कविता

बचपन

बचपन

ख़्वाब बुनता था बचपन में कभी जो मैं

अब उन ख़्वाबों को याद करता हूँ 

न जाने कहाँ खो गया बचपन मेरा

मैं उस बचपन को याद करता हूँ ।

कभी खेला करता था मैं भी गलियों में

कभी कूदा करता था मैं भी छतों पर

कभी आते थे उलाहने घर मेरे भी 

कभी डांटा करती थी माँ मुझे भी 

माँ से कम मैं पिताजी से ज्यादा डरता हूँ

मैं उस बचपन को याद करता हूँ ।

खेल – खेल में जब मैं गिर जाता था

माँ का हाथ जब सर पर आता था 

दर्द ऐसे छूमंतर हो जाता था 

मानो माँ को जादू मंतर आता था 

बचपन की वो शरारतें याद करता हूँ

मैं उस बचपन को याद करता हूँ ।

देखते ही देखते मैं न जाने कब बड़ा हो गया 

ज़िम्मेदारियों ने ऐसा जकड़ा कि अपने पैरों पर खड़ा हो गया 

सबकी ज़िम्मेदारियों को निभाने में 

न जाने कहाँ खो गया बचपन मेरा 

मैं उस बचपन को याद करता हूँ ।

मैं उस बचपन को याद करता हूं ।।।

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