समीक्षा (review)

सोलो ट्रिप पर जाती सखी

दृश्य से दर्शन तक जाती कविताएँ!

स्वाति शर्मा का पहला कविता संग्रह-सोलो ट्रिप पर जाती सखी-पढ़ते हुए कुछ बातें साफ़तौर पर कही जा सकती हैं…पहली, उनकी कविताएँ पढ़ते हुए किसी अन्य कवि की याद नहीं आई…यानी उनकी कविताएँ किसी अन्य कवि जैसी नहीं लगीं। स्वाति की कविताएँ स्वाति की कविताओं जैसी ही हैं यानी नितांत मौलिक…इनमें भावुकता का अतिरेक नहीं है…सहज हैं…..नैसर्गिक हैं… बयान नहीं हैं… एक स्तरीय नहीं हैं…इनमें जो कहा जा रहा है, उसके समानांतर बहुत कुछ ऐसा भी है, जो ‘अनकहा’ है…ये कविताएँ किसी ‘ऐजेंडे को लेकर नहीं लिखी गई हैं..इनमें बौद्धिकता कहीं भी आरोपित नहीं है।

पता नहीं क्यों, मुझे स्वाति की कविताएँ पढ़ते हुए दो क्लासिक लेखक याद आए, एक फ्रांस के मोपासां और दूसरे रूस के चेखव। इन दोनों के विषय में कहा जाता है कि इन्होंने बेहद छोटी चीजों पर कहानियाँ लिखीं और वे विश्वभर में प्रसिद्ध हुईं। मोपासां की एक कहानी है ‘रस्सी का टुकड़ा’…। एक व्यक्ति को सड़क पर पड़ा हुआ रस्सी का एक टुकड़ा मिलता है। कैसे मोपासां ने इस रस्सी टुकड़े के ज़रिये पूरे समाज की विसंगतियों को चित्रित किया है, वह उनके कहानी कहने के कौशल को साबित करता है। चेख़व के विषय में तो कहा ही जाता है कि  वह बेहद छोटी-सी चीज़ पर कहानी लिख सकते थे। ऐसा आप तभी कर पाते हैं, जब आपके पास अपने समय, समाज, भाषा और दर्शन की गहरी समझ हो…स्वाति की कविताएँ पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि उनके पास प्राथमिक स्तर पर ये सब है…यही वजह है कि वह पुराने जूते,  झुमके और सफाई जैसी कविता लिख पाती हैं। स्वाति के पास कहन और और कहने का शऊर है। उनकी कोशिश होती  है कि जो कहा जा चुका है, वह न कहा जाए। वह प्राकृतिक सौंदर्य में भी वह नहीं देखतीं जो शेष लोग देखते हैं। यही बात उन्हें  दूसरे कवियों से अलग करती है। उनकी एक कविता है ‘जा-ए-मन’-(फ़ारसी शब्द) जिसका अर्थ है मेरी जगह-। स्त्रियों के हक़ में बात करने वाले अधिकांश लोग वर्जिनिया वुल्फ की उस बात से आगे नहीं बढ़ पाते, जिसमें वह स्त्री के लिए अपना एक कमरा चाहती हैं। स्वाति वुल्फ की इच्छा को विस्तार देती हैं। वह पिता के घर से पति के घर जाने के बीच एक पड़ाव चाहती हैं-एक घर चाहती हैं…ऑफ़ द वुमन, बाय द वुमन, फ़ॉर द वुमन। एक ख़ुदगर्जी वाला घर। इस घर में एक आधुनिक लड़की के सपनों को पूरा करने के लिए सारा साजो-सामान होना चाहिए। स्वाति कविता में वे सब काम करना चाहती हैं, जो शायद पुरुष करते हैं। फ़्यूज़ लगाना, ड्रिल मशीन के साथ एक्सपेरिमेंट करना, पर्वातारोहण के औजारों का परीक्षण करना। और भी बहुत कुछ चाहती हैं।

स्वाति की कविताओं की एक और ख़ूबसूरत बात है कि उनकी कविताएँ दृश्य से शुरू होती हैं। वह दृश्य सूर्योदय का हो सकता है, सूर्यास्त का, समुद्री तटों का, पहाड़ पर खेलते बच्चों का, बारिश का या अन्य कोई। स्वाति इन दृश्यों को कविता में दर्शन तक ले जाती हैं। यही बात उन्हें भीड़ से अलग करती है। स्वाति साहस और दुःसाहस के बीच के फर्क को समझती हैं। ‘सोलो ट्रिप पर जाती सखी’ में वह एक तरफ़ लड़कियों को अकेले जाने के लिए प्रेरित करती हैं, वहीं दूसरी तरफ़ कहती हैः

डरना, ख़ूब डरना

साहस में कोई यश नहीं

धरती के ओर छोर सब नाप डालना

सब करना मेरी सोलो ट्रिप पर जाती सखी पर

अकेले जाने और अकेले रहने का फ़र्क ख़ुद ही करना

‘प्रेम, विवाह न करने वाली लड़कियाँ’ कविता में स्वाति शहर के कैफ़ेज़ को अकेले लोगों की आदत लगाना चाहती हैं। ‘रोटी और कविता’ में स्वाति माँ को एकदम अलग ढंग से दर्ज़ करती हैं। यहाँ माँ पीड़िता, बोझ सहती स्त्री और पूजनीय नहीं है। बल्कि एक अलग स्त्री है। यहाँ माँ केवल उन्हीं किताबों के आगे सिर निवाती हैं, जिन्हें वह पढ़कर समझ सके। माँ केवल मातृभाषा को ही श्रेष्ठ नहीं समझती। माँ बच्चों और रूढ़ियों के बीच एक सीधा पुल बन जाती हैं ताकि उसके बच्चे स्वतंत्र अन्वेषण और विचरण कर सकें। पूरे मन से हर काम करना सिखाने वाली माँ कविताएँ नहीं लिखती। उनकी बेटी लिखती है। और चाहती हैं कि कविताएँ माँ की गोल, नरम, परफेक्ट रोटियों जैसी हो। माँ बच्चों पर महान बनने का बोझ नहीं डालती। बच्चे भी माँ से महान बनने के किसी दबाव को महसूस नहीं करते। यही बात इस कविता को बड़ा और यादगार बनाती है। सोचकर देखिए अगर सभी माँएं कविता में वर्णित माँ जैसी हो जाएँ तो कितने ज़रूरी मसले हल हो सकते हैं!

स्वाति की कविताओं में प्रेम भी वायवीय रूप में आता है। यहीं से वह प्रेम का नया मुहावरा खोजती हैं। ग़ौर कीजिएः तुम्हारे सामने फिसलते मन को, तार्किक रखने के लिए बार-बार ब्रेक लगानी होगी (ब्रेक), तभी सारे ओरिगामी कागज़, आगे पैसेंजर सीट पर रखे हैं, वापस आते हुए गाड़ी की खिड़की से, कागज़ के जहाज उड़ाने होंगे (पैसेंजर सीट),वापस आते हुए गाड़ी और मैं एक हो रहे हैं, पता नहीं पूरी रात ड्राइव करने के बाद भी तुम तक पहुँचूगी या नहीं (स्पीड), तुम्हारे पास से वापस आते हुए, मुझे देखना होगा कल का सूर्यास्त(हाईवे), मुझे दिक्कत होनी चाहिए, सारा ध्यान सिर्फ गाड़ी काटने पर हो, तुम्हारी विदा करती हुई आँखों पर नहीं, रिवर्स गियर और अलविदा, मुझे दोनों ही ठीक से निभाने नहीं आते (रिवर्स गियर)। प्रेम और उसकी संभावनाओं पर और भी कविताएँ हैं। जहाँ आप कथा भी खोज सकते हैं। वह प्रेम को भी तकनालॉजी के साथ जोड़कर देखती हैं।

स्वाति के पास विविधता है, उनकी कविताओं में यह विविधता देखी जा सकती है। यह विविधता शिल्प में ही नहीं विषय में भी मौज़ूद है। वह समानांतर ब्रम्हाण्ड, एरर 404, कम्प्रेशन, ओरिगामी और श्वास निधि जैसी कविताएँ लिखती हैं तो दूसरी तरफ़ वह दिवेआगार और मृत्युबोध से जुड़ी ‘धुआँ’ जैसी कविता भी लिखती हैं। उनकी कविता-‘हार’ में पर्यावरण को बचाए रखने की जिद्द भी दिखाई पड़ती है। इस संग्रह में मुकरियाँ भी शामिल हैं। यानी उन्हें मुकरियाँ लिखना भी प्रिय है।

ऐसा नहीं है कि स्वाति राजनीतिक कविता नहीं लिखती। सिनेमाघर, सफ़ेद कमीज़ और सच राजनीतिक कविताएँ ही हैं। ‘सच’ कविता में वह आज का राजनीतिक और सामाजिक सच बेबाकी से लिखती हैं। देखिएः

प्रेम और भक्ति अपना भेस बदलकर सड़क पर घूम रहे हैं

प्रथाओं और गाथाओं की चक्रनेमी धुरी से उतर गयी है

अभिव्यक्ति को हाशिये के सघन जंगल में छोड़ दिया गया है

ऐसे में अगर लिखना चाहते हो कवि

तो सुन्दर न लिखो

ऐसे में सच लिखो

स्वाति की कविताओं में एक और बात ग़ौर करने लायक यह है कि उनके बिंब 90के दशक के पहले के बिंब नहीं हैं। उनके पास नब्बे के बाद की पीढ़ी के नये बिम्ब हैं, जो उनकी कविता को जीवन्त बनाते हैं। कई भाषाओं की जानकार होने के कारण उनकी कविताओं में अनेक भाषाओं की छवियाँ दिखाई देती हैं। यह बात उनका कविता को भाषाओं की सीमाओं से परे ले जाती है। सारे प्रयोगों के बावज़ूद स्वाति कविता का सौंदर्यबोध बनाए रखती हैं।

स्वाति की कविताओं के विषय में एक और बात, अन्तिम बात। कहते हैं जब गद्य में कविता आ जाए और कविता में गद्य तो वह रचना पूर्ण होती है, स्वाति की कविताओं में यह विरल गुण भी देखने को मिलता है। ‘सोलो ट्रिप पर जाती सखी’ पढ़ना ख़ुद को भी समृद्ध करना है। साथ ही यह जानना भी है कि किस तरह वैचारिकता को सहज रूप से कविता में शामिल किया जा सकता है।

पुस्तकः सोलो ट्रिप पर जाती सखी, लेखकः स्वाति शर्मा, प्रकाशकः भावना प्रकाशन, मूल्यः 250 रुपए, पृष्ठः 152

समीक्षक – सुधांशु गुप्त

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