कविता

विजय राही की कविताएँ 

चाह—१ मैंने चाहा था कि उसकी आँखों में ख़ुद को देखूँ उसके घर में रहूँ अपना घर समझकर लेकिन उसने आँखें नहीं खोली उसने गले से लगाया‌…
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कविता

पांच कवितायेँ

तुम और कवितायें चट्टान पर जो आज कुछ नम सी लगी मुझे ।तुम अनदेखा करते रहे दो आँखें, जो तुम्हें देखने के लिए…
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मेरा नाम नहीं था..

उसकी हाथों की मेंहदी मेंमेरा नाम नहीं था,उसकी ख़ुशी में दिल खुश था,पर बेचैनी थी आराम नही था। उसकी आंखों…
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भीत (दीवार)

ये भीत हमारी हैऔर इसमेंये टांगी हुईतस्वीर उसकी है भीत में दरारें हो गई हैतुम भी देखोगेमगर बोलना मतरंग…
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बाल कविताएं भाग -3

दादी भी स्मार्ट हुईं बदल गया है और जमानाबदल गई हैं दादी भीपहले वाली नहीं है बंदिशमिली उन्हें आजादॅ
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सर्द रात का आदमी

सुनाई देती है मुझे सर्द रातों में ठंड सेकड़कड़ाते हुए लोगों की आहटें ,और देखता हूँ थरथराते हुएउनके नंगे बदन…
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बाल कविताएं भाग -2

पापा आते जब दफ़्तर से पापा आतेकितनी सारी चीज़ें लाते कभी वो लाते काजू बर्फ़ीकभी वो लेकर आयें कुल्फी देते…