उभरते सितारेसमीक्षा (review)

  आदमी और औरत

आदमी और औरत फिल्म को दादा साहब फाल्के पुरस्कार विजेता  तपन सिन्हा  द्वारा निर्देशित किया गया थे जिसे दूरदर्शन द्वारा निर्मित  किया गया था।ये बंगाल के महान फिल्मकार तपन सिन्हा का जन्म शताब्दी वर्ष चल रहा है। अगर बांग्ला फिल्मकारों की मशहूर तिकड़ी की बजाय चौकड़ी की संज्ञा दी जाए तो राय, घटक और सेन के बाद चौथा और सबसे ज़रूरी नाम तपन सिन्हा का ही आता है। तपन सिन्हा की फिल्में सामाजिक यथार्थवाद, विविध विषयों, सशक्त चरित्र-चित्रण, बेहतरीन अभिनय और सबसे बढ़कर कहानी कहने के एक अलग अंदाज़ के लिए जानी जाती हैं।

खास बात ये है कि ये फिल्म बांग्ला में नहीं बल्कि मैथिली और भोजपुरी में है। ये जानना दिलचस्प है कि तपन सिन्हा की शिक्षा बिहार के भागलपुर और पटना में हुई थी

 मात्र 55 मिनिट की एक फ़िल्म है। जिसे दूरदर्शन और मंडी हाउस के सौजन्य से बनी एक टेलीफ़िल्म के रूप में प्रस्तुत किया गया था। तपन सिन्हा अक्सर अपनी फ़िल्मों में बिंबों के माध्यम से इंसानी संबंधों को रूपक की तरह पेश करते थे। सत्यजीत राय, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन के साथ सबसे प्रभावशाली बंगाली फ़िल्मकारों की चौकड़ी बनाने वाले तपन सिन्हा ने यूं तो हिन्दी में कम फ़िल्में बनाई लेकिन उनकी कई फ़िल्मों का हिन्दी रूपांतरण अक्सर हुआ। हिन्दी में “एक डॉक्टर की मौत” उनकी यादगार फ़िल्मों में से एक है। यह फ़िल्म भी ऐसी ही बिंबों से भरी, एक कहानी है, जो ऊपरी तौर पर सीधी-साधी होकर भी अनेक जटिल सवाल  हमारे सामने  उठाती है। कहानी प्रफुल्ल राय और तपन सिन्हा ने मिलकर लिखी है।

 आजीविका और दुनिया के संघर्षों के चक्कर में डूबे इंसान के जीवन में, जहां आपसी टकराव परस्पर संबंधों पर हावी रहता है, वहाँ अक्सर मुसीबत के दौर में मानवीय भावनाएँ उम्मीद की किरण जगाती है। विपत्तियों के तूफ़ानों में ही अक्सर हमें बांटने वाली दीवारें ढह जाती हैं और यह सत्य प्रकट होता है कि इस ऊपरी भेदभाव के अंदर सभी के अंदर वही कोमल दिल धड़कता है। जो हाथ दूसरे पर अक्सर उठाए जाते हैं, वही विपत्तियों के दौर में एक दूसरे की मदद को आगे आकर, मांमुटावों की खाई को आत्मीयता की मिट्टी से भरने का कार्य करते हैं। हमें इस बात का फिर से एहसास कराते हुए कि , एकता में ही, आपसी कलह के बावजूद, हमारी शक्ति और सहनशीलता का निवास है।

 फिल्म के मुख्य किरदार हैं :-

निर्देशक – तपन सिन्हा

निर्माता – दूरदर्शन

वर्ष – 1984

कलाकार –  अमोल पालेकर , कल्याण चटर्जी , महुआ रॉय चौधरी , निर्मल घोष ।

आदमी और औरत  फिल्म मात्र 55: 11 मिनट की फिल्म की

है जिसे दूरदर्शन और मंडी हाउस के सौजन्द से बनी  एक टेलीफिल्म्स के रूप में प्रस्तुत किया है तपन सिन्हा अक्सर अपनी फिल्मो के बिंबो  के माध्यम से इंसानी संबंधों को रूपक की तरह प्रस्तुत करते हैं  जैसे कि आप आदमी और औरत फ़िल्म के माध्यम से देख सकते हैं

 फिल्म की ओर एक नजर

फिल्म की मुख्य भूमिकाओं हैं अमोल पालेकर और महुआ रॉय चौधरी  दोनों ने काफी शानदार भूमिका निभाई है

फ़िल्म की जो भाषा है मैथिली और भोजपुरी है

इस फिल्म में बंसी एक बिगड़ैल युवक है जो ऊंचे जागीरदार के लोगो के साथ शिकार में जानवरों को खदेड़ने में मदद करता था और बाकी वक्त या तो  लड़कियों को छेड़ता है  या फिर अवैध तरीके से जानवरों का शिकार करता है

वहीं दूसरी ओर एक गरीब तबके से आने वाली एक औरत जो गर्भवती है उसे अपने गांव से कुछ दूर वकीलगंज के अस्पताल में समय रहते पहुंचना है पर गरीबी के चलते उसके पति को साहूकार से उधार लेकर उसके लिए बस के  टिकट

का इंतजाम करना पड़ता है असहयोग वह उसे एक ही टिकट मिल पाता है जिसके कारण उसके अपनी पत्नी को अकेले ही भेजना देता है लेकिन बस छूट जाने के कारण वो पहाड़ के रस्ते  पैदल चल पड़ती ही ओर इसी सफर में वह बंसी से टकरा जाती है  । बंसी यह समझकर कि महिला गर्भवती है उसे हर संभव प्रयास करके सफर में उसकी मदद करता है

नोट :- 

यह देखकर मेरे मन में ख्याल आता है कि निर्देशक के काफी मार्मिक ढंग से इस फिल्म को पर्दे पर लाने की कोशिश की है

इससे यह भी पता चलता है कि फ़िल्म में दोनो पात्र बेहद गरीब है लेकिन उनकी पृष्ठभूमि में और उनके तौर तरीकों में काफी अंतर है फिर भी नाजुक वक्त में भी आदमी औरत की मदद करता है ।

रास्ते में समय करने और औरत को जगाए रखने की गरज में हमें दोनो की निजी कहानी के बारे में पता चलता है । एक बड़े ही रोचक किस्से में बंसी एक फिल्म की शूटिंग में हिस्सा लेने की बात बताता है जिसमें फिल्मकार ने अपने ऊपर ही तंज किया है कि इस तरह की तथ्य परक फिल्में कौन देखता है जिसमें न नाचना है न गाना है कुछ भी ।

फिल्म में आगे यह दिखाया जाता है कि परिस्थितिवश दोनो को एक दूसरे का नाम पूछने का मौका नहीं मिलता और एक दूसरे को ‘ ए आदमी और ए औरत कहकर संबोधित करते हैं शायद यही देखकर फिल्मकार इस फिल्म का नाम आदमी और औरत रखा होगा ।

फ़िल्म के अंत में जब आदमी को औरत के पति का नाम पता चलता है तो बंसी के चेहरे के हावभाव देखकर सभी दर्शकों के मन में प्रश्न उठे होंगे । इसी के साथ यह फ़िल्म समाप्त हो जाती है ।

नंदिता राज

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परिचय
नंदिता राज दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कॉलेज में हिंदी ऑनर्स की तृतीय वर्ष की छात्रा हैं।

साहित्य , पत्रकारिता में उनकी विशेष रुचि है। उन्हें लेखन, रिपोर्ट तैयार करना और स्क्रिप्ट राइटिंग जैसे रचनात्मक कार्यों में विशेष निपुणता है। लेखन उनके लिए केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सोच और समाज को जोड़ने का साधन है।

Email – nanditaraj2514@gmail.com

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