समीक्षा (review)

‘गुनाहों का देवता’ – धर्मवीर भारती

( जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला!)

जब कभी कोई काम नहीं रहता है तो हम अपनी बुकरैक्स में किताबों को निकाल कर दोबारा सिलसिलेवार लगाने में मशग़ूल हो जाते हैं! ये हमारा पुराना शग़ल है! इससे फ़ायदा ये होता है कि जहां एक ओर किताबों की सफ़ाई हो जाती है तो कुछ पुरानी दबी-पड़ी किताबें हाथ आ जाती हैं जिन्हें दोबारा पढ़ना शुरू हो जाता है.

पिछले हफ़्ते जब ऐसे ही अलमारी सहेजने बैठे तो धर्मवीर भारती की ‘गुनाहो का देवता’ हाथ लगी. तक़रीबन चालीस साल पहले हमारी एक जेएनयू कैमप्स में मित्र थीं. मित्र क्या सहपाठी कहें तो बेहतर होगा! जाड़े की एक दोपहर झेलम लॉन्स में उन्होंने पूछा,’रमन तुमने ‘गुनाहों का देवता’ पढ़ी है?’ हमने छूटते कहा,’पढ़ा तो नहीं लेकिन फ़िल्म का नाम सुना है?’ तब उसने चिढ़ कर कहा,’मैं धर्मवीर भारती की नॉवेल की बात कर रही हूं! मैं उसे जितनी दफ़ा खोल कर जहां से शुरू करती हूं, आंखों में आसुओं का सैलाब आ जाता है!’ हमने हंसते हुए कहा,’तब तो बीबी रहने ही दो! लड़कियों के बारे में सुना है बात बात पे रोने लगती हैं लेकिन अगर मर्द रोने लगे तो बस क़िस्सा मुक गया!’ बोली,’ हमें कभी कभी तुम उसके नायक चंदर लगते हो!’ बग़ैर चंदर के करेक्टर को जाने पढ़े हम वहां से उठ लिए और फिर कभी गुनाहों का देवता’ का ज़िक्र ना आने दिया!

 तब हमारा परिवार इलाहाबाद में रहता था और हम हर महीने दो महीने पर एक चक्कर अपने मां बाप से मिलने इलाहाबाद ज़रूर जाते थे. एक शाम इलाहाबाद में सिविल लाइन्स में टहलते हुए किसी बुक स्टोर पे ‘गुनाहों का देवता’ दिखी और ख़रीद ली. लेकिन बग़ैर पढ़े जस की तस पढ़ी रही! अब उसकी जिल्द भी खुल गई थी और कुछ पन्नें भी ग़ायब थे. लिहाज़ा एक नई कॉपी मंगाई गई और अबकी पूरी पढ़ने की ठानी. दो दिनों में तीन चार सिटिंग्स में पूरी पढ़ ली तो लगा कि ये हमारी जवानी के दौर की नॉवेल है. इसे उस वक्त ही पढ़ना था. बीते चालीस सालो में गंगा और जमुना में बहोत पानी बह चुका है! बहौत सी वर्जनाएं टूटी हैं! रिलेशनशिप के मायने पूरी तरह से बदले ही नहीं, नए सिरे से गढे जा चुके है!

साठ की दहाई में शाया हुई ये नॉवेल उस माइंड सेट की बानगी है जिसमें आज़ादी के बाद के हिन्दुस्तान की आइडियल तहरीर निहां थी. नेहरुवियन एज की आइडिलिज़्म कहानी की सेंट्रल थीम है. बैकग्राउंड सैटिंग में सुस्त – अलसाया इलाहाबाद है. जहां मूड, ज़िंदग़ी और रिलेशनशिप्स बग़ैर किसी ख़ास मुक़ाम के धीरे धीरे आगे रेंगती हैं!

 कहानी में चार क़िरदार अहम हैं जिनमें तीन ख़्वातीन हैं. तीनों अलहदा अलहदा बैकग्राउंड से हैं. एक शहरी है, एक रुरल बैकग्राउंड से और तीसरी एंग्लीसाइज़्ड क्रिस्ट्रीयन. लेकिन तीनों में एक पैरेलल है. तीनों उस दौर के माअशरे के इस्टैबलिशज़्ड नॉर्मस को तोड़ना चाहती हैं.कहानी का सेंट्रल करेक्टर चंदर फ़ोर्सड यूटोपियन है. सैकरिफ़ाइज़ और आडियिलज़्म को अपनी स्ट्रैंथ मानता है. इसी हठ के चलते अपनी तीनों नायिकाओं को क़ुर्बानी की सूली चढ़ा देता है! ‘गुनाहों का देवता’ सही मायने में फ़ेल्ड रिलेशनशिप्स की एक बेहतरीन बानगी है. आज के दौर में लिखी गई होती तो बहौत मुमकिन था कि धर्मवीर भारती कहानी के आख़िर में सुधा की जगह चंदर को ज़ाया कर देते! नॉवेल की ख़ूबसूरती इसकी महिला क़िरदार ही हैं जो एक पाठक को शुरू से आख़िर तक बांध कर रखती हैं. इतनी स्ट्रांग करेक्टर्स एक साथ,एक कहानी में देखने को नहीं मिलती हैं! धर्मवीर भारती ने क्यों ना चंदर को सेंट्रल करेक्टर के तौर पे ‘गुनाहों का देवता‘ मानकर नॉवेल लिख दिया हो लेकिन असल में कहानी ‘तीन देवियों‘ की छटपटाहट की है! तीनों अपने अपने माअशरे के सोशल टैबूज़ को जितनी बार नकारने की कोशिश करती हैं कहानी का नायक उनको दोबारा उन्हीं के बंधनों में जकड़ने को मजबूर कर देता है.  कहानी की सेटिंग जिस टाइम पीरियड और जिस माअशरे की है उसमें प्रेमिकाएं अपने प्रेमियों की इतनी मन्नतें करते कभी नज़र नहीं आईं जितनी धर्मवीर भारती ने करवा दी! उस दौर की ‘सुधायें’ भी अपने ‘चंदरों’ के इतने पैर नहीं पड़ी होंगी जितना धर्मवीर भारती ने पड़वा दिए!पता नहीं कैसे अपने मज़बूत अक़ाइद के बावजूद ये ख़्वातीन नायक चंदर के आगे इतनी कमज़ोर कैसे पड़ जाती हैं? हालांकि उनके जज़्बात उनकी अशक्तता की नुमाइंदगी क़तई नहीं करते!

औरत अपने प्रति आने वाले प्यार और आकर्षण को समझने में चाहे एक बार भूल कर जाये, लेकिन वह अपने प्रति आने वाली उदासी और उपेक्षा को पहचानने में कभी भूल नहीं करती।

कहानी का ख़ात्मा बहौत हैक्‌निड् लगा! एक दुखद कहानी की ‘हैप्पी एंडिंग‘ ! जिस शख़्स ने अपनी प्रेमिका की बातें उसके जीते जी ना मानी हो वो उसकी मौत के बाद प्रायश्चित स्वरूप उसकी बात मान लेता है. अगर ऐसा नहीं होता तो वाक़ई गुनाहों का देवत्व हासिल कर लेता! धर्मवीर भारती ने नॉवेल का ख़ात्मा करते हुए माना है,

 ‘नदी फिर उसी तरह बहने लगी थी जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो’.

वाक़ई ऐसा लगा भी कि कहीं कुछ भी हुआ ही नहीं!!

‘गुनाहों का देवता’ में जब आधी नॉवेल तक पहुंचे तो जोन एलिया का शेर ज़हन में कौंधा-

         ‘कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल-जू हूँ मैं

क्या सितम है कि हम लोग मर जाएँगे’

लेकिन अगर कहानी का ये दुखान्त होता तो फिर इसका टाइटल ‘गुनाहों का देवता’ ना होकर कुछ और ही होता!! अगर आपने अभी तक नहीं पढ़ी है तो पढ़िए ज़रूर! हिन्दी की ना महज़ सबसे ज़्यादा पढ़ी हुई बल्कि टॉप बेस्ट नॉवेल्स में इसका शुभार जो है!

रमन हितकारी

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परिचय

रमन हितकारी

क्राइस्ट चर्च कालेज, कानपुर और जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से राजनीति शास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में एम.ए., एम.फिल. की शिक्षा. प्रतिष्ठित उप्पसाला यूनिवर्सिटी, स्वीडन से कन्फ्लिक्ट रिज़ोल्यूशन में डिप्लोमा.

संघ लोक सेवा आयोग से भारतीय प्रसारण (कार्यक्रम) सेवा में चयनित. डीडी न्यूज़ और डीडी इंडिया चैनलों के कार्यक्रम प्रमुख रहे. 38 वर्षों का प्रिंट और टी.वी. पत्रकारिता / प्रोडक्शन का अनुभव. हाल ही में  संस्मरण ‘आशियाना, मैकराबर्टगज’ प्रकाशित.

Email:-ramanhitkari@gmail.com

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