कविता

जबलपुर वाया जबलपुर

वायलिन कहाँ है आपका प्रेम उस्ताद!
और घोड़े की पूँछ के बालों से बना उसका वह धनुष
और वह माइक भी जो आपके कंठ से बँधा होता था
जिससे आपकी और आपकी ठुड्ढी के नीचे दबे वायलिन की आवाज़ कई गुना बढ़‌ जाती थी

कहाँ हैं वह डायरी जिसमें लिखे रहते थे सदाबहार फ़िल्मी गाने
कुछ लोकगीत, कुछ भजन 
गाने याद तो थे आपको बहुत

फिर भी गाते-बजाते कभी देख ही लेते थे कोई अंतरा

कहाँ है ठेलागाड़ी पर सजा वह बाजा
जिसके आगे-पीछे चलते हुए आप वायलिन बजाया करते थे
कभी थोड़ा ठुमक भी लेते थे
ऐसे ही ठुमकते, गाते और वायलिन बजाते हुए
बारातियों के ऊँचे उठे हाथों की उँगलियों में फँसे

ईनामो-इकराम के नोट खींच लेते थे
वायलिन के अतिरिक्त ऐसी सहूलियत कहाँ थी किसी और वाद्य में

यह भी गर्व था आपको

कि आपसे  बेहतर वायलिन-वादक नहीं था कोई इधर
कि शादी-ब्याह में आपके बाजे की रहती थी माँग बहुत
‘बहारों फूल बरसाओ’ और ‘बाबुल की दुआएँ’ तो

आपसे अच्छा कोई गा ही नहीं सकता था

लेकिन वे अच्छे दिन बीत गए, प्रेम उस्ताद!
जब इस कला से चलती थी आपकी गाड़ी गृहस्थी की और मिलता था सम्मान 
ये नये अच्छे दिन है
डीजे-साउण्ड और सिंथेसाइजर के
अब आपके वायलिन और बाजे की ज़रूरत नहीं रही

और  आपकी भी  लगभग

2.

उस वक़्त यहाँ कहीं नगाड़ों की बात चलती थी
तो आपका ज़िक्र ज़रूर होता था गणपत उस्ताद!

शादी-ब्याह के मौक़ों पर दूर ही से सुनाई देने लगती थी

शहनाई की तीं-तीं के साथ आपके नगाड़े की धड़ाम-धू

तोरणद्वार के बगल में एक मचान बना होता था
याद होगा आपको 
नगाड़े लिए उसके एक सिरे पर आप बैठे होते थे
दूसरे पर शहनाई-वादक
दोनों मिलकर अपने वाद्य बजाते, बातें करते

और थक जाते तो सुस्ताने लगते

अड़ोस-पड़ोस के गाँवों की रामलीलाएँ अधूरी थीं

आपके नगाड़े के बिना
मानस की चौपाइयों पर हारमोनियम और आपके नगाड़े की सुर-ताल
रोमांच से भर देती थी देखने-सुनने वालों को

शादी-ब्याह में अब कहाँ बजते हैं नगाड़े
रामलीलाएँ भी रहीं नहीं इधर
अब आप क्या करते हो गणपत उस्ताद?

सुना है पास ही जो हनुमान मंदिर है
थावर-मंगलवार वहीं बैठते हो सिंहद्वार की सीढ़ियों पर   
कोई  दो-पाँच रूपये देता है

तो थोड़ी देर  बजा देते हो  नगाड़ा

3.
तुम्हारे नाच-गान और अभिनय को कोई भूल सकता है, दयाल!

पौष-माघ‌ के महीनों में
जब खेती-किसानी से कुछ राहत मिलती थी
रामलीलाएँ शुरू हो‌ जाती थीं
जिन गाँवों में नहीं होती थी
वहाँ के लोग जाते थे दूसरे गाँवों में देखने

रामलीला के मध्यांतर में नाच-गाना भी होता था
तमाशाई अपनी पसंद के‌ गाने गवाते थे
मंडली के सदस्य घूम-घूमकर लाते थे पैसे और फ़रमाईशें
स्त्री-वेश में सजे-धजे तुम नाचते-गाते थे उन गानों पर
सच कहूँ तो रामलीला का आधा ख़र्च इसी नाच-गान से निकलता था

तुम लंगोट कसकर नाचते थे भूखे पेट ही

फिर रामलीला की समाप्ति पर ही होता था तुम्हारा खाना-पीना

नाच-गान के अतिरिक्त
स्त्री पात्रों का किरदार भी तुम्हीं निभाते थे
ख़ासतौर से कैकई‌ और सती सुलोचना का
सीता का पार्ट गाँव ही का कोई किशोर कर लेता था
लेकिन उसे अभिनय की बारीकियाँ तुम्हीं सिखाते थे
नेपथ्य से संवाद भी याद दिलाते थे

अभी मिला था तुम्हें तो पहचान नहीं पाया था
उस सजीले नवयुवक की जगह खड़ा था

एक थका-हारा अधेड़ व्यक्ति अब इस उम्र में तो क्या नाचते-गाते होंगे, दयाल!

तुम्हें तो पता है तुम्हारे गाँव के नाम का एक बड़ा शहर भी है
मैं गया था वहाँ
उस शहर की नदी के किनारे
उस नदी की आरती के बाद
एक म्यूजिक-बैंड के भजनों को सुनते हुए याद आया था मुझे तुम्हारा गाँव
याद आए थे तुम लोग

-पुरु मालव


पुरु मालव
प्रकाशन – हंस, वागर्थ, पाखी, समकालीन भारतीय साहित्य, वर्तमान साहित्य, आजकल, परिकथा आदि पत्रिकाओं तथा अन्य संकलनों में। दो पुस्तकें प्रकाशित।
Email- purumalav@gmail.com

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