे थे। तय हुआ कि आज साथ बैठा जाएगा। रात भर दुनिया भर की बातें हम करते रहें क्यूंकि पिछले तीन महीने की बकाया बातें हमारे पास थीं। सुबह निकले। गाड़ी फिर वही चला रहा था। पार्वती अस्पताल के पास मोड़ पर आगे दिखाई नहीं देता है। उसने कहा कि सुबह-सुबह कौन पुलिस वाला आयेगा। लेकिन उसका भाग्य इतना ख़राब कि दिन निकलने से पहले ही ट्रैफिक पुलिस खड़ी थी। फिर पकड़े गए त्रिपलिंग में और ऊपर से किसी ने भी मास्क नहीं लगाया था। वहां भी हम कानून तोड़ दिए थे। हमारे पास गिड़गिड़ाने के सिवा फिर कोई रास्ता नहीं बचा। गिड़गिड़ाने के बाद उसने मास्क का चालान तो छोड़ दिया बाकी त्रिपलिंग की फाइन मार दी।
हम चारों हनुमान मंदिर सिविल लाइंस में मिले। आज उसके पास हेलमेट भी था और बैठने वाले भी दो ही थे। अजय आज बिना हेलमेट का आया था। उसका भाग्य बहुत अच्छा है। कभी पुलिस ने नहीं पकड़ा है। मैंने कहा कि बच्चू आज तुम पकड़े जाओगे। उसने कहा कि मैं उसकी तरह नहीं हूं—जो बार-बार पकड़ा ही जाऊं। इतनी खराब किस्मत नहीं है हमारी।
हम अब अपनी तीर्थ के पथ पर थे। निरंजन डाट पुल से पुराने शहर में दाखिल हुए तो पुरानापन का एहसास भी होना शुरू हो गया। हम सीधे पहुंचे चौक घंटाघर। वहां से आगे शाहगंज कोतवाली होते हुए हिम्मतगंज में दाखिल हो गये। वह दोनों पहले आ चुके थे लेकिन रास्ता भूल गए। काला डांडा कब्रिस्तान का पता गूगल मैप पर डाला। उसने हमें उस गेट पर पहुंचा दिया जो बंद था। हमें अब स्थानीय लोगों से रास्ता पूछ्ना था। रत्नेश एक आदमी के पास गया। पूछा कि काला डांडा कब्रिस्तान किधर से जाएं। उसने पिच्च से गुटका थूकते हुए कहा कि —‘अमा भाई तुम्हारे चक्कर में अभी-अभी खाया गुटका थूकना पड़ा। जाओ आगे गली से मुड़ जाना’। हम गली से होते हुए पहुंचे। एक बड़े बोर्ड पर लिखा हुआ था काला डांडा कब्रिस्तान। और भी जानकारियां थीं। खैर उससे हमें क्या मतलब। हम सीधे गाड़ी से कब्रिस्तान में दाखिल हो गये। रत्नेश जानता था कि अकबर इलाहाबादी की कब्र कहां है? एक तरह से कहें तो हम अपनी तीर्थयात्रा के पहले पड़ाव पर आ चुके थे।
इतनी नीरव शांति वहां थी कि जैसे लग रहा था कि हम गांव में आ गये है। अबकि बार हुई बढ़िया बरसात ने पूरे कब्रिस्तान को एक भरे बगीचे में बदल दिया है —जहां तमाम प्रकार के पेड़-पौधे और चिड़ियों की चहचहाहट के सिवा कोई शोर नहीं था। बस एक कुत्ता उल्टी करने की कोशिश में खांसे जा रहा था। थोड़ा सा खुसुर-फुसुर की आवाज वहां से आ रहीं थीं— जहां कुछ लोग बैठे हुए थे—जो कब्र खोदने का काम करते थे। बाकी बगल में ही दो बच्चे रस्सी डालकर झूला झूल रहे थे। उन्हें झूला झूलते देख बचपन याद हो आया। वह पेड़ याद आया जहां सावन भर हम झूला झूलते और गाना गाते थे।
हम अकबर इलाहाबादी के पैर की तरफ बैठे। ठीक उसी तरह जैसे कोई बुजुर्ग खटिया पर लेते हो और कोई बालक जाकर उनके गोड़वारी बैठ जाए। हम गोडवारी बैठे। बातें करते रहे कि अकबर इलाहाबादी पर किसने क्या और कैसा काम किया है। वैसे परम्परा है कि कब्र पर जाकर फातिहा पढ़ते हैं लेकिन हमें इस संस्कार के बारे में पता है नही—कि करते क्या हैं और बोलते क्या हैं। हमें नहीं पता था। हम उन्हें कैसे श्रद्धांजलि दें। मैंने तुरंत गुलाम अली की आवाज में उनकी मशहूर ग़ज़ल—‘हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो पी ली है……’ यूट्यूब पर बजा दिया। गाना बजता रहा—हम उनकी तरफ देखकर सुनते रहें। तभी एक आदमी वहां टहलते हुए आए। पूछा कि आप लोगों के यह कुछ लगते हैं क्या? हमने कहा कि लगते तो कुछ नहीं है लेकिन हमारा रिश्ता बड़ा प्यारा है। नाम पूछने पर उन्हें पता चला कि हम हिंदू हैं तो वह और चौक गए। फिर हमने उन्हें बताया कि अकबर इलाहाबादी कौन थे? क्या हैसियत थी उनकी? और हम हिंदू होते हुए भी उनकी कब्र पर क्यूँ आएं हैं। फिर वह टहलते हुए निकल गए।
बगल में एक बूढ़े आदमी कुछ खोद रहे थे। अनुमान लगाया कि कब्र खोद रहे होंगे। मैं नजदीक से जाकर देखना चाहता था। उनके पास गया तो देखा कि वह कब्रों की मरम्मत कर रहे हैं—जो बारिश या किसी और कारण से दब गई हैं। बगल में एक कब्र थी। उसकी ऊंचाई ज्यादा थी लेकिन उस पर घास बहुत उगी थीं। उस पर एक शिलापट्ट लगा था। मैंने घासों को हटाकर उसकी एक तस्वीर ली। उसके आगे एक कब्र के ऊपर मकबरा बना था। उसकी खंभे में लगी ईटे झरते -झरते ऐसे हो गई थीं—कि वह पूरा लाल सा दिखाई दे रहा था। दिल में आया कि चलकर देखूं क्या है। फिर उधर कई नई कब्रों को देखकर जाने की हिम्मत नहीं हुई। मैं वहां से लौट आया।
वापस आया। तीनों बैठे थे। मैंने कहा कि चलों उनकी ग़ज़लों को पढ़ते हैं। फिर हमने उनकी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल जो अक्सर हम सभी सुना करते हैं—बहुत ही बेसुरे अंदाज में गाना शुरू किया। सभी की लय अलग-अलग हो जाती जैसे बचपन में हम लिल्ली घोड़ी के झुंड को किसी लकड़ी से छेड़ देते और वह चारों ओर बिखर जातीं। मैंने कहा कि ऐसे नहीं होगा—एक बार रिहर्सल करते हैं—फिर शूट करेंगे। हमने एक बार बिना रिकार्ड के उसे गुनगुनाया। अब हमारे सुर कुछ हद तक आपस में मिलने लगे। फिर हमने अपने बेसुरे स्वर में उनकी ग़ज़ल को गाया। हमारे रोम-रोम पुलकित हो उठे। आगे हमने उनकी कई ग़ज़लों का अपने अंदाज में पाठ किया। वहां कोई श्रोता नहीं था। याद आया कोई तो था—वहां जो हमारे गानों को सुन कर हमें कोस रहा था। हमारे ठीक ऊपर नीम की डाल पर तीन उल्लू बैठे—हमारी ओर एकटक देखे जा रहे थे। अजय बोला कि—‘देख त पावती न होईहै। खाली सुनत होईहै’ हां वह हमारे श्रोता थे। इतनी तल्लीनता से हमें कोई सुनेगा—यकीन नहीं हो रहा था। बगल में दो कुत्ते भी तो थे श्रोता के रूप में। एक को हमारा गाना पसंद नहीं आया। उसने झूठ-मूठ का गला कखांरने की नौटंकी शुरू कर दी। जैसे ही हम कोई टुकड़ा शायरी या ग़ज़ल का बोलते वह खांसने लगता। फिर भी हमने अपना गाना-बजाना जारी रखा।
आम के ऊपर लिखी ग़ज़ल को अजय ने पढ़ा तो मजा आते-आते रह गया। रत्नेश भाई का आत्मविश्वास पता नहीं कहां चला जाता है—अगर उनके अंदर शुद्ध पानी की खुराक न जाए तो। खुराकी पाते ही वह खुर्राट हो जाते हैं। फिर बेजान सी लग रही शायरी में जादू से जान डाल देते हैं। मैंने कहा भी कि उस्ताद के पास आए हो तो खुराकी लेकर आनी चाहिए न। बताओ कम से कम अकबर इलाहाबादी साहब को ही चढ़ा देते। वह तो तरस ही गए होंगे इतने दिनों बिना खुराक़ लिए। जाओ लेकर आओ। अबे छोड़ कौन जाएगा लेने। तभी एक तीन इंच की चिड़िया फुदकती हुई आई और डाल पर बैठ गई। हम कितने अज्ञानी हो गए हैं कि उस चिड़िया का नाम तक नहीं जानते और करते क्या हैं? पीएचडी। ऐसी पीएचडी कर भी लिया तो क्या पीएचडी होगी—जब यह जानते ही नहीं कि हमारे आंगन या छत या पेड़ पर बैठने वाली चिड़िया का नाम क्या है। कहने को तो शेक्सपियर की तरह कह ही सकते हैं कि नाम में क्या रखा है लेकिन यह शेक्सपियर को ही शोभा देता है—हमें तो इनके नाम पता होना चाहिए। आखिरकार हमें यह भी नहीं पता है कि बगल में धरती को ढंकी हुई घासों का नाम क्या है। यह पारम्परिकता और आधुनिकता का विरोधाभास है—जो हममें दिखाई दे रहा था। हमें पता है कि अकबर इलाहाबादी कौन थे लेकिन हम भूल गए हैं कि अमुक चिड़िया-पशु-कीट-पतंग-मछली-भैस और गाय की नस्ल- घास-पेड़ का नाम क्या है। अकबर इलाहाबादी का ही एक शेर याद आ रहा है—
“क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ।”
आम पर शायरी पढ़ने के बाद यह भी याद आया कि हम भूल गए हैं कि कौन सा आम किस प्रजाति का है। जब मैं यह कह रहा हूं तो इसका मतलब मंडी में बिकने वाले आमों से नहीं बल्कि किसी बाग में लगे आमों की नस्ल से है। पहले तो जो किस्म होती—उसे देखकर ही बता देता कि सेनुरहवा आम बा। अब तो नाम ही नहीं सुझाता। वैसे अकबर इलाहाबादी के बारे में जानते तो होंगे ही आप। मुझे पक्का यकीं है कि आप जानते हैं कि अकबर इलाहाबादी कौन थे। नहीं जानते हैं तो अब जान जायेंगे।
अकबर इलाहाबादी को सलाम करते हुए हम उस रास्ते के तरफ़ रूखसत हुए—फिर हम आगें खडंजे वाले रास्ते से होकर आगे बढे। एक मजार जो रंगरोगन से चमक रही थी उसको छोड़कर हम उस मजार की तरफ बढे जो खंडहर में तब्दील हो रही थी। रास्ता आगे जाकर खत्म हो गया। अब हमें कांटों और झाड़ियों से होकर जाना था। मैंने कहा कि देखना कहीं सांप न डंस ले। तीनों ने मुझसे कहा कि तुम जूते पहने हुए हो—तुम आगे चलों। हम मकबरे के पास पहुंचे। कब्र की हालत तो पूछिए मत। चारों तरफ़ कांटों और झाड़ियों से घिरा हुआ यह अपने गिर जाने का जैसे इंतजार कर रहा हो। कब्र पर लगाए गए शिलापट्ट से अक्षर वैसे ही धूलधूसरित हो गए हैं—जैसे यह कब्र और मकबरा। हमने वहां लगायें गए शिलापट्ट को गूगल ट्रांसलेट की मदद से जानना चाहा कि आखिर इतनी पुरानी मजार है किसकी? उसी के बगल में एक और कब्र थी लेकिन अक्षरों के ठीक से दिखाई न देने के कारण हम उनकी पहचान नही कर पायें। उस पर किसी ज़माने में कोतवाल रहे खान लियाकत अली का नाम भर आ रहा था। जो थोडा बहुत अनुवाद में आ रहा था—वह कुछ गज़ल जैसा था या आयतें रहीं होंगी। हां तो यहां की हालत देखकर अकबर इलाहाबादी का ही एक शेर याद आने लगा—
“आई होगी किसी को हिज्र में मौत
मुझ को तो नींद भी नहीं आती।”
हम वापस निकले। प्यास के मारे गला सूखा जा रहा था। हम एक दुकान पर पहुंचे —जहां दो महिलाएं बैठी पंखा झल रहीं थीं। हमने पानी मांगा और जैसे ही मोबाइल निकालकर क्यूआर कोड मांगा —उन्होंने पानी वापस ले लिया। कहा कि हम मोबाइल से पैसा नहीं लेते। किसी के पास आफलाइन पैसे नहीं थे सबके पास आनलाइन कैश था। क्या विडंबना पूर्ण समय था। रूपए सबके पास हैं लेकिन अभी किसी काम के नहीं। आगे हमें दूसरी दुकान खोजनी पड़ी—जहां आनलाईन रूपए का भुगतान हो सकता हो। एक दुकान मिली। पानी मांगा। वह इतना ठंडा पानी दियें कि पीते ही लगा कि दांत को पाला मार दिया है। मतलब इतना ठंडा पानी पिएं कैसे। प्यास जाने से रही। बस गला सबने तर कर लिया।
अब हम अपनी तीर्थयात्रा के अंतिम पड़ाव पर थे। हमें जाना था साठ फीट रोड़—जिसके किनारे लगा हुआ है पुराना काला डांडा कब्रिस्तान। इस कब्रिस्तान में दफ़न हैं औपनिवेशिक काल की मशहूर फनकार जानकी बाई उर्फ़ छप्पन छुरी। अपने जमाने की मशहूर गायिका। किसी भी राग का गाना हो—जब उनके गले से निकलता तो मिठास घोलता हुआ दिलों में समा जाता। मुझे पता है कि अगर आप इलाहाबाद के नहीं हैं तो जानकी बाई के बारे में शायद नहीं जानते होंगे। वैसे उनके ऊपर लिखे गए उपन्यास को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर नीलम शरण गौर ने एक उपन्यास अंग्रेजी में लिखा है—‘रेक्वीम इन रागा जानकी’।हिंदी में शायद मेरी जानकारी में कोई किताब उन पर नहीं है।
जानकी बाई फ़सानों का खजाना हैं। इतनी किवदंतियां है कि उन्हें एक साथ रख दिया जाय तो बहुत दिलचस्प किस्से बन जायेंगे। वह बनारस में पैदा हुई लेकिन परिस्थितियों की सवारी करती हुई इलाहाबाद में ठहर गईं। फिर यहीं की होकर रह गईं। उनके इलाहाबाद आने को लेकर भी कई किस्से मशहूर हैं। कहते हैं कि पार्वती नाम की एक महिला के प्रभाव में आकर जानकी का परिवार इलाहाबाद आ गया। दूसरी कहानी है कि बनारस की उनकी मां मानकी धोखे से इलाहाबाद के एक कोठे के हाथों बिक गई। इस तरह वह इलाहाबाद आईं। वे चौक में घंटा घर के पास एक मकान में रहने लगीं। जानकी को उस्ताद हस्सू खाँ साहब से गायन का, घसीटे से सारंगी का और रहीमुद्दीन से तबले का विधिवत प्रशिक्षण मिला। नीलम शरण गौर अपनी किताब “रेक्वीम इन रागा जानकी” में लिखती हैं कि उनके गुरु हस्सू खान ने एक बार उनसे कहा था —
“याद रखो, तुम सिर्फ कुछ समय के लिए कलाकार नहीं हो। तुम हर समय कलाकार हो, नींद में भी और जागते हुए भी। तुम अपने माध्यम में वैसे ही सांस लेते हो जैसे मछली पानी में सांस लेती है। यही तुम्हारे अस्तित्व का मूल कारण है। यही तुम्हारे कानों, तुम्हारी आँखों और तुम्हारे रक्त प्रवाह को दिशा देता है। चाहे दुनिया तुम्हें स्वीकार करे या अस्वीकार करे, यह मायने नहीं रखता। जिस तत्व में तुम निवास करते हो और जिसमें तुम पूरी तरह डूबे रहते हो, वह तुम्हारे दिन-रात को उद्देश्य और सत्य के वादे से भर देता है। उस एक परिपूर्ण स्वर की प्राप्ति ही ईश्वर की मुद्रा है, जिसके द्वारा तुम्हें अप्रत्याशित और संयोगवश भुगतान मिलता है।”
जानकी बाई गीत भी लिखती थीं और स्वरचित गीत भी गाती थीं। एक मिथ है कि उनकी मां किसी ग्वाले के घर पैदा हुई थीं—दूसरा कि किसी हलवाई की संतान थीं। वह भी गाना गाती थी। गाने का संस्कार उन्हें मां से ही मिला। जानकी की संगीत में रूचि देखते हुए उन्हें संगीत की शिक्षा दिलाने के साथ उर्दू, फ़ारसी, हिंदी, अंग्रेजी भाषाओं की भी शिक्षा दी गई।

जानकी बाई उर्फ छप्पन छुरी
‘छप्पन छुरी’ कहलाने के पीछे कई कहानियां लोग बताते हैं। एक है कि 1876 में काशी की एक संगीत प्रतियोगिता में उन्होंने प्रख्यात गायक रघुनंदन दुबे को पराजित किया था। प्रतियोगिता में काशी की रानी साहिबा ने जानकी को पुरस्कार दिया था। कहा जाता है कि महज़ बारह वर्ष की जानकी से हारने पर रघुनंदन दुबे ने उन्हें जान से मारना चाहा। चाकू से रघुनंदन दुबे ने जानकी पर अनगिनत वार किए। जानकी के शरीर पर कुल छप्पन घाव थे, इसीलिए उन्हें छप्पन छुरी कहा जाने लगा। काशी की रानी साहिबा ने मिशन अस्पताल में जानकी का इलाज कराया। छः साल के इलाज के बाद जानकी ठीक हुईं। इसलिए उनका नाम पड़ा ‘छप्पनछुरी’। दूसरी कहानी जो सुनने को मिलती है वह है कि एक बार किसी प्रशंसक की अश्लील फरमाईश पर वे उससे लड़ बैठी। अपराधी किस्म के उस व्यक्ति ने उनके चेहरे पर छुरी से छप्पन बार वार कर उनका चेहरा बिगाड़ दिया। ‘छप्पनछुरी’ का नाम तब से जानकी के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया।
कपिल पांडे ने अपने भोजपुरी उपन्यास ‘फुलसुंघी’ में इस घटना का जिक्र कुछ इस प्रकार किया है—
“सुनल जाला जे प्रयागराज के गणिका जानकीबाई के गवनई पर रीझ के आपन सब-कुछ निछावर कर देवेवाला प्रेमी जब ओकरा करिया-कलूठ चेचक के दाग वाला चेहरा के देखलस त ऊ पगला गइल आ जानकीवाई के मार छुरी के गोद दिहलस। छुरी के छप्पन घाव खाइयो के जानकीबाई जीयत बाँच गइली, आ नाम बदल गइल, हो गइली छप्पनछुरी।”(पांडेय कपिल, फुलसुंघी, भोजपुरी शोध संस्थान पटना, संस्करण 1977, पृष्ट11)
नीलम शरन गौर ने भी अपने उपन्यास में इस घटना का जिक्र किया है लेकिन वह दोनों ही किस्सों से अलग कुछ और भी कहती हैं। वह लिखती हैं कि जानकी न केवल बला की खूबसूरत थीं बल्कि अपनी सुरीली आवाज से जादू भी करती थीं। जब वह महज 12 साल की थीं तो एक पुलिस कांस्टेबल रघुनंदन उन पर रीझ गया। उसने जानकी को प्रेम प्रस्ताव भेजा जो उन्होंने ठुकरा दिया। फिर उसने यौन संबंध बनाना चाहा तो उसमें भी नाकाम हो गया। गुस्से में रघुनंदन ने उन पर हमला किया। शरीर से लेकर चेहरे तक घाव ही घाव करता चला गया। जानकी की हालत गंभीर हो गई। बचने की सूरत नहीं थी लेकिन वह बच तो गईं लेकिन चेहरे की सुंदरता की जगह घाव के दाग ले चुके थे।(नीलम शरन गौर,पेंविन इंडिया,संस्करण 2018, पृष्ट 8-17)
इतने जख्म खाकर भी जानकी के दिल से संगीत का जुनून कम नहीं हुआ। वह घूंघट से अपने जख्मों को ढांककर गाती रहीं। उनके बारे में एक फ़साना और मिलता है कि एक बार जानकी बाई अतरसुइया में एक चबूतरे पर गा रही थीं तो चबूतरा चाँदी के सिक्कों से पट गया था। गिनने पर चौदह हजार रुपये निकले थे। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें कई अंगरक्षक और दुनाली बंदूक का लाइसेंस दिया था। कहते हैं कि इलाहाबाद में अकबर इलाहाबादी साहब उनके बहुत करीबीयों में से थे। कलकत्ता की प्रसिद्ध गायिका गौहर जान एक बार इलाहाबाद आईं और वह जानकी बाई के घर ठहरीं। जब गौहर जान जाने को हुईं तो उन्होंने अपने मेज़बान से कहा, “मेरा दिल ख़ान बहादुर सैयद अकबर इलाहाबादी से मिलने के लिए तरस रहा है।” अगले दिन दोनों अकबर इलाहाबादी के पास पहुँची। जानकी बाई ने परिचय देते हुए कहा कि यह गौहर जान हैं, कलकत्ता की एक बहुत प्रसिद्ध गायिका हैं। यह आपसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक थी, इसलिए मैं इन्हें आपसे मिलवाने ले आई। अकबर ने कहा— “मैंने ऐसा सौभाग्य पाने के लिए क्या किया था, वरना मैं न तो कोई पैगम्बर हूँ, न उपदेशक, न कोई धर्मगुरु, न कोई राजकुमार, न ही कोई ऐसा संत जिसे तीर्थयात्रा के योग्य समझा जाए। मैं पहले एक न्यायाधीश हुआ करता था, लेकिन अब मैं सेवानिवृत्त हो गया हूँ और केवल एक बेचारा अकबर हूँ, जो सोच रहा हूँ कि आपकी सेवा में क्या भेंट अर्पित करूँ। खैर, मैं एक शेर स्मृति के रूप में लिखूंगा।“ यह कहकर उन्होंने कागज के एक टुकड़े पर निम्नलिखित शेर लिखा और गौहर जान को दे दिया। जिस पर लिखा—
“ख़ुशनसीब आज भला कौन है गौहर के सिवा
सब कुछ अल्लाह ने दे रखा है शौहर के सिवा।”
गौहर ने भी फ़ौरन जवाब में एक शेर कह डाला—
“यूं तो गौहर को मुय्यासर हैं हजारों शोहर,
हां पसंद उनको नहीं एक भी अकबर के सिवा।”
धुव गुप्त अपने एक लेख में लिखते हैं कि गौहर जान के साथ जानकी की मित्रता के साथ प्रतिद्वंदिता के किस्से आज भी कहे-सुने जाते हैं। उन दोनों की लोकप्रियता और प्रतिद्वंदिता को भुनाने के मक़सद से कई संगीत मंचों पर उन्हें एक साथ बुलाया जाता था। ऐसे सभी आयोजन बेहिसाब सफल होते थे। दोनों का एक बहुचर्चित मुकाबला 1910 में इलाहाबाद में हुआ था। पहले कई घंटों तक गौहर का गायन चला। जानकी की बारी आधी रात को आई। जब जानकी ने गाना शुरू किया तो महफ़िल जल्दी ही उनकी गिरफ्त में आ गई। उसके बाद श्रोताओं की गुज़ारिश पर गौहर और जानकी को आमने-सामने बिठाकर उन्हें एक साथ गवाने की कोशिश की गई। गौहर आई तो सही, लेकिन तबतक उनका गला जवाब दे चुका था। जानकी सुबह तक अकेली गाती रहीं। कहते हैं कि सन 1911 में जॉर्ज पंचम की ताजपोशी पर मुजरा का न्योता इलाहाबाद की जानकीबाई छप्पनछुरी को मिला। मगर साथ में यह ताकीद भी कि एक और गायिका साथ हो। जानकीबाई की अपनी पसंद थी। उन्होंने गौहरजान को बुलावा भेजा। ताजपोशी में गौहर जान ने राग सूरदासी मल्हार में एक ख्याल गाया और मजमा लूट लिया। किंग के स्वागत में दोनों ने मिलकर एक बेहतरीन बंदिश सुनाई थीं – ये है ताजपोशी का जलसा, मुबारक हो मुबारक हो !( ध्रुव गुप्त, दास्ताँ छप्पन छुरी की, लोक दर्पण, 23 अगस्त 2023)
सभा में मौजूद विदेशी पत्रकारों और कलाप्रेमियों ने अखबारों में लेख लिखकर दोनों की युगलबंदी की तारीफ़ की थी। बात अखबारों से होती हुई कलकत्ते की मशहूर गायिका मलकाजान तक पहुंची। उन्हें बात बुरी लगी। उन्होंने हैदराबाद के निज़ाम को चिट्ठी लिखी कि वह उनसे क्यों मुंह फेरे हुए हैं। निज़ाम ने लौटती डाक से चिट्ठी भिजवाई कि गलती तो हुई है और इसके एवज में उन्हें इसी साल हैदराबाद बुलाया जाएगा—गौहर जान के साथ लेकिन उन्होंने गौहर जान के साथ गाने से इंकार कर दिया। उसी जमाने में इलाहाबाद के किले में तब एक रंगमहल हुआ करता था। जिसमें दस दरवाजे थे। इसी रंग महल में 1910-11 में जानकी बाई ने एक मशहूर गायन एक अंग्रेज लाटसाहब के लिए गाया था—जिसे आगे चलकर लता जी ने सत्यम शिवम सुंदरम फिल्म में गाया—
“रंग महल के दस दरवाजे
ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी
सईंया निकस गये, नैना लड़ी थी।”
इस रंग महल की एक खूबसूरत तस्वीर विलियम होजेज ने बनाई थी—जब वह भारत यात्रा पर आया था। सालों तक दोनों गायिकाओं के प्रशंसकों और संगीत के जानकारों के बीच इस बात पर बहस चलती रही थी कि उन दोनों में श्रेष्ठ गायिका कौन है। जिन लोगों ने दोनों गायिकाओं को एक साथ सुना था—उनमें से ज्यादातर लोग मानते थे कि गौहर जानकी से ज्यादा खूबसूरत थीं, लेकिन जानकी गौहर से बेहतर गायिका थीं।
देश ब्रिटिश हुकूमत से लड़ रहा था। उस समय इलाहाबाद एक बड़े केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका था। सभी बड़े नेता उनके संगीत का रसपान करने आते। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी उनके गीतों के दीवाने थे। नगर में उनके प्रशंसकों में सर तेज बहादुर सप्रू, मोती लाल नेहरू, तेज नारायण मुल्ला, जस्टिस कन्हैया लाल, सुरेन्द्र नाथ सेन, मुंशी ईश्वर शरण, लाला राम दयाल, हृदय नाथ कुंजरू और अमर नाथ झा आदि भी थे। जानकी बाई ने सीरत पाई थी—सूरत नहीं। रत्नेश ने बताया कि उन्हें एक बार रीवा के राजा के यहाँ गाना था लेकिन वह उनकी सूरत देखकर सुनने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे थे। जानकी बाई ने कहा कि हूजूर पर्दा करके मैं गाऊंगी। फिर जब उन्होंने गाना शुरू किया तो महफ़िल खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं। बाद में राजा ने उन्हें बहुमूल्य उपहारों से नवाजा। मैंने एक तत्कालीन पत्रिका में उनकी एक फोटो देखी हैं—जिसमें वह गहनों से इस कदर लिपटी हुई हैं जैसे भगवान शंकर के गले में नाग। पैसा और शोहरत दोनों कमाया जानकी बाई ने। पुरूष प्रधान समाज में उन्होंने अपने संगीत का झंड़ा बुलंद किया। जब वे ‘गुलनारों में राधा प्यारी बसे’ दादरा गातीं तो श्रोता सम्मोहित हो जाते। जानकी बाई को लोक धुनों की बहुत अच्छी समझ थी। पूरबी, चैती, कजरी, बन्नी-बन्ना, सोहर फाग और गारी भी जानकी बाई गाती थीं। वह हमेशा अपना पूरा नाम जानकी बाई इलाहाबादी बताती थीं। शायद यह उन पर अकबर इलाहाबादी के प्रभाव का असर हो।
अपने तमाम गाए गीत उन्होंने ख़ुद लिखे थे। उनके गीतों का एक संग्रह तब ‘दीवान-ए-जानकी’ नाम से छपा था। उनका एक गीत ‘इस नगरी के दस दरवाज़े /ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी/सैया निकल गए मैं ना लड़ी थी’ बेहद लोकप्रिय हुआ था। सावन के मौसम में बादलों और बरसात पर उन्होंने एक शानदार कजरी गाई जो आज भी मन मोह लेती है—
“रूमझूम बदरवा बरसै
अली उन बिन जियारा तरसे
चलत पुरवै छूम छन नन नन नन
झिंगुरवा बोले यम झन नन नन
ऊंची महलया बिकुवा बोले
करत [खनक?] अधिकारवा खड़के
रुमझुम बदरवा बरसे”
उनकी मृत्यु के साठ साल बाद एच. एम. वी ने 1994 में ‘चेयरमैन्स चॉइस’ श्रृंखला के अंतर्गत उनके कुछ गीतों के ऑडियो ज़ारी किए थे। लोग बताते हैं कि जानकी बाई का पारिवारिक जीवन सुखमय था। उन्होंने रसूलाबाद के एक वकील अब्दुल हक से शादी कर ली और इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। यह भी कहते हैं कि अब्दुल हक की निगाह उनकी बेशुमार दौलत पर थी। 18 मई 1934 को जानकी बाई का निधन हो गया। उनके लिए न जनाज़े की नमाज़ पढ़ी गई और न ही जनाज़े में लोग शरीक हुए। किराए के चार मजदूरों और चन्द लोगों ने उन्हें काला डांडा कब्रिस्तान में दफ़न कर दिया। मुझे क़मर जलालवी का एक शेर याद आ रहा है-
“शुक्रिया ऐ क़ब्र तक पहुँचाने वालो शुक्रिया
अब अकेले ही चले जाएँगे इस मंज़िल से हम”
हमने उनके श्रद्धांजलि स्वरूप यूट्यूब पर उपलब्ध उनके कुछ गाने वहां सुने और उन्हें भी सुनाए। यहां तितलियां हमारी सहचरी थी। हरे रंग से लिपटी धरती पर हरे रंग की तितलियां मन को और हरा कर रहीं थीं। हमने काफी बातें कीं वहां बैठकर। कुछ सियासी—कुछ मजाक—कुछ जानकी बाई के बारे में। हमने मजाक में ही कहा कि अखिलेश यादव जी की सरकार बनने पर हम एक दरख्वास्त उन्हें भेजेंगे कि वह ग्वालिन गायिका की बदहाल मजार को सही करवायें। इस सरकार में इस काम की उम्मीद करना तो बेमानी है। उन्हें जानकी बाई से क्या ही मतलब। फिर हमने सोचा कि यह सोचना ही ग़लत है कि यह सरकार कुछ नहीं करेगी। एक बार दरख्वास्त करके देखते हैं कि क्या होता है। हम अपनी विरासत को लेकर कितने उदासीन हैं—यह बात मुझे शहर की तमाम विरासतों के धीरे-धीरे ढहते जाने में दिखाई देती है। उनकी कब्र से मिट्टी हट गई है। कुत्तें और नशेड़ियों का अड्डा यहाँ बन गया है। कब्र की हालत बहुत दयनीय है। ऐसे चलता रहा तो जानकी बाई की कब्र एक दिन गुमनाम हो जाएगी। उनके मकबरे गिर जाएंगे और मिल जाएंगे—उसी मिट्टी में जिसके ऊपर खड़े हैं। फिर उनके ऊपर फूल खिलेंगे। हम फिर भी जाएंगे मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों को गुनगुनाते हुए—
“रहें ना रहें हम, महका करेंगे
बनके कली, बनके सबा बाग़-ए-वफ़ा में
रहें ना रहें हम
मौसम कोई हो, इस चमन में
रंग बनके रहेंगे हम फ़िज़ा में
चाहत की ख़ुशबू यूँ ही ज़ुल्फ़ों से
उड़ेगी ख़िज़ाँ हो या बहारें
यूँ ही झूमते
यूँ ही झूमते और खिलते रहेंगे
बनके कली, बनके सबा बाग़-ए-वफ़ा में
रहें ना रहें हम, महका करेंगे
बनके कली, बनके सबा बाग़-ए-वफ़ा में।”
हमने वहां यादें संजोने के लिए कुछ तस्वीरें उतारीं। मैंने एक यूटोपिया का सपना देखा। सपना था कि अकबर इलाहाबादी के जन्मदिन पर उनकी कब्र पर महफ़िल सजी और उसमें देश के नामचीन शायर और कवि अपनी-अपनी प्रस्तुतियां दे रहे हैं और लगा है एक बड़ा सा शमियाना जानकी बाई की मजार पर—जिसमें चैता, ठुमरी, कजरी, ददरी और भी गीतों की महफ़िल का एक दौर चल रहा है। है ना कितना हसीं सपना। कम से कम लखनऊ स्थित बेगम अख्तर की कब्र से सबक लेते हुए इलाहाबाद के नागरिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, बुद्धजीवी और सामाजिक कार्यकर्ताओं को इन दोनों की विरासत को संजोने का प्रयत्न करना चाहिए। अब हम चल दिए उस तरफ जहां फूल खिलते हैं—जो हमको मदहोश कर देते हैं। आखिर हम अकबर इलाहाबादी और जानकी बाई से मिलकर आ रहे थे।

बेगम अख़्तर की मजार
हम यात्रा के अंतिम पड़ाव पर थे। अब हमें पता करना था कि अवधी गानों को अपार लोकप्रियता दिलाने वाले अपने जमाने के मशहूर गायक मोहम्मद खलील कहां दफ़न हैं? यहां से हम तीर्थयात्री से शोधयात्री में बदल गए। किसी को नहीं पता कि उन्हें कहां दफ़नाया गया। आप इनके बारे में भी नहीं जानते हैं? द लल्लन टॉप में प्रकाशित एक लेख के अनुसार वह मोतिहारी के भवानीपुर जिरात मोहल्ला के रहने वाले थे। मोहम्मद खलील का तबादला बलिया से इलाहाबाद हुआ। फिर इलाहाबाद वह जमीन बना जहां उनकी गायकी के शौक ने भोजपुरी के पहले बैंड या यूं कहिए कि ऑर्केस्ट्रा बैंड “झंकार पार्टी” को मजबूती से स्थापित किया, जिसके नींव बलिया की जमीन में डाली गई थी. वह रेलवे में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी करते थे। बलिया से स्थानांतरित होकर जब वह इलाहाबाद आएं तो यहीं के होकर रह गए।(मुन्ना के.पांडे, 4 फ़रवरी 2020) उनके गाए गानों का लोग रेडियो पर इंतजार करते। जब वह— अमवा बउर गइले/ बोले कोइलरिया या देवेंद्र चंचल के लिखे गीत छलकल गगरिया मोर निर्मोहिया या गीतकार भोलानाथ गहमरी के लिखे गीत कउने खोतवा में लुकइलू अहिरे बालम चिरई गाते तो लोग ठहर जाते। कुछ गाने आकाशवाणी पर उनके रिकार्ड हुए—जिन्हें यूट्यूब पर सुना जा सकता है। वह आज भी सावन के मौसम में मनभावन लगते हैं। उनके कुछ गानों में “प्रीति करीं अइसे जईसे कटहर के लासा”/”गोरी झुकी झुकी काटेली धान, खेतिया भईल भगवान”/”सावन है सखी सावन”/”छिंटिया पहिर गोरी बिटिया हो गईली”/”लेले अईहा बालम बजरिया से चुनरिया”/”लाली लाली बिंदिया”/”प्रीति में ना धोखाधड़ी, प्यार में ना झांसा”/ “अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया हो”- प्रमुख हैं। हां तो उनकी कब्र खोजने के लिए हमें तीर्थयात्री से शोधार्थी बनना पड़ेगा। हम किसी दिन वह भी करेंगे। कब करेंगे—हमें भी नहीं पता लेकिन मोहम्मद खलील को खोज निकालेंगे आखिर अपन अवधी के थाती हवै उ। उनके कइसे छोड़ सकीला। फिर विस्तार से बताएँगे कि मोहम्मद खलील कौन थे?

मोहम्मद खलील
यहां से हमारी तीर्थयात्रा सकुशल संपन्न हो गई। हम निकल रहे थे। बगल में एक आदमी आराम से एक कब्र पर लेटा हुआ था। उसे देखकर मुझे अपने अध्यापक प्रोफेसर बद्रीनारायण का सुनाया एक किस्सा याद आ गया। आपको भी सुना दूं? तो चलिए सुना ही देता हूं—
“एक बार की बात है। एक अमेरिकी अध्येता भारत के बारे में शोध करने आया। वह एक गांव में पहुंचा। देखा कि एक आदमी पेड़ के नीचे सोया हुआ है। उसने पूछा कि आप यहां क्यूं सोए हैं? कोई काम क्यूं नहीं करते? आदमी ने कहा कि उससे क्या होगा? अध्येता ने कहा कि आपको पैसा मिलेगा। आदमी ने फिर पूछा कि उससे क्या होगा? अध्येता ने फिर कहा कि आप उससे घर बनवा सकते हैं। आदमी ने फिर कहा कि उससे क्या होगा? अध्येता ने कहा कि फिर क्या आप घर मे आराम से सोइएगा। आदमी ने कहा कि वहीं तो कर रहा हूं।”
-गोविंद निषाद
परिचय

गोविंद निषाद
शोध छात्र
जी. बी. पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां, कविताएं, संस्मरण, लेख और शोध आलेख प्रकाशित।


