विमर्श

छाते जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह

आज न जाने क्यों गजानन माधव मुक्तिबोध की लिखी मेरी अपनी प्रिय कविता बार बार याद आ रही. उन्होंने यह कविता स्वतंत्र भारत के सबसे लाड़ले और लोकप्रिय प्रधानमंत्री पं. नेहरू के शासनकाल के अंतिम दिनों में लिखी थीऔर विचित्र बात यह कि मुक्तिबोध पं. नेहरू के प्रगतिशील कदमों और सपनों के सबसे बड़े, कहूँ तो –फैन थे. वे अपने समय के भारत की कल्पना पं. नेहरू के बगैर कर ही नहीं सकते थे. इसीलिए पं. नेहरू ने जब आँख मूँदी कवि मुक्तिबोध ने अपने साथी लेखक परसाई से विकल होकर कहा–पार्टनर!अब क्या होगा?
सवाल यह कि किसका क्या होगा? स्वयं मुक्तिबोध और उनके साथी लेखकों का या भारत देश का?साफ है –भारत देश का. उसकी शुरू की गई विकास यात्रा का. देखे जा रहे उन सपनों का जिनसे हजारों साल वाले देश की उम्मीदें जुड़ीं थीं. प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू एक आकारहीन देश को एक नया स्वरूप देने के महायज्ञ में जुटे हुए थे. यही तो उनका अपना कर्मयोग था और पुरुषार्थ भी.तब मुक्तिबोध “भूल-ग़लती ” जैसी कविता अपने किन जीवन -अनुभवों के बल पर लिख रहे थे, यह तो वही जानें.
मैं जब जब इस कविता को पढ़ता हूँ इसकी शुरूआती पंक्तियाँ मुझे आज भी परेशान किया करती हैं. आप भी देखें—-

भूल- ग़लती
आज बैठी है ज़िरहबख़्तर पहन कर
तख़्त पर दिल के ;
चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक :
आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज़ पत्थर -सी ;
खड़ी हैं सिर झुकाए
सब कतारें
बेज़ुबाँ बेबस सलाम में
अनगिनत खम्भों व मेहराबों -थमे
…. दरबारे-आम में।

कविता का तीसरा टुकड़ा जरा देखें—

ख़ामोश !!
सब ख़ामोश
मनसबदार
शाइर और सूफी
अलगज़ाली, इब्ने सिन्ना, अलबरूनी
आलिमोफ़ाज़िल, सिपहसालार, सब सरदार
हैं खामोश !!

कविता के अगले टुकड़े की दो तीन पंक्तियाँ हैं–

कोई सोचता उस वक्त–
छाए जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह…
सुल्तानी ज़िरहबख़्तर बना है सिर्फ मिट्टी का,
वो –रेत का सा ढेर–शाहंशाह,
शाही धाक का अब सिर्फ सन्नाटा !!”

“वो मेरी आपकी कमजोरियों के स्याह
लोहे का ज़िरहबख़्तर पहन, खूँख़्वार
हाँ, खूख़्वार आलीजाह;
वो आँखें सचाई की निकाले डालता, सब बस्तियाँ दिल की उजाड़े डालता,
करता ‌हमें वह घेर
बेबुनियाद, बेसिर -पैर…

हम सब क़ैद हैं उसके चमकते तामझाम में,
. शाही मुक़ाम में !!

कविता के इतने अंशों से गुजर कर लगता है कवि किसी भयानक आसन्न संकट के अनुभव की आहट से परेशान और चिंतित है.
यह अनुभव उस समय और लोक का है जिसे अकेले मुक्तिबोध जैसे प्रतिबद्ध वामपंथी ( किन्हीं के मुहावरों में -वामी-)कवि ही नहीं गैर वामपंथी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी सन् इकसठ बासठ में लिखे जा रहे अपने उपन्यास –चारु चन्द्रलेख में दर्ज़ कर रहे थे.
उनकी भाषा में बेचैन करवटें लेता आक्रोश और कोप सीदी मौला जैसे चरित्र की वाणी में
जिस अभिशाप शैली में फूट पड़ा है, वह कुछ ज्यादा ही अनलंकृत और आक्रामक है. विचित्र यह कि आचार्य द्विवेदी वामपंथी नहीं हैं. आज की राजनीति के हिसाब दोनों ही रचनाकार द्विज प्रजाति के हैं और उच्चशिक्षा के अध्यापक भी हैं.
अब देखिए चारुचन्द्र लेख के सीदी मौला क्या कह रहे हैं—
“सब भंड हैं. यहाँ राजा भंड हैं, मंत्री भंड हैं, फ़क़ीर भंड हैं, रईस भंड हैं. सब स्वार्थ के चेरे हैं. सीदी मौला के पास इसलिए आएँगे कि वह सोना बनाकर दे देगा. सोना मिलने की आशा हो तो उनसे चिलम भरवा लो, पैर दबवा लो, जूठा बर्तन मँजवा लो. स्वार्थ के गुलाम हैं. दिल्ली में गुलामों का राज्य है. सब- के -सब चुगलखोर, चरित्रहीन, क्रूर, गँवार….. “पृष्ठ420.

यही गैर वामपंथी ज्योतिषाचार्य, हिन्दी निबंधकार , उपन्यासकार , साहित्यालोचक संस्कृति -चिंतक और साहित्य का इतिहासकार इसी उपन्यास के 343वें पृष्ठ पर
लिख रहा है–

“राजधानी राज्य नहीं होती, जनता ही वास्तविक राज्य होती है. “

और धर्म को लेकर भी इसकी सोच इसी उपन्यास में कितनी दो टूक और निर्भ्रान्त है—

“धर्म का कितना बड़ा मूढ़ाग्रह है!मेरा मन कहता है, इन धार्मिक संघटनों में और कुछ चाहे हो, धर्म नहीं है. धर्म मुक्तिदाता है. धार्मिक संघटन बंधन हैं. धर्म प्रेरणा है, धार्मिक संघटन गतिरोध है. धर्म कोई संस्था नहीं है, वह मानवात्मा की पुकार है. पृष्ठ — 307.
मुक्तिबोध वैसे तो बाकायदा पूजापाठी कुलकर्णी ब्राह्मण थेऔर आचार्य द्विवेदी भी सरयूपारी ब्राह्मण,पर इन सर्जकों को पं. नेहरू जैसे कश्मीरी ब्राह्मण प्रधानमंत्री के शासन काल में अपने समय का निरंतर मूल्यच्युत होता जाता चेहरा जैसा अनुभव हो रहा था, उसकी गिरफ्त में वे सारे संस्थान आते जा रहे थे जिनकी दुर्गति महसूस कराने की आज शायद ही अलग से कोई जरूरत हो.

कवि और लेखक इन तमाम सँकरी पहचानों को बेमानी मान उस सत्य के लिए उतर पड़ते हैं जिसका अनुभव उनका अंतरतम करता है.इसके अलावा और उनका काम और धर्म क्या है. लोक के सबसे संवेदनशील राडार की तरह वेअपनी भाषा के लोगों को आसन्न संकटों और संभावित विनाशों की खबर देते रहते हैंऔर एक ऐसी लोकानुभूति को जन्म देते चलते हैं जो समय, समाज और राष्ट्र की रक्षा कर सके.
यही उनका धर्म भी है और अपराध भी. तब अपनी सफाई में वे इसके अलावा और कहेंगे भी क्या—
” बेटा!मैं कवि हूँ. कई बार सोचा है कि ऐसा क्यों होता है कि मैं जो बोल रहा हूँ वह मेरी सोची समझी बातों से एकदम अलग है.मुझे ऐसा लगता है कि मेरे अन्तरतर में कोई और बैठा है जो मेरी वाणी में छन्दों के पर बाँध देता है और वह प्रयोजनों की दुनिया से ऊपर–बहुत ऊपर, विपुल व्योम में–उड़ने लगती है “-
और..कई बार मुझे लगता है कि “मेरी वाणी में लाख–लाख लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं के स्वर झंकृत हो उठते हैं”.


आज न जाने क्यों ये दोनों मुझे बेतरह याद आए….

-डॉ विजय बहादुर सिंह

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परिचय

डॉ विजय बहादुर सिंह

वरिष्ठ आलोचक, संपादक व कवि


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