कविता

शैलेश कुमार की 4 कवितायेँ

1. छठ के बहाने ही सही वापस लौटता हूँ छठ के बहाने ही सहीवापस लौटता हूँअपनी पुरानी चौखट पर चौखटदरवाजे में नहीं लगी होतीदरवाजाचौखट में लगा होता हैऔरकभ…
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कविता

        माँ की परछाई

माँ तुम नहीं हो  पर मुझमें ही कहीं हो। मैं गाती गीत स्वर तुम्हारा होता  आँखे मेरी, आँसू तुम्हारे  चाल…
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रक्षाबंधन 

इस बार भी बंधे हैं बहनों के धागे मेरी कलाई में  चमकीले, मोतियों जड़े  लाल लाल रंग के  नाड़ियों में…
कविता

1. कविता

रोज की बंधी-बंधाई दिनचर्या से निकली ऊब नहीं है कविता दिनचर्या एक बेस्वाद च्यूंइगम है जिसे बेतरह…